भारतकोश
बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,008 पृष्ठ

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पृष्ठ 278

एकचत्वारिंशोऽध्यायः २५६ सतामसूयानिरतां उपहासं प्रकुर्वंते । सरित्तीरेषु कुद्दालैर्वपिष्यन्ति चौषधीः ॥४१॥ पृथ्वी निष्फलतां याति बीजं पुष्पं विनश्यति । वेश्यालावण्यशीलेषु स्पृहां कुर्वंति योषितः ॥४२॥ धर्मविक्रयिणो विप्राः स्त्रियश्च भगविक्रयाः । वेदविक्रयकाश्चान्ये शूद्राचाररता द्विजाः ॥४३॥ साधूनां विधवानां च वित्तान्यपहरंति च । न व्रतानि चरिष्यन्ति ब्राह्मणा द्रव्यलोलुपाः ॥४४॥ धर्माचारं परित्यज्य वृथावादैर्विषज्जिताः । द्विजाः कुर्वन्ति दंभार्थं पितृश्राद्धादिकाः क्रियाः ॥४५॥ आपात्रेष्वेव दानानि प्रयच्छन्ति नराधमाः । दुग्धलोभनिमित्तेन गोषु प्रीतिं च कुर्वंते ॥४६॥ न कुर्वंति तथा विप्राः स्नानशौचादिकाः क्रियाः । अकाले कर्मनिरता भविष्यंति द्विजाधमाः ॥४७॥ साधुनिंदापराश्चैव विप्रनिंदापरास्तथा । न कस्यापि मनो विप्र विष्णुभक्तिपरं भवेत् ॥४८॥ यज्विनश्च द्विजानैव धनार्थं राजकिंकराः । ताडयंति द्विजान्दुष्टाः कृष्णे कृष्णत्वमागते ॥४९॥ दानहीना नराः सर्वे घोरे कलियुगे मुने । प्रतिग्रहं प्रकुर्वंति पतितानामपि द्विजाः ॥५०॥ कलेः प्रथमपादेऽपि विनिंदंति हरिं नराः । युगान्ते च हरेर्नाम नैव कश्चिद्वदिष्यति ॥५१॥ शूद्रस्त्रीसंगनिरता विधवाशंगलोलुपाः । शूद्रान्नभोगनिरता भविष्यंति कलौ द्विजाः ॥५२॥ विहाय वेदसन्मार्गं कुपथाचारसंगताः । पाषंडाश्च भविष्यन्ति चतुराश्रमनिंदकाः ॥५३॥ न च द्विजातिशुश्रूषां कुर्वंति चरणोद्भवाः । द्विजातिधर्मान्गृह्णन्ति पाखण्डलिङ्गिनोऽधमाः ॥५४॥ काषायपरिवीताश्च जटिला भस्मधूलिताः । शूद्रा धर्मान्प्रवक्ष्यंति कूटयुक्तिपरायणाः ॥५५॥ द्विजाःस्वाचारमुत्सृज्य परपाकान्नभोजिनः । भविष्यंति दुरात्मानः शूद्राः प्रव्रजितास्तथा ॥५६॥ सब करते हैं। नदी तट को फावड़े से खोदकर अन्न बो दिया जाता है ॥४१॥ इस युग में पृथ्वी में अन्न पैदा करने की शक्ति नहीं रह जाती। स्त्रियां सुन्दर वेश्याओं का सौन्दर्य और सजावट देखकर उनका ही अनुकरण करने लगती हैं ॥४२॥ ब्राह्मण धर्म बेचते और स्त्रियां अपना सतीत्व बेंचती हैं। दूसरे विप्र वेद-विक्रय करते और शूद्रों के समान आचरण करते हैं ॥४३॥ ब्राह्मण इतने अधिक धनलोलुप हो जाते हैं कि व्रत आदि का पालन तो करते नहीं, उलटे साधुओं और विधवाओं की संपत्ति ठग लेते हैं ॥४४॥ द्विज धर्माचार को छोड़कर व्यर्थ के बकवाद में लगे रहते हैं। द्विज केवल दंभ की दृष्टि से ही पितृ श्राद्ध आदि क्रियाओं को करते हैं ॥४५॥ दुष्ट लोग केवल अपात्रों को ही दान देते हैं। गौओं का पालन अथवा उससे प्रेम केवल दूध के लोभ से ही लोग करते हैं, धर्म दृष्टि से नहीं ॥४६॥ विप्रगण स्नान, शौच आदि कर्म शास्त्र और समय के अनुसार नहीं करते हैं और अधम ब्राह्मण अकाल में ही कर्म करते हैं ॥४७॥ विप्र ! साधु ब्राह्मणों की निन्दा सब करते हैं। किसी का भी विष्णु भक्ति में मन नहीं लगता ॥४८॥ कोई ब्राह्मण यज्ञ करने वाले नहीं रह जाते, सब धन के लोभ में पड़कर राजसेवक बन जाते हैं। कृष्ण के कृष्ण वर्ण हो जाने पर दुष्टजन ब्राह्मणों को मारते हैं ॥४९॥ मुने ! घोर कलियुग के आ जाने पर मनुष्य दान देना नहीं चाहते हैं। द्विज इतने पतित हो जाते हैं कि वे पतितों से भी दान लेते हैं ॥५०॥ कलि के प्रथम चरण में ही मनुष्य हरि की निन्दा करने लगते हैं। युग के अन्त में कोई भगवान् का नाम भी नहीं लेता ॥५१॥ शूद्र-स्त्री के साथ रमण करने लगते और विधवा की संगति के विशेष इच्छुक हो जाते हैं। कलि में द्विज शूद्रान्न भक्षण करेंगे ॥५२॥ अधम पाखंडी लोग ब्राह्मणवेश बनाकर धर्म के नाम पर पाखंड करेंगे। काषाय वस्त्र पहनकर भस्म लेप कर मुण्डी बनकर लोग वेद सम्मत मार्ग छोड़कर कुपथ की ओर लगेंगे। चारों आश्रमों की निन्दा करने वाले पाखंडी होंगे। शूद्र द्विजाति की सेवा नहीं करेंगे। कूट और कपट कुशल शूद्र धर्म का प्रवचन करेंगे ॥५३-५५॥ ब्राह्मण अपने कुलाचार को छोड़कर दूसरे के बनाये अन्न को ही खायेंगे। दुष्ट शूद्र ही संन्यासी