बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)
Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें२६० नारदीयपुराणम् उत्कोचजीविनस्तत्र भविष्यन्ति कलौ मुने । धर्महीनास्तु पाखंडाः कापाला भिक्षवोऽधमाः ॥५७॥ धर्मविध्वंसशीलानां द्विजानां द्विजसत्तम । शूद्रा धर्मान्प्रवक्ष्यन्तिह्याधिरुह्योत्तमासनम् ॥५८॥ एते चान्ये च बहवः नग्नरक्तपटादिकाः । पाषंडाः प्रचरिष्यंति प्रायो वेदविदूषकाः ॥५९॥ गीतवादित्रकुशलाः क्षुद्रधर्मसमाश्रयाः । भविष्यंति कलौ प्रायो धर्मविध्वंसका नराः ॥६०॥ अल्पद्रव्या वृथालिंगा वृथाहंकारदूषिताः । हर्तारः परवित्तानां भवितारो नराधमाः ॥६१॥ प्रतिग्रहपरा नित्यं जगदुन्मार्गशीलिनः । आत्मस्तुतिपराः सर्वे परनिंदापरास्तथा ॥६२॥ विश्वस्तघातिनः क्रूरा दयाधर्मविवर्जिताः । भविष्यंति नरा विप्र कलौ चाधर्मबांधवाः ॥६३॥ परमायुश्च भविता तदा वर्षाणि षोडश । घोरे कलियुगे विप्र पंचवर्षा प्रसूयते ॥६४॥ सप्तवर्षाष्टवर्षाश्च युवानोऽतः परे जरा । स्वकर्मत्यागिनः सर्वे कृतघ्ना भिन्नवृत्तयः ॥६५॥ याचकाश्च द्विजा नित्यं भविष्यन्ति कलौ युगे । परावमाननिरताःप्रहृष्टाः परवेश्मनि ॥६६॥ तत्रैव निंदानिरता वृथाविश्रमिणो जनाः । निंदां कुर्वन्ति सततं पितृमातृसुतेषु च ॥६७॥ वदंति वाचा धर्मांश्च चेतसा पापलोलुपाः । धनविद्यावयोमत्ताः सर्वदुःखपरायणाः ॥६८॥ व्याधितस्करदुर्भिक्षैः पीडिता अतिमायिनः । प्रपुष्यंति वृथैवामी न विचार्य च दुष्कृतम् ॥६९॥ धर्ममार्गप्रणेतारं तिरस्कुर्वंति पापिनः । धर्मकार्ये रतं चैव वृथाविश्रंभिणो जनाः ॥७०॥ भविष्यन्ति कलौ प्राप्ते राजानो म्लेच्छजातयः । शूद्रा भैक्ष्यरताश्चैव तेषां शुश्रूषणे द्विजाः ॥७१॥ न शिष्यो न गुरुः कश्चिन्न पुत्रो न पिता तथा । न भार्या न पतिश्चैव भवितारोऽत्र संकरे ॥७२॥ बनेंगे और उपदेश द्वारा जीविका निर्वाह करेंगे ॥५६॥ हे मुने ! कलियुग में लोग खूब रिश्वत लेंगे । द्विजश्रेष्ठ ! धर्महीन, पाखंडी, कापालिक तथा अधम शूद्र भिक्षु धर्मविमुख द्विजों को उत्तम धर्मासन पर बैठकर धर्मोपदेश करेंगे ॥५७-५८॥ ऐसे पाखण्डपरायण और दूसरे बहुत से, नंगे तथा लाल वस्त्र पहनने वाले कापालिक प्रायः वेद विरुद्ध प्रचार करेंगे ॥५९॥ कलियुग में प्रायः लोग नाचने-गाने में प्रवीण और क्षुद्र धर्म के ही मानने वाले होंगे । उस युग में मनुष्य धर्म-विध्वंसक, दरिद्र, कपट वेष धारण करने वाले और व्यर्थ अहंकार करने वाले होंगे । अधम मानव पर-धन को चुराने वाले होंगे ॥६०-६१॥ प्रतिग्रह लेने वाले और सर्वदा कुपथगामी होंगे । सब आत्मस्तुति करने वाले, पर-निन्दा-परायण, विश्वासघाती, क्रूर, दया धर्म से शून्य और पाप के ही प्रेमी होंगे ॥६२-६३॥ घोर कलियुग आने पर लोगों की परमायु सोलह वर्ष की होगी और पाँच वर्ष की कन्यायें पुत्र प्रसव करेंगी ॥६४॥ सात, आठ वर्ष तक ही युवावस्था रहेगी इसके बाद बुढ़ापा आ जायगा सब ब्राह्मण कुलाचार त्यागी, कृतघ्न, कुल-प्रतिकूल व्यवहार करने वाले और केवल भिखमंगे होंगे । दूसरों को अपमानित करने में लगे रहने वाले दूसरों के घर से ही प्रसन्न रहेंगे ॥६५-६६॥ वहां दूसरों की निन्दा करेंगे और सदा अपनी धाक जमाने का प्रयत्न करेंगे । पिता, माता और पुत्र की निन्दा करेंगे ॥६७॥ और मुंह से तो धर्म की बातें करेंगे परन्तु हृदय से पाप करने के ही लिए उत्सुक रहेंगे । सब लोग धन, विद्या और युवावस्था के मद से मतवाले, पर-पीड़ा-परायण, अतिमायावी और सर्वदा रोग, चोर और दुर्भिक्ष से पीड़ित रहेंगे । अपने दुष्कर्मों पर कुछ भी विचार न कर उसका ही समर्थन करेंगे ॥६८-६९॥ पापी लोग धर्म मार्ग का उपदेश करने वाले धर्माचार्यों का तिरस्कार करेंगे । धर्मकार्य की ओर रुचि रखने वाले की व्यर्थ आडम्बर जमाने वाले निन्दा करेंगे ॥७०॥ राजा म्लेच्छ जाति के ही होंगे । शूद्र भिक्षावृत्ति (साधु बन कर भीख मांगना) अपनायेंगे और द्विज उनकी सेवा करेंगे ॥७१॥ न किसी का कोई गुरु होगा न शिष्य । न कोई अपने पिता की अपेक्षा करेगा, न पिता पुत्र