बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)
Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)
पृष्ठ 280, कुल 1008 में से
संदर्भ में पढ़ेंएकचत्वारिंशोऽध्यायः २६१ कलौ गते भविष्यन्ति धनाढ्या अपि याचकाः । रसविक्रयिणश्चापि भविष्यन्ति द्विजातयः ॥७३॥ धर्मकंचुकसंवीता मुनिवेषधरा द्विजाः । अपण्यविक्रयरता अगम्यागामिनस्तथा ॥७४॥ वेदनिंदापराश्चैव धर्मशास्त्रविनिंदकाः । शूद्रवृत्त्यैव जीवंति नरकार्हा द्विजा मुने ॥७५॥ अनावृष्टिभयं प्राप्ता गगनासक्तदृष्टयः । भविष्यन्ति कलौ मर्त्याः सर्वे क्षुद्भयकातराः ॥७६॥ कंदपर्णफलाहारास्तापसा इव मानवाः । आत्मानं तारयिष्यंति अनावृष्ट्यातिदुःखिताः ॥७७॥ कामार्ता ह्रस्वदेहाश्च लुब्धाश्चाधर्मतत्पराः । कलौ सर्वे भविष्यंति स्वल्पभाग्या बहुप्रजाः ॥७८॥ स्त्रियः स्वपोषणपरा वेश्या लावण्यशीलिकाः । पतिवाक्यमनादृत्य सदान्यगृहत्पराः ॥७६॥ दुःशीला दुष्टशीलेषु करिष्यन्ति सदा स्पृहाम् । असद्वृत्ता भविष्यंति पुरुषेषु कुलांगनाः ॥८०॥ चौरादिभयभीताश्च काष्ठयंत्राणि कुर्वते । दुर्भिक्षकरपीडाभिरतीवोपद्रुता जनाः ॥८१॥ गोधूमान्नयवान्नाढ्ये देशे यास्यंति दुःखिताः । निधाय हृद्यकर्माणि प्रेरयंति वचः शुभम् ॥८२॥ स्वकार्यसिद्धिपर्यंतं बंधुतां कुर्वते जनाः । भिक्षवश्चापि मित्रादिस्नेहसंबंधयन्विताः ॥८३॥ अन्नोपाधिनिमित्तेन शिष्यान्गृह्णन्ति भिक्षवः ॥८४॥ उभाभ्यामथ पाणिभ्यां शिरःकंडूयनं स्त्रियः । कुर्वंत्यो गुरुभर्तॄणामाज्ञामुल्लंघयंति च ॥८५॥ पाषण्डालापनिरता पाषण्डजनसंगिनः । यदा द्विजा भविष्यंति तदा वृद्धिं कलिर्व्रजेत् ॥८६॥ यदा प्रजा न यक्ष्यंति न होष्यंति द्विजातयः । तदैव तु कलेर्वृद्धिरनुमेया विचक्षणैः ॥८७॥
की । भार्या और पति की मर्यादा सर्वथा लुप्त हो जायगी । कलि के अन्तिमचरण में धनी भी भिखमंगे होंगे । द्विजाति रसविक्रयी होंगे ॥७२-७३॥ द्विज धर्म की ओट में अधर्म आचरण और ऋषि मुनि का वेष धारण कर प्रवंचना करेंगे । प्रायः मनुष्य निषिद्ध वस्तुओं का विक्रय करेंगे । अगम्यागमन, वेदनिन्दा और धर्मशास्त्रों की कटु आलोचना नित्य प्रति का कार्य होगा । मुने ! नरक के अधिकारी द्विज शूद्रवृत्ति से ही जीविका निर्वाह करेंगे ॥७४-७५॥ सब अनावृष्टि के भय से दुःखी होकर आकाश की ओर ही आँख लगाए रहेंगे । सब मनुष्य भूख और भय से व्याकुल हो तपस्वी की भांति केवल कंद, पत्तियां और फल खाकर रहेंगे । अनावृष्टि के कारण अति दुःखित होकर लोग किसी प्रकार जीवनयापन करेंगे ॥७६-७७॥ सब कामी, लघुकाय, हत्यारे, अधर्म करने वाले होंगे । इस युग में प्रायः सब दरिद्र परन्तु अधिक सन्तान वाले होंगे ॥७८॥ स्त्रियां केवल उदर-पोषण को ही अपना ध्येय समझेंगी और सुन्दरी स्त्रियां वेश्यावृत्ति को ही अपनायेंगी । वे पति के कथन को तुच्छ समझ कर सदा दूसरे के घर में तत्पर रहेंगी और ये दुःशील स्त्रियां दुष्टों को ही अधिक चाहेंगी । कुलांगनायें भी पुरुषों के प्रति असद् व्यवहार ही करेंगी ॥७६-८०॥ लोग चोरों के डर से सदा काठ के यन्त्र किवाड़ और ताला आदि आत्मरक्षा के लिए बना- येंगे । लोग दुर्भिक्ष और राजकर से पीड़ित होकर गेहूँ और जौ से समृद्ध देशों में भाग जायेंगे । हृदय में अकर्म की योजना रखकर शुभ वाणी मुंह से कहेंगे, परन्तु उनकी वह बन्धुता केवल काम बनने तक ही रहेगी । भिक्षु (संन्यासी) भी मित्र, बन्धु आदि को ममता में फंसे रहेंगे ॥८१-८३॥ वे अन्न और सम्मान के लिए अपने लोगों को शिष्य बनायेंगे ॥८४॥ स्त्रियां दोनों हाथों से शिर खुजलाती हुई गुरुजनों एवं पति की आज्ञा का उल्लंघन करेंगी ॥८५॥ जब द्विज पाखण्ड प्रदर्शन करने लगेंगे सदा धूर्तों की संगति में रहेंगे तब कलियुग की घोरता का अनुमान लग जायगा ॥८६॥ जब प्रजा यज्ञ करना और द्विज लोग हवन करना छोड़ देंगे तब बुद्धि-