बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)
Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें२६२ नारदीयपुराणम् अधर्मवृद्धिर्भविता बालमृत्युपि द्विज । सर्वधर्मेषु नष्टेषु याति निःश्रीकतां जगत् ॥८७॥ एवं कलेः स्वरूपं ते कथितं विप्र सत्तम । हरिभक्तिपरानेष न कलिर्बाधते क्वचित् ॥८८॥ ततः परं कृतयुगे त्रेतायां ध्यानमेव च । द्वापरे यज्ञमेवाहुर्दानमेकं कलौ युगे ॥८९॥ यत्कृते दशभिर्वर्षैस्त्रेतायां शरदा च यत् । द्वापरे यच्च मासेन ह्यहोरात्रेण तत्कलौ ॥९०॥ ध्यायन्कृते यजन्यज्ञैस्त्रेतायां द्वापरेऽर्चयन् । यदाप्नोति तदाप्नोति कलौ संकीर्त्य केशवम् ॥९१॥ अहोरात्रं हरेर्नाम कीर्तयंति च ये नराः । कुर्वंति हरिपुजां वा न कलिर्बाधते च तान् ॥९२॥ नमो नारायणायेति कीर्तयंति च ये नराः । निष्कामा वा सकामा वा न कलिर्बाधते च तान् ॥९३॥ हरिनामपरा ये तु घोरे कलियुगे द्विज । त एव कृतकृत्याश्च न कलिर्बाधते हि तान् ॥९४॥ हरिपुजापरा ये च हरिनामपरायणाः । त एव शिवतुल्याश्च नात्र कार्या विचारणा ॥९५॥ समस्तजगदाधारं परमार्थस्वरूपिणम् । घोरे कलियुगे प्राप्ते विष्णुं ध्यायन्न सीदति ॥९६॥ अहो अति सुभाग्यास्ते सकृद्वै केशवार्चकाः । घोरे कलियुगे प्राप्ते सर्वधर्मविवर्जिते ॥९७॥ न्यूनातिरिक्तदोषाणां कलौ वेदोक्तकर्मणाम् । हरिस्मरणमेवात्र संपूर्णत्वविधायकम् ॥९८॥ हरे केशव गोविंद वासुदेव जगन्मय । इतीरयंति ये नित्यं नहि तान्बाधते कलिः ॥१००॥ शिव शंकर रुद्रेश नीलकंठ त्रिलोचन । इति जलपंन्ति ये वापि कलिस्तान्नपि बाधते ॥१०१॥ महादेव विरूपाक्ष गंगाधर मृडाव्यय । इत्थं वदंति ये विप्र ते कृतार्था न संशयः ॥१०२॥ मानों को समझ लेना चाहिए कि अब घोर कलियुग आ गया ॥८७॥ द्विज ! उस समय अधर्म बढ़ जायगा । बालकों की मृत्यु होगी । सब धर्मों के नष्ट हो जाने पर सारा संसार श्रीहीन हो जायगा ॥८८॥ विप्रश्रेष्ठ, इस भाँति तुमको कलियुग का स्वरूप बता दिया, परन्तु हरिभक्ति के प्रभाव से यह कलियुग भक्तों का कुछ भी न बिगाड़ सकेगा ॥८९॥ इसके अतिरिक्त कृतयुग में ध्यान, त्रेता में यज्ञ, द्वापर में कृष्णा- र्चन और कलियुग में दान ही कलि के प्रभाव को नष्ट करते हैं ॥६०॥ कृतयुग में दश वर्ष तक, त्रेता में एक वर्ष तक और द्वापर में एक मास तक कार्य करने से जो फल मिलता है वही कलि में एक रात और दिन के शुभ कर्म से मिल जाता है ॥९१॥ कृतयुग में ध्यान से, त्रेता में यज्ञ से, द्वापर में हरि-पूजा से जो फल मिलता है वही कलियुग में केवल केशव नाम के कीर्तन से प्राप्त हो जाता है ॥९२॥ जो मनुष्य दिन रात हरिनाम कीर्तन और हरि पूजा करते हैं उनपर कलियुग का प्रभाव नहीं पड़ता ॥९३॥ जो निष्काम या सकाम भाव से 'नमो नारायणाय' इस मन्त्र का जप करते हैं उनको कलियुग पीड़ा नहीं पहुँचा सकता ॥९४॥ द्विज, घोर कलियुग में जो हरिनाम के प्रेमी हैं उनका ही जन्म सफल है और उन पर कलि का प्रभाव नहीं पड़ता ॥९५॥ जो हरिनाम के उपासक हैं, जो हरिपूजा के प्रेमी हैं वे ही शिव के समान हैं, इसमें सन्देह नहीं ॥९६॥ घोर कलि में समस्त जगत् के आधार परमार्थस्वरूप विष्णु का ध्यान करने से कलि कष्ट नहीं दे पाता ॥९७॥ उस घोर कलि में जबकि कहीं किसी प्रकार के धर्म का पता नहीं चलता जो एक बार भी केशव की पूजा कर देते हैं वे अतीव भाग्यशाली हैं ॥९८॥ इस युग में वेदोक्त कर्मों का न्यूनाधिक दोष केवल हरि स्मरण मात्र से दूर होकर पूर्ण हो जाता है ॥९९॥ जो हरि, केशव, गोविन्द, वासुदेव, जगन्मय आदि नामों का उच्चारण नित्य प्रति करते हैं उन पर कलि का कुछ भी प्रभाव नहीं पड़ता ॥१००॥ जो शिव, शंकर, रुद्रेश, त्रिलोचन इन नामों का भी उच्चारण करते हैं उनको भी कलि पीड़ा नहीं पहुँचा पाता ॥१०१॥ विप्र ! जो महादेव, विरूपाक्ष, गंगाधर, मृड, अव्यय आदि नामों को जपते हैं वे निस्सन्दहेह कृतार्थ हो जाते हैं ॥१०२॥जी जनार्दन, जगन्नाथ, पीताम्बर, अच्युत आदि भगवन्नामों का उच्चारण