बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)
Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंएकचत्वारिंशोऽध्यायः २६३ जनार्दन जगन्नाथ पीतांबरधराच्युत । इति वाग्युच्चरंतीह न च तेषां कलेर्भयम् ॥१०३॥ संसारे सुलभाः पुंसां पुत्रदारधनादयः । घोरे कलियुगे विप्र हरिभक्तिस्तु दुर्लभा ॥१०४॥ कर्मश्रद्धाविहीना ये पाखंडा वेदनिंदकाः । अधर्मनिरता नैव नरकार्द्धा हरिस्मृतेः ॥१०५॥ वेदमार्गबहिष्ठानां जनानां पापकर्मणाम् । मनः शुद्धिविहीनानां हरिनाम्रैव निष्कृतिः ॥१०६॥ दैवाधीनं जगत्सर्वमिदं स्थावरजंगमम् । यथाप्रेरितमेतेन तथैव कुरुते द्विज ॥१०७॥ शक्तितः सर्वकर्माणि वेदोक्तानि विधाय च । समर्पयेन्महाविष्णौ नारायणपरायणः ॥१०८॥ समर्पितानि कर्माणि महाविष्णौ परात्मनि । संपूर्णतां प्रयांत्येव हरिस्मरणमात्रतः ॥१०८॥ हरिभक्तिरतानां च पापबंधो न जायते । अतोऽतिदुर्लभा लोके हरिभक्तिर्दुरात्मनाम् ॥११०॥ अहो हरिपरा ये तु कलौ घोरे भयंकरे । ते सुभाग्या महात्मानः सत्संगरहिता अपि ॥१११॥ हरिस्मरणनिष्ठानां शिवनामरतात्मनाम् । सत्यं समस्तकर्माणि यांति संपूर्णतां द्विज ॥११२॥ अहो भाग्यमहो भाग्यं हरिनामरतात्मनाम् । त्रिदशैरपि ते पूज्याः किमन्यैर्बहुभाषितैः ॥११३॥ तस्मात्समस्तलोकानां हितमेव मयोच्यते । हरिनामपरान्मर्त्यान्न कलिर्बाधते क्वचित् ॥११४॥ हरेर्नामैव नामैव नामैव मम जीवनम् । कलौ नास्त्येव नास्त्येव नास्त्येव गतिरन्यथा ॥११५॥ सूत उवाच एवं स नारदो विप्राः सनकेन प्रबोधितः । परां निवृतिमापन्नः पुनरेतदुवाच ह ॥११६॥ करते हैं उनको किसी प्रकार का कलि से भय नहीं होता ॥१०३॥ संसार में पुत्र, स्त्री और धन आदि पाना सुलभ है परन्तु विप्र ! इस घोर कलियुग में हरिभक्ति दुर्लभ वस्तु है ॥१०४॥ जो कर्म और श्रद्धा से हीन हैं, अधार्मिक, पाखण्डी और वेद-निन्दक हैं, वे भी हरि-स्मरण के कारण नरक से बच जाते हैं ॥१०५॥ वेदमार्ग- विरोधी, पाप करने वाले और कलुषित हृदय वाले मनुष्य का भी हरिनाम के द्वारा प्रायश्चित्त हो जाता है ॥१०६॥ यह सारा स्थावर जंगमात्मक जगत् दैव के अधीन है और जैसी उसकी प्रेरणा होती है वैसा कार्य मनुष्य करता है ॥१०७॥ इसलिए शक्ति के अनुसार वेदोक्त विधि से सब कार्यों को करके नारायणपरायण होकर महाविष्णु को समर्पण कर देना चाहिए ॥१०८॥ इस विधि से महाविष्णु को समर्पण करने पर केवल हरि- स्मरण मात्र से सारी न्यूनतायें पूरी हो जाती हैं ॥१०९॥ हरिभक्ति में लीन रहने वाले लोगों को पाप का बन्धन नहीं लगता । अतएव दुष्टों के लिए इस संसार में हरि-भक्ति अत्यन्त दुर्भभ है ॥११०॥ घोर भयंकर कलियुग में जो व्यक्ति हरि-सेवा-परायण रहते हैं वे महात्मा सौभाग्यशाली हैं चाहे उनको सत्संगति प्राप्त हो या न हो ॥१११॥ द्विज ! हरिस्मरण में लगे रहने वाले और शिवनाम का जप करने वाले मनुष्यों के समस्त कर्म अवश्य पूर्ण हो जाते हैं ॥११२॥ हरिनाम में रत रहने वाले सज्जनों के भाग्य की कितनी सराहना की जाय, वे जब देवों के भी पूज्य हैं तब इस विषय में अधिक क्या कहा जाय ॥११३॥ इसलिए मैं सब के हित को ही बात कह रहा हूँ कि हरिनाम प्रेमियों को कलि की बाधा कभी भी नहीं सता सकती ॥११४॥ मेरा तो हरिनाम ही जीवन है, हरिनाम ही सर्वस्व और एक मात्र आधार है, कलि में इसके अतिरिक्त दूसरी कोई गति (आधार) नहीं, यह ध्रुव सत्य है ॥११५॥ सूत बोले- विप्रगण ! सनकजी ने इस प्रकार नारद को उपदेश दिया जिससे वे परमानन्दमग्न हो गए और फिर बोले-॥११६॥