भारतकोश
बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,008 पृष्ठ

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पृष्ठ 283

२६४ नारदीयपुराणम् नारद उवाच भगवन्सर्वशास्त्रज्ञ त्वयातिकरुणात्मना । प्रकाशितं जगज्ज्योतिः परं ब्रह्म सनातनम् ॥११७॥ एतदेव परं पुण्यमेतदेव परं तपः। यः स्मरेत्पुंडरीकाक्षं सर्वपापविनाशनम् ॥११८॥ ब्रह्मन्नानाजगच्चैतदेकचित्संप्रकाशितम् । त्वयोक्तं तत्प्रतीयेऽहं कथं दृष्टांतमंतरा ॥११९॥ तस्माद्येन यथा ब्रह्म प्रतीत बोधितेन तु । तदाख्याहि यथाचित्तं सीदत्स्थितिमवाप्नुयात् ॥१२०॥ एतच्छ्रुत्वा वचो विप्रा नारदस्य महात्मनः । सनकः प्रत्युवाचेदं स्मरन्नारायणं परम् ॥१२१॥ सनक उवाच ब्रह्मन्नहं ध्यानपरो भवेयं सनंदनं पृच्छ यथाभिलाषम् । ॥१२२॥ वेदांतशास्त्रे कुशलस्तवायं निवर्त्तयेद्वा परमार्थवंद्यः ॥१२३॥ इतोरितं समाकर्ण्य सनकस्य स नारद। सनंदनं मोक्षधर्मान्प्रष्टुं समुपचक्रमे ॥१२३॥ श्रीबृहन्नारदीयपुराणे पूर्वभागे प्रथमपादे नाममाहात्म्यन्नामैकचत्वारिंशोऽध्यायः ॥४१॥ नारद बोले- भगवन् ! सर्वशास्त्रज्ञ ! आपने करुणा से द्रवित होकर पर ब्रह्म सनातन ज्योति प्रकाशित कर दी ॥११७॥ जो सब पापों को दूर करने वाले पुण्डरीकाक्ष का स्मरण करता है। यही परम पुण्य है और यही परमतप है ॥११८॥ ब्रह्मन् ! यह नानारूप में प्रतिभासित होने वाला जगत् केवल एक परम ज्योति से ही प्रकाशित होता है इस तथ्य को बिना उदाहरण के मैं कैसे हृदयंगम कर सकता हूँ ॥११९॥ इसलिए जिस ज्ञानी ने जिस रूप से ब्रह्म का साक्षात्कार किया उसको कहिए जिससे कि मेरा भ्रान्त चित्त शान्ति प्राप्त करे ॥१२०॥ विप्रो ! महात्मा नारद की इन बातों को सुनकर सनक ने परम नारायण का स्मरण करते हुए बोले- ॥१२१॥ सनक बोले--ब्रह्मन् ! इस समय मैं ध्यानस्थ हो रहा हूँ, तुम सनन्दन से अपनी इच्छा के अनुसार पूछो। यह वेदान्तशास्त्र में कुशल और वन्दनीय है, यह निश्चित ही तुम्हारी इच्छाओं की पूर्ति कर देगा। वे नारद जी सनक की इन बातों को सुनकर सनन्दन से मोक्ष धर्म पूछने के लिए प्रस्तुत हुए ॥१२२-१२३॥ श्रीनारदीयमहापुराण में विष्णु-नाम-माहात्म्य-वर्णन नामक इकतालीसवाँ अध्याय समाप्त ॥४१॥