भारतकोश
बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,008 पृष्ठ

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पृष्ठ 284

अथ द्विचत्वारिंशोऽध्यायः श्रीनारद उवाच कुतः सृष्टमिदं ब्रह्मञ्जगत्स्थावरजंगमम् । प्रलये च कमभ्येति तन्मे ब्रूहि सनन्दन ॥१॥ ससागरः सगगनः सशैलः सबलाहकः । सभूमिः साग्निपवनो लोकोऽयं केन निर्मितः ॥२॥ कथं सृष्टानि भूतानि कथं वर्णविभक्तयः । शौचाशौचं कथं तेषां धर्माधर्मविधिः कथम् ॥३॥ कीदृशो जीवतां जीवः क्व वा गच्छंति ये मृताः । अस्माल्लोकादमुं लोकं सर्वं शंसतु मे भवान् ॥४॥ सनंदन उवाच शृणु नारद वक्ष्यामि चेतिहासं पुरातनम् । भृगुणाभिहितं शास्त्रं भरद्वाजाय पृच्छते ॥५॥ कैलासशिखरे दृष्ट्वा दीप्यमानं महौजसम् । भृगुं महर्षिमासीनं भरद्वाजोऽन्वपृच्छत ॥६॥ भरद्वाज उवाच कथं जीवो विचरति नानायोनिषु संततम् । कथं मुक्तिश्च संसाराज्जायते तस्य मानद ॥७॥ यश्च नारायणः स्रष्टा स्वयंभूर्भगवान्स्वयम् । सेव्यसेवकभावेन वर्तेते इति तौ सदा ॥८॥ प्रविशंति लये सर्वे यमीशं सचराचराः । लोकानां रमणः सोऽयं निर्गुणश्च निरंजनः ॥६॥ अनिर्देश्योऽप्रतर्क्यश्च कथं ज्ञायेत कैर्मुने । कथमेनं परात्मानं कालशक्तिदुरत्ययम् ॥१०॥ अध्याय ४२ सृष्टि-वर्णन श्रीनारद बोले- ब्रह्मन् ! इस स्थावर जंगममय जगत् की उत्पत्ति किससे हुई और प्रलय में फिर किस में इसका लय होगा, इसको हे सनन्दन ! कृपाकर कहिए ॥१॥ सागर, आकाश, पर्वत, मेघ, पृथ्वी, अग्नि और वायु सहित इस विश्व की रचना किसने की ॥२॥ प्राणियों की सृष्टि कैसे हुई, वर्णव्यवस्था कैसे हुई, उनमें धर्म- अधर्म शौचाशौच की विधियां कैसे प्रचलित हुई ॥३॥ जीवित जीवों के प्राण का स्वरूप क्या है, इन सब बातों को पूर्ण रूप से आप मुझसे कहिए ॥४॥ सनन्दन बोले-नारद ! सुनो, इस विषय में एक पुरातन इतिहास को कह रहा हूँ, जिसको भरद्वाज के पूछने पर भृगु ने कहा था ॥५॥ कैलास शिखर पर महातेजस्वी ज्योति के समान जगमगाते हुये भृगु मुनि को बैठे देखकर भरद्वाज ने पूछा ॥६॥ भरद्वाज बोले- मानद ! जीव किस प्रकार और क्यों सदा नाना योनियों में चक्कर लगाता है, इस संसार से उसकी मुक्ति कैसे होती है ? ॥७॥ जो नारायण और स्रष्टा भगवान् स्वयंभू हैं वे और जीव सर्वदा सेव्य-सेवक भाव से विराजमान रहते हैं। जिनमें समस्त चर-अचर प्रलयकाल में प्रवेश कर जाते हैं, जो स्वयं लोक में रमण करने वाले, निर्गुण और निरंजन हैं, जो अनिर्देश्य और तर्क से अगम्य हैं, उनको कोई कैसे जान सकता है ? ॥८-९३॥ महान् आत्मा, और शक्ति से परे, अगम्य चरित भगवान् की स्तुति वेद कैसे आदरपूर्वक करते ३४-ना० पु०