बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)
Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें२६६ | नारदीयपुराणम् अतर्क्यचरितं वेदाः स्तुवन्ति कथमादरात् । जीवो जीवत्वमुल्लंघ्य कथं ब्रह्म समन्वयात् ॥११॥ एतदिच्छाम्यहं श्रोतुं तन्मे ब्रूहि कृपानिधे । एवं स भगवान्पृष्टो भरद्वाजेन संशयम् ॥१२॥ महर्षिर्ब्रह्मसंकाशः सर्वं तस्मै ततोऽब्रवीत् । भृगुरुवाच ॥१३॥ मानसो नाम यः पूर्वो विश्रुतो वै महर्षिभिः अनादिनिधनो देवस्तथा तेभ्योऽजरामरः । अव्यक्त इति विख्यातः शाश्वतोऽथाक्षयोऽव्ययः ॥१४॥ यतः सृष्टानि भूतानि जायन्ते च म्रियंति च । सोऽसृजत्प्रथमं देवो महान्तं नाम नामतः ॥१५॥ आकाशमिति विख्यातं सर्वभूतधरः प्रभुः । आकाशादभवद्वारि सलिलादग्निमारुतौ ॥१६॥ अग्निमारुतसंयोगातत्तः समभवन्मही । ततस्तेजोमयं दिव्यं पद्मं सृष्टं स्वयंभुवा ॥१७॥ तस्मात्पद्मात्समभवद्ब्रह्मा वेदमयो विधिः । अहंकार इति ख्यातः सर्वभूतात्मभूतकृत् ॥१८॥ ब्रह्मा वै स महातेजा य एते पंच धातवः । शैलास्तस्यास्थिसंघास्तु मेदो मांसं च मेदिनी ॥१९॥ समुद्रास्तस्य रुधिरमाकाशमुदरं तथा । पवनश्चैव निश्वासस्तेजोऽग्निर्निम्नगाः शिराः ॥२०॥ अग्नीषोमौ च चन्द्राकौं नयने तस्य विश्रुते । नभश्चोर्ध्वशिरस्तस्य क्षितिः पादौ भुजौ दिशः ॥२१॥ दुर्विज्ञेयो ह्यचिन्त्यात्मा सिद्धैरपि न संशयः । स एष भगवान्विष्णुरनन्त इति विश्रुतः ॥२२॥ सर्वभूतात्मभूतस्थो दुर्विज्ञेयोऽकृतात्मभिः । अहंकारस्य यःस्रष्टा सर्वभूतभवाय वै ततः समभवद्विश्वं पृष्टोऽहं यदिह त्वया ॥२३॥ हैं । जीव अपने जीव भाव को छोड़कर किस प्रकार ब्रह्म पद को प्राप्त करता है ? ॥१०-११॥ कृपानिधान ! इन सब बातों को मैं सुनना चाहता हूँ । कृपाकर मुझको समझाइये ! भरद्वाज ने इस प्रकार भृगु से अपनी शंकाओं को पूछा । ब्रह्मा के समान उस महर्षि ने इन प्रश्नों को सुनकर सारी बातें भरद्वाज को बता दीं ॥१२॥ भृगु बोले—मानस नामक जिस देव के विषय में महर्षियों ने पहले ही कहा है जो अनादि, अनन्त, अजर, अमर, अव्यक्त, शाश्वत, अक्षय और अव्ययनाम से विख्यात है ॥१३-१४॥ जिससे समस्त भूत उत्पन्न हुए हैं और जिससे सारे प्राणी नष्ट भी होते हैं उस देव ने सर्वप्रथम नाम (शब्द) से महान् नामक तत्त्व को उत्पन्न किया ॥१५॥ वह समस्त भूतों को धारण करने वाला समर्थ ‘आकाश’ नाम से प्रसिद्ध है । आकाश से जल, जल से अग्नि और अग्नि से वायु उत्पन्न हुए ॥१६॥ तदनन्तर अग्नि और वायु के संयोग से पृथ्वी उत्पन्न हुई । स्वयम्भू ने पुनः एक तेजोमय दिव्य कमल को उत्पन्न किया ॥१७॥ उस पद्म से वेदमय ब्रह्मा उत्पन्न हुए । समस्त भूतों का उत्पादक ‘अहंकार’ भी उसका नाम है ॥१८॥ वे महातेजस्वी ब्रह्मा और पंच धातु सब उसके ही रूप हैं । सब पर्वत उस विराट् की हड्डियाँ हैं, मेदिनी मज्जा और मांस है ॥१९॥ समुद्र उसका रक्त और आकाश उदर है । पवन और तेज उस देव का निःश्वास है, नदियाँ उसकी शिरायें (नाड़ियाँ), अग्नि तथा सोम, चन्द्र तथा सूर्य उसके नेत्र हैं, आकाश उसका कपाल, पृथ्वी चरण और दिशायें उसको भुजायें हैं ॥२०-२१॥ उस अचिन्त्य आत्मा को सिद्ध भी कठिनाई से ही जान सकते हैं । वही भगवान् विष्णु अनन्त नाम से प्रसिद्ध है ॥२२॥ सब भूतों में व्याप्त रहने वाले इस परमात्मा को अविवेकी कभी नहीं जान सकते हैं । वह अहंकार तत्त्व का स्रष्टा और समस्त भूतों का एक मात्र आदि कारण है । उससे ही विश्व उत्पन्न हुआ है । तुमने जो कुछ पूछा उसका सारभूत उत्तर यही है ॥२३॥