भारतकोश
बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,008 पृष्ठ

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पृष्ठ 286

द्विचत्वारिंशोऽध्यायः २६७ भरद्वाज उवाच गगनस्य दिशां चैव भूतलस्यानिलस्य च । कान्यत्र परिमाणानि संशयं छिन्धि तत्त्वतः ॥२४॥ भृगुरुवाच अनंतमेतदाकाशं सिद्धदैवतसेवितम् । रम्यं नानाश्रयाकीर्णं यस्यांतो नाधिगम्यते ॥२५॥ ऊर्ध्वं गतेरधस्तात्तु चंद्रादित्यौ न पश्यतः । तत्र देवाः स्वयंदीप्ता भास्कराभाग्निवर्चसः ॥२६॥ ते चाप्यन्तं न पश्यन्ति नभसः प्रथितौजसः । दुर्गमत्वादनंतत्वादिति मे वद मानद ॥२७॥ उपरिष्टोपरिष्टात्तु प्रज्वलद्भिः स्वयंप्रभैः । निरुद्धमेतदाकाशं ह्यप्रमेयं सुरैरपि ॥२८॥ पृथिव्यंते समुद्रास्तु समुद्रांते तमः स्मृतम् । तमसोऽते जलं प्राहुर्जलस्यांतेऽग्निरेव च ॥२९॥ रसातलांते सलिलं जलांते पन्नगाधिपाः । तदंते पुनराकाशमाकाशांते पुनर्जलम् ॥३०॥ एवमंतं भगवतः प्रमाणं सलिलस्य च । अग्निमारुततोयेभ्यो दुर्ज्ञेयं दैवतैरपि ॥३१॥ अग्निमारुततोयानां वर्णाः क्षितितलस्य च । आकाशसदृशा ह्येते भिद्यंते तत्त्वदर्शनात् ॥३२॥ पठंति चैव मुनयः शास्त्रेषु विविधेषु च । त्रैलोक्ये सागरे चैव प्रमाणं विहितं यथा ॥३३॥ अदृश्यो यस्त्वगम्यो यः कः प्रमाणमुदीरयेत् । सिद्धानां देवतानां च परिमीता यदा गतिः ॥३४॥ तवागण्यमनंतस्य नामांतेति विश्रुतम् । नामधेयानुरूपस्य मानसस्य महात्मनः ॥३५॥ भरद्वाज बोले-आकाश, दिशा, पृथ्वी और वायु का परिमाण क्या है, यह मेरा संशय दूर कीजिए ॥२४॥ भृगु बोले-यह सिद्ध और देवताओं से सेवित आकाश अनन्त है, अनेक रमणीय आश्रय-स्थानों से व्याप्त इस आकाश का अन्त नहीं जाना जा सकता ॥२५॥ गति के ऊपर चले जाने पर जहां से नीचे की ओर देखने से चन्द्रमा और सूर्य नहीं दिखाई देते हैं, वहां रहने वाले अपनी देहकान्ति से सूर्य और अग्नि के समान प्रकाशमान देव भी प्रसिद्ध तेजस्वी आकाश का अन्त नहीं जान पाते हैं ॥२६३॥ आकाश के दुर्गम और अनन्त होने के कारण जब देवताओं से भी वह अगम्य और अजेय है तब हे मानद ! तुम्हीं कहो दूसरा कौन उसका परिमाण बता सकता है ? उत्तरोत्तर अपने तेज से दीप्त देवताओं से घिरे हुए इस आकाश के परिमाण को देवता भी नहीं जान सकते हैं ॥२७-२८॥ पृथ्वी के अन्त में समुद्र हैं, समुद्र के अन्त में अन्धकार और अन्धकार के अन्त में जल है, जल के पश्चात् अग्नि वर्तमान है ॥२९॥ इसी प्रकार रसातल के अन्त में सलिल और उसके बाद नागपति शेषनाग है । तत्पश्चात् फिर आकाश और आकाश के बाद पुनः जल है ॥३०॥ इस प्रकार अनन्त शक्तिशाली आकाश और जल का प्रमाण अग्नि, वायु और जल भी नहीं बता सकते, देवताओं की तो कोई गणना ही नहीं ॥३१॥ अग्नि, वायु, जल और पृथ्वी के वर्णों में कोई प्रत्यक्ष अन्तर नहीं है। वे आकाश के समान हैं, केवल सूक्ष्म रूप से तत्त्वतः देखने पर ही भिन्नता जानी जाती है ॥३२॥ मुनियों ने विविध शास्त्रों में तीनों लोकों और समुद्रों का विस्तार प्रमाण बताया है परन्तु जो अदृश्य है, अगम्य है, उसका प्रमाण कौन बता सकता है । सिद्धो और देवों की गति परि- मित है उनसे भी अज्ञेय होने के कारण आकाश का अनन्त नाम प्रसिद्ध है ॥३३-३४॥ नाम के अनुरूप महात्मा मानस की भी यही दशा है । जब उस देव का दिव्य रूप बढ़ता और घटता है तो उसके समान जो अपर देव हैं