भारतकोश
बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,008 पृष्ठ

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पृष्ठ 287

२६८ नारदीयपुराणम् यदा तु दिव्यं यद्रूपं हसते वर्द्धते पुनः । कोऽन्यस्तद्वेदितुं शक्यो योऽपि स्यात्तद्विधोऽपरः ॥३६॥ ततः पुष्करतः सृष्टः सर्वज्ञो मूर्तिमान्प्रभुः । ब्रह्मा धर्ममयः पूर्वः प्रजापतिरनुत्तमः ॥३७॥ भरद्वाज उवाच पुष्करो यदि संभूतो ज्येष्ठं भवति पुष्करम् । ब्रह्माणं पूर्वजं चाह भवान्संदेह एव मे ॥३८॥ भृगुरुवाच मानसस्येह या मूर्तिर्ब्रह्मत्वं समुपागता । तस्यासनविधानार्थं पृथिवी पद्ममुच्यते ॥३६॥ कर्णिका तस्य पद्मस्य मेरुर्गगनमुच्छ्रितः । तस्य मध्ये स्थितो लोकान्सृजत्येष जगद्विधिः ॥४०॥ भरद्वाज उवाच प्रजाविसर्गं विविधं कथं स सृजति प्रभुः । मेरुमध्ये स्थितो ब्रह्मा तद्ब्रूहिद्विजसत्तम ॥४१॥ भृगुरुवाच प्रजाविसर्गं विविधं मानसो मनसाऽसृजत् । संरक्षणाय भूतानां सृष्टं प्रथमतोलम् ॥४२॥ यत्प्राणाः सर्वभूतानां सृष्टं प्रथमतोलम् । यत्प्राणाः सर्वभूतानां वर्द्धते येन च प्रजाः ॥४३॥ परित्यक्ताश्च नश्यंति तेनेदं सर्वमावृतम् । पृथिवी पर्वता मेघा मूर्तिमंतश्च ये परे सर्वं तद्धारुणं ज्ञेयमापस्तस्तंभिरे पुनः ॥४४॥ भरद्वाज उवाच कथं सलिलमुत्पन्नं कथं चैवाग्निमारुतौ । कथं वा मेदिनी सृष्टेत्यत्र मे संशयो महान् ॥४५॥ वे भी किस प्रकार उसकी यथार्थ स्थिति को जान सकते हैं ॥३५-३६॥ सर्वज्ञ प्रभु ने पुष्कर (कमल) से पहले मूर्तिमान् धर्ममय अनुपम प्रजापति ब्रह्मा को उत्पन्न किया ॥३७॥ भरद्वाज बोले-यदि पहले पुष्कर उत्पन्न हुआ तब तो पुष्कर ही ज्येष्ठ है परन्तु आपने तो ब्रह्मा को पूर्वज कहा है, इस विषय में सन्देह हो रहा है ॥३८॥ भृगु बोले-मानस की जो मूर्ति ब्रह्मा के रूप में प्रकट हुई उसी के आसन के लिए पृथ्वी पद्म कही गई है ॥३६॥ उस पद्म की कर्णिका मेरु है जो आकाश को छूमता रहता है । ब्रह्मा उसके मध्य में स्थित होकर लोकों की सृष्टि करता है ॥४०॥ भरद्वाज बोले-द्विजवर्य ! ब्रह्मा मेरु के मध्य रहकर, बाहर किस प्रकार विविध प्रजाओं की सृष्टि करता है ? ॥४१॥ भृगु बोले-मानस ने विविध प्रजासृष्टि को पहले अपने मन से बना डाला । सब प्राणियों की रक्षा के लिए पहले जल उत्पन्न किया गया ॥४२॥ सब प्राणी जिसके सहारे जीते हैं, जिसके द्वारा सब प्राणी बढ़ते हैं और जिसके बिना सब प्राणी नष्ट हो जाते हैं, उससे यह सम्पूर्ण विश्व आवृत है । पृथिवी, पर्वत, मेघ अथवा जितने मूर्तिमान् पदार्थ हैं ये सब जल के ही विभिन्न रूप हैं, जो घनीभूत होकर इस रूप में हो गए हैं ॥४३-४४॥ भरद्वाज बोले-जल कैसे उत्पन्न हुआ, अग्नि, वायु और पृथ्वी कैसे उत्पन्न हुई, इसको कृपाकर बत- लाइए । मुझे महान् सन्देह हो रहा है ॥४५॥