बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)
Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)
२६८ नारदीयपुराणम् यदा तु दिव्यं यद्रूपं हसते वर्द्धते पुनः । कोऽन्यस्तद्वेदितुं शक्यो योऽपि स्यात्तद्विधोऽपरः ॥३६॥ ततः पुष्करतः सृष्टः सर्वज्ञो मूर्तिमान्प्रभुः । ब्रह्मा धर्ममयः पूर्वः प्रजापतिरनुत्तमः ॥३७॥ भरद्वाज उवाच पुष्करो यदि संभूतो ज्येष्ठं भवति पुष्करम् । ब्रह्माणं पूर्वजं चाह भवान्संदेह एव मे ॥३८॥ भृगुरुवाच मानसस्येह या मूर्तिर्ब्रह्मत्वं समुपागता । तस्यासनविधानार्थं पृथिवी पद्ममुच्यते ॥३६॥ कर्णिका तस्य पद्मस्य मेरुर्गगनमुच्छ्रितः । तस्य मध्ये स्थितो लोकान्सृजत्येष जगद्विधिः ॥४०॥ भरद्वाज उवाच प्रजाविसर्गं विविधं कथं स सृजति प्रभुः । मेरुमध्ये स्थितो ब्रह्मा तद्ब्रूहिद्विजसत्तम ॥४१॥ भृगुरुवाच प्रजाविसर्गं विविधं मानसो मनसाऽसृजत् । संरक्षणाय भूतानां सृष्टं प्रथमतोलम् ॥४२॥ यत्प्राणाः सर्वभूतानां सृष्टं प्रथमतोलम् । यत्प्राणाः सर्वभूतानां वर्द्धते येन च प्रजाः ॥४३॥ परित्यक्ताश्च नश्यंति तेनेदं सर्वमावृतम् । पृथिवी पर्वता मेघा मूर्तिमंतश्च ये परे सर्वं तद्धारुणं ज्ञेयमापस्तस्तंभिरे पुनः ॥४४॥ भरद्वाज उवाच कथं सलिलमुत्पन्नं कथं चैवाग्निमारुतौ । कथं वा मेदिनी सृष्टेत्यत्र मे संशयो महान् ॥४५॥ वे भी किस प्रकार उसकी यथार्थ स्थिति को जान सकते हैं ॥३५-३६॥ सर्वज्ञ प्रभु ने पुष्कर (कमल) से पहले मूर्तिमान् धर्ममय अनुपम प्रजापति ब्रह्मा को उत्पन्न किया ॥३७॥ भरद्वाज बोले-यदि पहले पुष्कर उत्पन्न हुआ तब तो पुष्कर ही ज्येष्ठ है परन्तु आपने तो ब्रह्मा को पूर्वज कहा है, इस विषय में सन्देह हो रहा है ॥३८॥ भृगु बोले-मानस की जो मूर्ति ब्रह्मा के रूप में प्रकट हुई उसी के आसन के लिए पृथ्वी पद्म कही गई है ॥३६॥ उस पद्म की कर्णिका मेरु है जो आकाश को छूमता रहता है । ब्रह्मा उसके मध्य में स्थित होकर लोकों की सृष्टि करता है ॥४०॥ भरद्वाज बोले-द्विजवर्य ! ब्रह्मा मेरु के मध्य रहकर, बाहर किस प्रकार विविध प्रजाओं की सृष्टि करता है ? ॥४१॥ भृगु बोले-मानस ने विविध प्रजासृष्टि को पहले अपने मन से बना डाला । सब प्राणियों की रक्षा के लिए पहले जल उत्पन्न किया गया ॥४२॥ सब प्राणी जिसके सहारे जीते हैं, जिसके द्वारा सब प्राणी बढ़ते हैं और जिसके बिना सब प्राणी नष्ट हो जाते हैं, उससे यह सम्पूर्ण विश्व आवृत है । पृथिवी, पर्वत, मेघ अथवा जितने मूर्तिमान् पदार्थ हैं ये सब जल के ही विभिन्न रूप हैं, जो घनीभूत होकर इस रूप में हो गए हैं ॥४३-४४॥ भरद्वाज बोले-जल कैसे उत्पन्न हुआ, अग्नि, वायु और पृथ्वी कैसे उत्पन्न हुई, इसको कृपाकर बत- लाइए । मुझे महान् सन्देह हो रहा है ॥४५॥
द्विचत्वारिंशोऽध्यायः २६६ भृगुरुवाच ब्रह्मकल्पे पुरा ब्रह्मन् ब्रह्मर्षीणां समागमे। लोकसंभवसंदेहः समुत्पन्नो महात्मनाम् ॥४६॥ तेऽतिष्ठन् ध्यानमालम्ब्य मौनमास्थाय निश्चलाः। त्यक्ताहाराः स्पर्द्धमाना दिव्यं वर्षशतं द्विजाः ॥४७॥ तेषां ब्रह्ममयी वाणी सर्वेषां श्रोत्रमागमत्। दिव्या सरस्वती तत्र संबभूव नभस्तलात् ॥४८॥ पुरास्तिमितमाकाशमनंतमचलोपमम्। नष्टचंद्रार्कपवनं प्रसुप्तमिव संबभौ ॥४६॥ ततः सलिलमुत्पन्नं तमसीव तमः परम्। तस्माच्च सलिलोत्पीडादुदतिष्ठत मारुतः ॥५०॥ यथाभवनमच्छिद्रं निःशब्दमिव लक्ष्यते। तच्चांभसा पूर्यमाणं सशब्दं कुरुतेऽनिलः ॥५१॥ तथा सलिलसंरुद्धे नभसोंऽतं निरंतरम्। भित्त्वार्णवतलं वायुः समुत्पतति घोषवान् ॥५२॥ एषु वै चरते वायुरर्णवोत्पीडसंभवः। आकाशस्थानमासाद्य प्रशांतिं नाधिगच्छति ॥५३॥ तस्मिन्वाय्वम्बुसंघर्षे दीप्ततेजा महाबलः। प्रादुरासीदूर्ध्वशिखः कृत्वा निस्तिमिरं तमः ॥५४॥ अग्निः पवनसंयुक्तः खं समाक्षिपते जलम्। तदग्निवायुसंपर्काद्घनत्वमुपपद्यते ॥५५॥ तस्याकाशं निपतितः स्नेहात्तिष्ठति योऽपरः। स संघातत्वमापन्नो भूमितवमनुगच्छति ॥५६॥ रसानां सर्वगंधानां स्नेहानां प्राणिनां तथा। भूमियोंनिरियं ज्ञेया यस्याः सर्वं प्रसूयते ॥५७॥ भरद्वाज उवाच य एते धातवः पंच रक्ष्या यानसृजत्प्रभुः। आवृता यैरिमे लोका महाभूताभिसंज्ञितैः ॥५८॥ भृगु बोले-पहले ब्रह्म-कल्प में ब्रह्मर्षिगण एक दिन इकट्ठे हुए। उन महात्माओं के मन में इसी प्रकार लोक-सृष्टि के विषय में सन्देह हुआ। वे मौन होकर निश्चल भाव से ध्यानस्थ हो गए। इस रहस्य की जानने की उत्सुकता में उन लोगों ने भोजन तक छोड़ दिया ॥४६-४७॥ इस प्रकार उन महर्षियों ने सौ दिव्य वर्ष बिता दिये ॥४८॥ निदान उनको ब्रह्ममयी वाणी सुनाई दी और आकाश से दिव्य सरस्वती प्रकट हुई ॥४८॥ उसके प्रकट होते ही आकाश शान्त, निःशब्द और अचल के समान हो गया। चन्द्र, सूर्य और पवन के बिना उस समय आकाश ऐसा जान पड़ता था मानो सो गया हो ॥४६॥ तदनन्तर जल उत्पन्न हुआ, जैसे अन्धकार से ही अन्ध- कार की उत्पत्ति हुई हो उस जल के संघर्ष या दबाव से वायु उत्पन्न हुआ ॥५०॥ जिस प्रकार छिद्ररहित भवन निःशब्द-सा लगता है और उसे जल से भरे जाने पर, वायु शब्द के सहित कर देता है। उसी प्रकार जल से संरुद्ध आकाश में समुद्र तल का भेदन कर शब्दवान् वायु ऊपर उठता है। इस प्रकार वह वायु समुद्र की हलचल से उत्पन्न होकर गतिमान् होता है। वह आकाश में जाकर शान्त नहीं होता ॥५१-५३॥ उस वायु और जल के संघर्ष से महाशक्तिशाली तेजस्वी अग्नि उत्पन्न हुआ, जिसकी लपटें ऊपर को उठ रही थीं और जिसको प्रभा से सारा आकाश तमोहीन हो गया था ॥५४॥ अग्नि वायु की सहायता से आकाश में जल उछालता है, उस समय अग्नि और वायु के संयोग से जल धीरे-धीरे जमने लगता है और ठोस होकर बादल के रूप में परिणत हो जाता है ॥५५॥ वह जब आकाश में ऊपर उड़ता और जलीय भाग को बरसा देता है तो उसका दूसरा स्नेह- भाग रुक जाता है और वही एक में मिलते-मिलते भूमि के रूप में परिणत हो जाता है। रस, सब प्रकार के गन्ध स्नेह और प्राणियों का उत्पत्ति-स्थान यही भूमि है जिससे यह पदार्थ उत्पन्न होते हैं ॥५६-५७॥ भरद्वाज बोले--जो ये पाँच रक्षणीय धातु हैं जिनकी रचना प्रभु ने की है, जो महाभूत नाम से प्रसिद्ध
२७० नारदीयपुराणम् यदाऽसृजत्सहस्राणि भूतानां स महामतिः । पश्चात्तेष्वेव भूतत्वं कथं समुपपद्यते ॥५९॥ भृगुरुवाच अमितानि महाष्टानि यांति भूतानि संभवम् । अतस्तेषां महाभूतशब्दोऽयमुपपद्यते ॥६०॥ चेष्टा वायुः खमाकाशमूष्माग्निः सलिलं द्रवः । पृथिवी चात्र संघातः शरीरं पांचभौतिकम् ॥६१॥ इत्यतः पंचभिर्युक्तैर्युक्तं स्थावरजंगमम् । श्रोत्रे घ्राणो रसः स्पर्शो दृष्टिश्चेंद्रियसंज्ञिताः ॥६२॥ भरद्वाज उवाच पंचभिर्यदि भूतैस्तु युक्ताः स्थावरजंगमाः । स्थावराणां न दृश्यंते शरीरे पंच धातवः ॥६३॥ अनूष्मणामचेष्टानां घनानां चैव तत्त्वतः । वृक्षाणां नोपलभ्यन्ते शरीरे पंच धातवः ॥६४॥ न शृण्वंति न पश्यंति न गंधरसवेदिनः । न च स्पर्शं हि जानंति ते कथं पंच धातवः ॥६५॥ अद्रवत्वादह्नित्वाद् भूमित्वादवायुतः । आकाशस्याप्रमेयत्वाद्वृक्षाणां नास्ति भौतिकम् ॥६६॥ भृगुरुवाच घनानामपि वृक्षाणामाकाशोऽस्ति न संशयः । तेषां पुष्पफलव्यक्तिर्नित्यं समुपपद्यते ॥६७॥ ऊष्मतो म्लायते पर्णं त्वक्फलं पुष्पमेव च । म्लायते शीर्यते चापि स्पर्शस्तेनात्र विद्यते ॥६८॥ वाय्वग्न्यशनिनिर्घोषैः फलं पुष्पं विशीर्यते । श्रोत्रेण गृह्यते शब्दस्तस्माच्छृण्वंति पादपाः ॥६९॥ वल्ली वेष्टयते वृक्षान्सर्वतश्चैव गच्छति । नह्यदृष्टेश्च मार्गोऽस्ति तस्मात्पश्यंति पादपाः ॥७०॥ पुण्यापुण्यैस्तथा गंधैर्धूपैश्च विविधैरपि । अरोगाः पुष्पिताः संति तस्माज्जिघ्रंति पादपाः ॥७१॥ हैं और जिनसे सारे लोक ढके हैं जब उस महामति ने सहस्रों भूत (प्राणी) बनाये तो क्यों उन पांचों को ही भूत की उपाधि मिली और उन्हीं में भूतत्त्व कैसे संगत हुआ ? ॥५८-५९॥ भृगु बोले—इन्हीं पाँचों पदार्थों से असीम महान् अष्ट भूत उत्पन्न होते हैं, अतएव उनकी महाभूत संज्ञा युक्तियुक्त है। प्राणियों की चेष्टा वायु है, शरीर के स्थान आकाश, ऊष्मा-अग्नि इसके द्रव पदार्थ रक्त आदि जल और ठोस पदार्थ पृथ्वी है। इस प्रकार इन पाँचों महाभूतों का मिलित रूप ही पाञ्चभौतिक शरीर है ॥६०-६१॥ इन पाँचों से ही सारे स्थावर-जंगम बने हुए हैं। श्रोत्र, नासिका, रसना, स्पर्श (त्वक्) और दृष्टि (नेत्र) इन्द्रियाँ कहलाती हैं ॥६२॥ भरद्वाज बोले—यदि सारे स्थावर-जंगम पंच महाभूतों से युक्त रहते हैं तो स्थावर पदार्थों के शरीर में ये पाँच धातु क्यों नहीं दिखाई देते ? ॥६३॥ चेष्टा और ऊष्मा से शून्य वृक्षों के शरीर में तो तत्त्वतः पंच धातु नहीं पाये जाते ॥६४॥ वे न तो सुनते हैं, न देखते हैं। उन्हें न तो गन्ध और रस का ज्ञान रहता है और न स्पर्श का ही। तब उनमें पंच धातु का सम्मिश्रण कैसे माना जाय ॥६५॥ अतएव उनमें द्रवत्व, अग्नित्व, वायुत्व और भूमित्व न होने के कारण और आकाश के अप्रमेय होने के कारण वे भौतिक नहीं हैं ॥६६॥ भृगु बोले—अत्यन्त घने (ठोस) वृक्षों में भी आकाश है इसमें सन्देह नहीं। उनमें फूल-फल सर्वदा निक- लते हैं, गर्मी लगने से उनकी पत्तियाँ, वल्कल (छाल), फल और पुष्प मुरझा जाते हैं, मलिन हो जाते हैं, सूख कर गिर जाते हैं तो क्या उनमें स्पर्श ज्ञान नहीं है ? ॥६७-६८॥ वायु, अग्नि और बिजली की कड़कड़ाहट के शब्द से उनके फल और फूल टूटकर गिर जाते हैं कान से शब्द सुना जाता है; अतः वृक्ष भी सुनते हैं ॥६९॥ लतायें वृक्षों से लिपट जाती हैं, इधर-उधर फैलती भी हैं। बिना नेत्र के मार्ग कैसे दिखाई दे सकता है ? अतः वृक्ष भी देखते हैं ॥७०॥ पुण्य-अपुण्य, विविध गंध और धूप (किरणों) से ये वृक्ष नीरोग रहते और फूलते हैं। इससे जान
द्विचत्वारिंशोऽध्यायः २७१ सुखदुःखयोर्ग्रहणाच्छिन्नस्य च विरोहणात् । जीवं पश्यामि वृक्षाणामचैतन्यं न विद्यते ॥७२॥ तेन तज्जलमादत्ते जरयत्यग्निमारुतौ । आहारपरिणामाच्च स्नेहो वृद्धिश्च जायते ॥७३॥ जंगमानां च सर्वेषां शरीरे पंच धातवः । प्रत्येकशः प्रभिद्यंते यैः शरीरं विचेष्टते ॥७४॥ त्वक् च मांसं तथास्थीनि मज्जा स्नायुश्च पंचमः । इत्येतदिह संघातं शरीरे पृथिवीमये ॥७५॥ तेजो ह्यग्निस्तथा क्रोधश्चक्षुरूष्मा तथैव च । अग्निर्जनयते यच्च पंचाग्नेयाः शरीरिणः ॥७६॥ श्रोत्रं घ्राणं तथास्यं च हृदयं कोष्ठमेव च । आकाशात्प्राणिनामेते शरीरे पंच धातवः ॥७७॥ श्लेष्मा पित्तमथ स्वेदो वसा शोणितमेव च । इत्यापः पंचधा देहे भवंति प्राणिनां सदा ॥७८॥ प्राणात्प्रीयते प्राणी व्यानाद्व्यायच्छते तथा । गच्छत्यपानोऽधश्चैव समानो हृद्यवस्थितः ॥७९॥ उदानादुच्छ्वसितीति पञ्च (प्रति) भेदाच्च भाषते । इत्येते वायवः पंच वेष्टयंतीह देहिनम् ॥८०॥ भूमेर्गंधगुणान्वेत्ति रसं चाद्भ्यः शरीरवान् । तस्य गंधस्य वक्ष्यामि विस्तराभिहितान्गुणान् ॥८१॥ इष्टश्चानिष्टगंधश्च मधुरः कटुरेव च । निर्हारी संहतः स्निग्धो रुक्षो विशद एव च ॥८२॥ एवं नवविधो ज्ञेयः पार्थिवो गंधविस्तरः । ज्योतिः पश्यति चक्षुर्भ्यः स्पर्शं वेत्ति च वायुना ॥८३॥ शब्दः स्पर्शश्च रूपं च रसश्चापि गुणाः स्मृताः । रसज्ञानं तु वक्ष्यामि तन्मे निगदतः शृणु ॥८४॥ रसो बहुविधः प्रोक्त ऋषिभिः प्रथितात्मभिः । मधुरो लवणस्तिक्तः कषायोऽम्लः कटुस्तथा ॥८५॥ एष षड्विधविस्तारो रसो वारिमयः स्मृतः । शब्दः स्पर्शश्च रूपञ्च त्रिगुणं ज्योतिरुच्यते ॥८६॥ ज्योतिः पश्यति रूपाणि रूपं च बहुधा स्मृतम् । ह्रस्वो दीर्घस्तथा स्थूलश्चतुरस्रोऽणुवृत्तवान् ॥८७॥ शुक्लः कृष्णस्तथा रक्तो नीलः पीतोऽरुणस्तथा । कठिनश्चिक्कणः श्लक्ष्णः पिच्छिलो मृदु दारुणः ॥८८॥ पड़ता है कि वृक्ष सूंघते हैं ॥७१॥ पेड़ों को सुख-दुःख का अनुभव होता है, काटे जाने पर वे बढ़ते भी हैं। अतः उनमें जीव है और चेतनता भी ॥७२॥ इसीलिए वे जल पीते हैं, अग्नि और वायु के प्रभाव से वृद्ध भी होते हैं। आहार के अनुसार उनमें रस उत्पन्न होता और वे बढ़ते भी हैं ॥७३॥ और सब जंगमों के शरीर में पांच धातुयें हैं। भिन्न- भिन्न प्रकार की शारीरिक चेष्टाओं द्वारा प्रत्येक धातुओं की अभिव्यक्ति होती है ॥७४॥ इस पृथिवीमय शरीर में त्वक्, मांस, अस्थि, मज्जा और पांचवें स्नायु का संयोग है ॥७५॥ तेज, अग्नि, क्रोध, चक्षु और ऊष्मा इनको अग्नि उत्पन्न करता है। अतः ये पाँचों देह के आग्नेय तत्त्व हैं ॥७६॥ कान, नासिका, मुख, हृदय और कोष्ठ ये शरीर में आकाश से उत्पन्न होते हैं ॥७७॥ प्राणियों के शरीर में कफ, पित्त, स्वेद, वसा (चर्बी) और रक्त ये जल के पाँच रूप हैं ॥७८॥ प्राण वायु से प्राणी तृप्त होता, व्यान से अंग प्रसारण करता, अपान शरीर के अधो भाग से बाहर निकलता है, समान हृदय में रहता और उदान से मनुष्य उच्छ्वास छोड़ता है। इस प्रकार वायु के पाँच भेद हैं। ये पाँच वायु देही को घेरे रहते हैं ॥७९-८०॥ शरीर भूमितत्त्व के कारण गन्ध ग्रहण करता और जल से रस का आस्वादन करता है। उस गन्ध के गुणों को विस्तार के साथ कह रहा हूँ ॥८१॥ इष्ट, अनिष्ट, मधुर, कटु, निर्हारी, संहत, स्निग्ध, रूक्ष और विशद ये नव पार्थिव गन्ध के भेद हैं ॥८२॥ नेत्र से ज्योति देखी जाती है, वायु से स्पर्श का ज्ञान होता है। शब्द, स्पर्श, रूप और रस ये गुण हैं। अब मैं रस का ज्ञान बता रहा हूँ, उसको मुझसे सुनो ॥८३-८४॥ प्रसिद्ध ज्ञानी ऋषियों ने रस के बहुत से भेद कहे हैं। मधुर, लवण, तिक्त, कषाय, अम्ल, कटु ये रस के छह भेद हैं जो जल के ही विकृत रूप हैं ॥८५॥ शब्द, स्पर्श और रूप ये तीनों गुण ज्योति कहे गये हैं। ज्योति से ही रूप का दर्शन होता है। रूप विविध प्रकार के हैं। ह्रस्व, दीर्घ, स्थूल, चौकोर, अणु, शुक्ल, कृष्ण, रक्त, नील, पीत, अरुण, कठिन, चिकना, कोमल, पिच्छिल (फिसलने योग्य), मृदु, दारुण (कठोर)
२७२ नारदीयपुराणम्
एवं षोडशविस्तारो ज्योतिरूपगुणः स्मृतः । तत्रैकगुणमाकाशं शब्द इत्येव तत्स्मृतम् ॥८८॥ तस्य शब्दस्य वक्ष्यामि विस्तारं विविधात्मकम् । षड्जो ऋषभगांधारौ मध्यम धैवतस्तथा ॥८९॥ पंचमश्चापि विज्ञेयस्तथा चापि निषादवान् । एष सप्तविधः प्रोक्तो गुण आकाशसंभवः ॥९०॥ ऐश्वर्येण तु सर्वत्र स्थितोऽपि पटहादिषु । मृदंगभेरीशंखानां स्तनयित्नो रथस्य च ॥९१॥ एवं बहुविधाकारः शब्द आकाशसंभवः । वायव्यस्तु गुणः स्पर्शः स्पर्शश्च बहुधा स्मृतः ॥९२॥ उष्णः शीतः सुखं दुःखं स्निग्धो विशद एव च । तथा खरो मृदुः श्लक्ष्णो लघुर्गुरुतरोऽपि च ॥९३॥ शब्दस्पर्शौ तु विज्ञेयौ द्विगुणो वायुरित्युत । एवमेकादशविधो वायव्यो गुण उच्यते ॥९४॥ आकाशजं शब्दमाहुरेभिर्वायुगुणैः सह । अव्याहतैश्चेतयते नवेति विषमा गतिः ॥९५॥ आप्यायन्ते च ते नित्यं धातवस्तैस्तु धातुभिः । आपोऽग्निर्मारुतश्चैव नित्यं जाग्रति देहिषु ॥९७॥ मूलमेते शरीरस्य व्याप्य प्राणानिह स्थिताः । पार्थिवं धातुमासाद्य यथा चेष्टयते बली ॥९८॥ श्रितो मूर्द्धानमग्निस्तु शरीरं परिपालयेत् । प्राणो मूर्द्धनि वाग्नौ च वर्तमानो विचेष्टते ॥९६॥ स जंतुः सर्वभूतात्मा पुरुषः स सनातनः । मनो बुद्धिरहंकारो भूतानि विषयश्च सः ॥१००॥ एवं त्विह स सर्वत्र प्राणैस्तु परिपाल्यते । पृष्ठतस्तु समानेन स्वां स्वां गतिमुपाश्रितः ॥१०१॥ वस्तिमूलं गुदं चैव पावकं समुपाश्रितः । वहन्मूत्रं पुरीषं वाप्यानः परिवर्तते ॥१०२॥ प्रयत्ने कर्मनियमे य एकत्रित्रिषु वर्तते । उदान इति तं प्राहुरध्यात्मज्ञानकोविदाः ॥१०३॥ संधिष्वपि च सर्वेषु संनिविष्टस्तथानिलः । शरीरेषु मनुष्याणां व्यान इत्युपदिश्यते ॥१०४॥
इस प्रकार ज्योतिर्ग्राह्य रूप के षोडश गुण हैं। इन महाभूतों में आकाश का एक गुण होता है जिसको 'शब्द' कहते हैं ॥८८-८९॥ उस शब्द के विविध रूपों का विस्तार के साथ वर्णन कर रहा हूँ। षड्ज, ऋषभ, गान्धार, मध्यम, धैवत, पंचम और निषाद ये सात प्रकार के आकाश-संभव गुण कहे जाते हैं ॥९०-९१॥ आकाशोत्पन्न शब्द पटह आदि में सर्वत्र गरिमा के साथ स्थित होने पर भी मृदंग, भेरी, शंख, बादल और रथ के भेद से अनेक प्रकार का हो जाता है ॥९२ १/२॥ वायु का गुण स्पर्श ही माना गया है। उष्ण, शीत, सुख, दुःख, स्निग्ध, विशद, खर, मृदु, श्लक्ष्ण, लघु और गुरुतर, ये स्पर्श के भेद हैं ॥९३-९४॥ अथवा वायु के शब्द और स्पर्श ये दो गुण समझने चाहिए। इस प्रकार वायु के गुण ग्यारह होते हैं ॥९५॥ शब्द को आकाशज कहा गया है। वह उन वायुगुणों के साथ अबाध रूप से चेतना प्रदान करता है कि नहीं, यह एक विचारणीय विषय है ॥९६॥ वे धातु अन्य धातुओं के संसर्ग से आप्या- यित होते हैं। प्राणियों में जल, अग्नि और वायु सर्वदा जाग्रत रहते हैं ॥९७॥ ये शरीर के मूल-तत्त्व हैं और प्राणों में व्याप्त होकर रहते हैं। जैसे बलवान् वायु पार्थिव धातु को प्राप्त कर क्रियाएँ उत्पन्न करता है उसी तरह अग्नि मस्तक का आश्रय लेकर शरीर का पालन करता है। प्राण मूर्द्धा अथवा अग्नि से संयुक्त होकर गतिमान् होता है ॥९८-९९॥ वह जीव सब भूत का आत्मा, सनातन पुरुष, मन, बुद्धि, अहंकार, प्राणी और विषय भी है ॥१००॥ इस प्रकार वह इस शरीर में सब प्रकार से प्राणों द्वारा परिपालित होता है। पीछे की ओर वह समान वायु के साथ अपनी गति को प्राप्त करता है ॥१०१॥ वस्तिमूल, गुदा और शरीराग्नि से संपृक्त होकर अपान वायु मूत्र और मल को शरीर से बाहर निकालता है ॥१०२॥ जो वायु शारीरिक प्रयत्न और कर्मनियम (कर्म- संगठन) में प्रवृत्त रहता है उसको अध्यात्मज्ञान के पंडितों ने उदान वायु कहा है ॥१०३॥ मनुष्यों के शरीर की प्रत्येक संधियों में रहने वाला वायु उदान कहा जाता है ॥१०४॥ अग्नि बाँहों में समान के द्वारा प्रेरित होकर
द्विचत्वारिंशोऽध्यायः २७३ बाहुष्वग्निस्तु विततः समानेन समीरितः । रसान्बाहूंश्च दोषांश्च वर्तयन्नतिचेष्टते ॥१०५॥ अपानप्राणयोर्मध्ये प्राणापानसमीहितः । समन्वितस्त्वधिष्ठानं सम्यक् पचति पावकः ॥१०६॥ आस्यं हि पायुपर्यन्तमंते स्याद्गुदसंज्ञिते । रेतस्तस्मात्प्रजायंते सर्वस्रोतांसि देहिनाम् ॥१०७॥ प्राणानां सन्निपाताच्च सन्निपातः प्रजायते । ऊष्मा चाग्निरिति ज्ञेयो योऽन्नं पचति देहिनाम् ॥१०८॥ अग्निवेगवहः प्राणो गुदांते प्रतिहन्यते । स ऊर्ध्वमागम्य पुनः समुत्क्षिपति पावकम् ॥१०९॥ पक्वाशयस्त्वधो नाभ्या ऊर्ध्वमामाशयः स्मृतः । नाभिमूले शरीरस्य सर्वे प्राणाश्च संस्थिताः ॥११०॥ प्रस्थिता हृदयात्सर्वे तिर्यगूर्ध्वमधस्तथा । वहंत्यन्नरसान्नाड्यो दशप्राणप्रचोदिताः ॥१११॥ एष मार्गोऽपि योगानां येन गच्छंति तत्पदम् । जितक्लमाः समा धीरा मूर्द्धन्यात्मानमादधन् ॥११२॥ एवं सर्वेषु विहितप्राणापानेषु देहिनाम् । तस्मिन्समिध्यते नित्यमग्निः स्थाल्यामिवार्हिताः ॥११३॥ इति श्रीबृहन्नारदीयपुराणे पूर्वभागे द्वितीयपादे भृगुभरद्वाजसंवादे जगदुत्पत्तिवर्णनं नाम द्विचत्वारिंशोऽध्यायः ॥४२॥ फैलता है। यह वायु रसों, वाहों और दोषों से सम्बद्ध होकर क्रियाशील रहता है ॥१०५॥ अपान और प्राण के के मध्य में प्राण तथा अपान से प्रेरित एवं समन्वित होकर अग्नि अधिष्ठान (भुक्त द्रव्य) को भली भाँति पकाता है ॥१०६॥ मुख से गुदा तक भुक्त द्रव्य को पहुँचाना अग्नि तथा वायु का ही कार्य है। अन्न-पाचन के बाद वीर्य बनता है और उससे प्राणियों के सब स्रोत उत्पन्न होते हैं। प्राणों के सन्निपात (सम्बन्ध) से सन्निपात रोग होता है। ऊष्मा को अग्नि कहते हैं, जो प्राणियों के खाये हुए अन्न को पकाता है ॥१०७-१०८॥ अग्निवेग से प्रेरित होकर प्राण वायु गुदा के अन्तिम भाग से टकराता है। वह पुनः वहाँ से ऊपर लौटकर पावक को ऊपर की ओर फेंकता है ॥१०९॥ नाभि के नीचे पक्वाशय और ऊपर की ओर आमाशय है, और नाभि के मूल में सब प्राण स्थित हैं ॥११०॥ सभी हृदय केन्द्र से ऊपर, नीचे और तिरछे जाते हैं। नाड़ियाँ प्राणवायु से प्रेरित होकर अन्न रस को इधर-उधर ले जाती हैं ॥१११॥ योगियों के लिए भी यही 'प्राण' मार्ग है जिससे वे ब्रह्म पद को जाते हैं। मूर्धा में आत्मा को व्यवस्थित कर बाह्य बाधाओं को जीत कर धीर योगीजन आत्मपद को प्राप्त करते हैं। इस प्रकार प्राणियों के शरीर में प्राण, अपान आदि की व्यवस्था है, जिसमें शरीराग्नि स्थाली में रखे हुए अग्नि के समान नित्य प्रज्वलित रहती है ॥११२-११३॥ श्रीनारदीय महापुराण में जगदुत्पत्ति-वर्णन नामक बयालीसवां अध्याय समाप्त ॥४२॥ ३५ ना० पु०
अथ त्रिचत्वारिंशोऽध्यायः भरद्वाज उवाच यदि प्राणपतिर्वायुर्वायुरेव विचेष्टते । श्वसित्याभाषते चैव ततो जीवो निरर्थकः ॥१॥ य ऊष्मभाव आग्नेयो वह्निनैवोपलभ्यते । अग्निर्जरयते चैतत्तदा जीवो निरर्थकः ॥२॥ जंतोः प्रह्रियमाणस्य जीवो नैवोपलभ्यते । वायुरेव जहात्येनमूष्मभावश्च नश्यति ॥३॥ यदि वायुमयो जीवः संश्लेषो यदि वायुना । वायुमंडलवत्पश्येद्गच्छेत्सह मरुद्गणैः ॥४॥ संश्लेषो यदि वा तेन यदि तस्मात्प्रणश्यति । महार्णवविमुक्तत्वादन्यत्सलिलभाजनम् ॥५॥ कूपे वा सलिलं दद्यात्प्रदीपं वा हुताशने । क्षिप्रं प्रविश्य नश्येत यथा नश्यत्यसौ तथा ॥६॥ पंचधारणके ह्यस्मिञ्छरीरे जीवितं कृतम् । येषामन्यतराभावाच्चतुर्णां नास्ति संशयः ॥७॥ नश्यंत्यापो ह्यनाहाराद्वायुरुच्छ्वासनिग्रहात् । नश्यते कोष्ठभेदार्थमग्निर्नश्यत्यभोजनात् ॥८॥ व्याधिव्रणपरिक्लेशैर्मेदिनी चैव शीर्यते । पीडितेऽन्यतरे ह्येषां संघात याति पंचताम् ॥६॥ तस्मिन्पञ्चत्वमापन्ने जावः किमनुधावति । किं खेदयति वा जीवः किं शृणोति ब्रवीति च ॥१०॥ एषा गौः परलोकस्थं तारयिष्यति मामिति । यो दत्त्वा म्रियते जंतुः सा गौः कं तारयिष्यति ॥११॥
अध्याय ४३ जीव की गति और द्विज का आचार निरूपण भरद्वाज बोले-- यदि वायु ही प्राणपति है, वही चेष्टायें करता, श्वास वही लेता और बोलता भी वही है तो जीव निरर्थक है ॥१॥ जो ऊष्म भाव अग्नि का ही गुण है वह अग्नि से ही प्राप्त हो जाता है और अग्नि ही बुढ़ापा भी ला देता है तो जीव का क्या अस्तित्व माना जाय ॥२॥ प्राणी के मृत्यु-काल में जीव का निकलना तो देखा नहीं जाता । वायु ही शरीर को छोड़ देता है, जिससे शरीर का ऊष्मभाव नष्ट हो जाता है ॥३॥ यदि जीव वायुमय है, वह वायु से ही चिपका रहता है, वायुमण्डल के समान देखता है, मरुद्गणों के साथ जाता है, यदि उसी (वायु) के साथ उस (जीव) का दृढ़ संयोग है और उससे वियुक्त होने पर उसी तरह नष्ट हो जाता है, जैसे महासागर से अलग हुआ जल अन्य जल-स्थान में या कूप में डाला जाने पर और दीपक अग्नि में डाला जाने पर नष्ट हो जाते हैं ॥४-६॥ जीव इस पाँच भौतिक शरीर में जीवित रहता है । उन पाँच भूतों में एक के अभाव से चारों का अभाव हो जाता है, इसमें सन्देह नहीं ॥७॥ अनाहार के कारण जल तत्त्व नष्ट हो जाता है । श्वास के निरोध से वायु, भोजन न करने से अग्नि, व्याधि, व्रण आदि शारीरिक क्लेश से पृथ्वी तत्त्व नष्ट ही जाता है । इनमें से एक के भी पीड़ित होने पर इनका समूह भी नष्ट हो जाता है । ॥८-९॥ शरीर के छूट जाने पर जीव किसके पीछे जाता है ? अथवा उसको किस बात का खेद रहता है ? क्या सुनता और क्या बोलता है ? ॥१०॥ 'दान में दी हुई यह गाय परलोक में मेरा उद्धार करेगी' यह सोचकर जो जन्तु गाय का दान कर मर जाता है वह गाय किसको तारेगी ? ॥११॥ जब गाय, दाता और प्रतिग्रहीता समान रूप से यहीं
द्विचत्वारिंशोऽध्यायः २७५ गौश्च प्रतिग्रहीता च दाता चैव सखं यदा । इहैव विलयं यांति कुतस्तेषां समागमः ॥१२॥ विहगैरुपभुक्तस्य शैलाग्रात्पतितस्य च । अग्निना चोपयुक्तस्य कुतः संजीवनं पुनः ॥१३॥ छिन्नस्य यदि वृक्षस्य न मूलं प्रतिरोहति । जीवन्त्यस्य प्रवर्तेत मृतः क्व पुनरेष्यति ॥१४॥ जीवमात्रं पुरा सृष्टं यदेतत्परिवर्तते । मृता मृताः प्रणश्यंति बीजाद्बीजं प्रणश्यति ॥१५॥ इति मे संशयो ब्रह्मन्हृदये परिधावति । ते निवर्तय सर्वज्ञ यतस्त्वामाश्रितो ह्यहम् ॥१६॥ सनंदन उवाच एवं पृष्टस्तदानेन स भृगुर्ब्रह्मणः सुतः । पुनराह मुनिश्रेष्ठ तत्संदेहनिवृत्तये ॥१७॥ भृगुरुवाच न प्राणाः सन्ति जीवस्य दत्तस्य च कृतस्य च । याति देहान्तरं प्राणी शरीरं तु विशीर्यते ॥१८॥ न शरीराश्रितो जीवस्तस्मिन्नष्टे प्रणश्यति । समिधामग्निदग्धानां यथाग्निर्दृश्यते तथा ॥१९॥ भरद्वाज उवाच अग्नेर्यथा तस्य नाशात्तद्विनाशो न विद्यते । इन्धनस्योपयोगान्ते स चाग्निर्नोपलभ्यते ॥२०॥ नश्यतीत्येव जानामि शांतमग्निमनिन्धनम् । गतिर्यस्य प्रमाणं वा संस्थानं वा न विद्यते ॥२१॥ भृगुरुवाच समिधामुपयोगान्ते स चाग्निर्नोपलभ्यते । नश्यतीत्येव जानामि शांतमग्निमनिन्धनम् ॥२२॥ मर जाते हैं तब उनका फिर संयोग कैसे होता है ? ॥१२॥ चिड़ियों से खाये जाने पर, पहाड़ की चोटी से गिर कर मरने पर और अग्नि में जल जाने पर जीव को पुनः जीवन कैसे प्राप्त होता है ? ॥१३॥ यदि कटे हुए वृक्ष से जड़ें नहीं निकलतीं या उसकी जड़ पुनः नहीं पनपती है तो प्राणी मरने पर पुनः कैसे जीवन धारण करेगा ॥१४॥ पूर्व काल में जिनकी सृष्टि की गई ऐसे जीव मात्र मर-मर कर नष्ट होते हैं और बीज से बीज उत्पन्न होकर नष्ट होता है। इस प्रकार के सन्देह मेरे हृदय में उठ रहे हैं सर्वज्ञ ! उनको आप दूर कीजिए क्योंकि में इसीलिए आपकी शरण में आया हूँ ॥१५-१६॥ सनन्दन ने कहा- मुनिश्रेष्ठ ! इस प्रकार भरद्वाज के पूछने पर ब्रह्मपुत्र भृगुजी ने उनकी शंकाओं को दूर करने के लिए कहा ॥१७॥— भृगु बोले- ईश्वर निर्मित या दत्त जीव के प्राण नहीं होते जीव मृत्यु के पश्चात् दूसरे शरीर को पा जाता है केवल शरीर नष्ट हो जाता है ॥१८॥ जिस प्रकार काष्ठ के अग्नि में जल जाने पर भी अग्नि उस (दग्ध काष्ठ) में दिखाई पड़ता है उसी तरह शरीराश्रित जीव शरीर के नष्ट हो जाने पर भी नष्ट नहीं होता ॥१९॥ भरद्वाज बोले- जिस प्रकार काष्ठ के नष्ट हो जाने पर अग्नि नष्ट नहीं होता परन्तु इन्धन के अभाव में अग्नि नहीं पाया जाता, काष्ठ के बिना शान्त अग्नि को नष्ट ही समझते हैं क्योंकि (इन्धन के अभाव में) उस (अग्नि) की गति, प्रमाण एवं अवस्थान का पता नहीं चलता है ॥२०-२१॥ भृगु बोले-समिधा न रहने पर अग्नि नहीं जलता, न तो उसकी स्थिति ही संभव है और उसको नष्ट
२७६ नारदीयपुराणम् गतिर्यस्य प्रमाणं वा संस्थानं वा न विद्यते । समिधामुपयोगान्ते यथाग्निर्नोपलभ्यते ॥२३॥ आकाशानुगतत्वाद्वि दुर्ग्राह्यो हि निराश्रयः । तथा शरीरसंयागे जीवो ह्याकाशवत्स्थितः ॥२४॥ न नश्यते सुसूक्ष्मत्वाद्वयथा ज्योतिर्न संशयः । प्राणान्धारयते ह्यग्निः स जीव उपधार्यताम् ॥२५॥ वायुसंधारणो ह्यग्निर्नश्यत्युच्छ्वासनिग्रहात् । तस्मिन्नष्टे शरीराग्नौ ततो देहमचेतनम् ॥२६॥ पतितं याति भूमित्वमयनं तस्य हि क्षिति । जंगमानां हि सर्वेषां स्थावराणां तथैव च ॥२७॥ आकाशं पवनोऽन्वेति ज्योतिस्तमनुगच्छति । तेषां त्रयाणामेकत्वाद्वयं भूमौ प्रतिष्ठितम् ॥२८॥ यत्र खं तत्र पवनस्तत्राग्निर्यत मारुतः । अमूर्तयस्ते विज्ञेया मूर्तिमन्तः शरीरिणः ॥२९॥ भरद्वाज उवाच यद्यग्निमारुतौ भूमिः खमापश्च शरीरिषु । जीवः किंलक्षणस्त्वेत्येतदाचक्ष्व मेऽनघ ॥३०॥ पञ्चात्मके पञ्चरतौ पञ्चविज्ञानसंज्ञके । शरीरे प्राणिनां जीवं वेत्तुमिच्छामि यादृशम् ॥३१॥ मांसशोणितसंघाते मेदःस्नाव्यस्थिसंचये । भिद्यमाने शरीरे तु जीवो नैवोपलभ्यते ॥३२॥ यद्यजीवशरीरं तु पञ्चभूतसमन्वितम् । शरीरे मानसे दुःखे कस्तां वेदयते रुजम् ॥३३॥ शृणोति कथितं जीवः कर्णाभ्यां न शृणोति तत् । महर्षे मनसि व्यग्रे तस्माज्जीवो निरर्थकः ॥३४॥ सर्वे पश्यंति यद्दृश्यं मनोयुक्तेन चक्षुषा । मनसि व्याकुले चक्षुः पश्यन्नपि न पश्यति ॥३५॥ न पश्यति न चाघ्राति न शृणोति न भाषते । न च स्पर्शमसौ वेत्ति निद्रावशगतः पुनः ॥३६॥ हुआ ही समझते हैं; क्योंकि इन्धन के अभाव में उसकी गति, स्थान या प्रमाण का पता नहीं चलता है। जिस प्रकार इन्धन के उपयोग के बिना या उसकी समाप्ति के बाद अग्नि देखा नहीं जाता क्योंकि निराधार वस्तु आकाशानुगत होने के कारण ग्रहण करने योग्य नहीं होती, उसी प्रकार जीव शरीर त्याग के अनन्तर आकाश की भांति स्थित रहता है ॥२२-२४॥ अतएव वह अत्यन्त सूक्ष्म होने के कारण उसी तरह नष्ट नहीं होता जैसे अग्नि, यह निःसन्देह है। अग्नि प्राणों को धारण करता है अतएव अग्नि को ही जीव समझ लो ॥२५॥ वायु के आधार पर ही टिकने वाला अग्नि श्वास के रुक जाने पर दिखाई नहीं देता। शरीराग्नि के नष्ट हो जाने पर देह चेतना शून्य हो जाती है ॥२६॥ शरीर नष्ट होकर भूमि में मिल जाता है क्योंकि उसका आवास स्थान भूमि ही है। सभी जंगम और स्थावरों का भी आवास स्थान वही है ॥२७॥ वायु आकाश का अनुसरण करता है और अग्नि पवन का। उन तीनों में एकता होने के कारण वे भूमि में प्रतिष्ठित हैं ॥२८॥ जहाँ आकाश है वहीं पवन रहता है और जहाँ पवन है वहीं अग्नि की स्थिति होती है। वे अमूर्त हैं, परन्तु शरीरधारी प्राणी मूर्तिमान् हैं ॥२९॥ भरद्वाज बोले-यदि शरीर-धारियों में अग्नि, वायु, भूमि, आकाश और जल यही पाँच तत्त्व हैं, तो जीव का क्या स्वरूप है? अनघ, इस रहस्य को आप मुझसे कहिए ॥३०॥ पंचात्मक, पंचरति और पंच विज्ञाना- त्मक प्राणियों के शरीर में जीव का जो रूप है उसको जानना चाहता हूँ ॥३१॥ इस मांस, शोणित, मेद, स्नायु, और अस्थि-पुंज शरीर के भेदन करने पर जीव का तो कहीं पता नहीं चलता ॥३२॥ यदि यह पाँचभौतिक शरीर जीव हीन है तो शारीरिक और मानसिक दुःख के समय पीड़ा का अनुभव कौन करता है ॥३३॥ महर्षे ! कही हुई बातों को जीव सुनता है, किन्तु मन के व्याकुल रहने पर वह कानों से भी नहीं सुनता, इसलिए जीव निर- र्थक है। मन से युक्त नेत्रों से सब दृश्य पदार्थ को देखते हैं परन्तु मन के व्याकुल रहने पर आँखें देखती हुई भी नहीं देखतीं। एक और बात है कि निद्रा दशा में जीव न तो देखता है, न सुनता है, न सूंघता है, न बोलता है और न तो
त्रिचत्वारिंशोऽध्यायः २७७ हृष्यति क्रुद्ध्यते कोऽत्र शोचत्युद्विजते च कः । इच्छति ध्यायति द्वेष्टि वाक्यं वाचयते च कः ॥३७॥ भृगुरुवाच तं पंचसाधारणमत्र किविच्छरीरमेको वहतेऽन्तरात्मा । स वेत्ति गंधांश्च रसाञ्छु तीश्च स्पर्शं च रूपं च गुणांश्च येऽन्ये ॥३८॥ पंचात्मके पंचगुणप्रदर्शी स सर्वगात्रानुगतोऽन्तरात्मा । सदेति दुःखानि सुखानि चात्र तद्विप्रयोगात्तु न वेत्ति देहम् ॥३६॥ यदान रूपं न स्पर्शो नोष्मभावश्च पावके । तदा शांते शरीराग्नौ देहत्यागेन नश्यति ॥४०॥ आपोमयमिदं सर्वमापोमूर्तिः शरीरिणाम् । तत्रात्मा मानसो ब्रह्मा सर्वभूतेषु लोककृत् ॥४१॥ आत्मानं तं विजानीहि सर्वलोकहितात्मकम् । तस्मिन्यः संश्रितो देहे ह्यन्बिंदुरिव पुष्करे ॥४२॥ क्षेत्रज्ञं तं विजानीहि नित्यं लोकहितात्मकम् । तमोरजश्च सत्त्वं च विद्धि जीवगुणानिमान् ॥४३॥ अचेतनं जीवगुणं वदंति स चेष्टते चेष्टयते च सर्वम् । अतः परं क्षेत्रविदो वदंति प्रावर्तयद्यो भुवनानि सप्त ॥४४॥ न जीवनाशोऽस्ति हि देहभेदे मिथ्यैतदाहुर्मुन इत्यबुद्धाः । जीवस्तु देहांतरितः प्रयाति दशार्द्धतस्तस्य शरीरभेदः ॥४५॥ एवं भूतेषु सर्वेषु गूढश्चरति सर्वदा । दृश्यते त्वग्र्ययाबुद्ध्या सूक्ष्मया तत्त्वदर्शिभिः ॥४६॥ तं पूर्वापररात्रेषु युंजानः सततं बुधः । लब्धाहारो विशुद्धात्मा पश्यत्यात्मानमात्मनि ॥४७॥ उसको स्पर्श का ही ज्ञान रहता है। इस शरीर में कौन क्रोध करता है ? हर्ष, शोक और उद्वेग का अनुभव कौन करता है ? इच्छा, ध्यान और द्वेष कौन करता है ? वाक्योच्चारण किसका कार्य है ? ।।३४-३७।। भृगु ने कहा--इस पांचभौतिक शरीर में एक अन्तरात्मा है जो इस शरीर का वहन करता है। वह गंध, रस को जानता है। सुनता वही है। स्पर्श, रूप और अन्य गुणों का अनुभव करने वाला वही है ।।३८।। सब अंगों में व्याप्त रहने वाला वह अन्तरात्मा इस पंचात्मक शरीर में पांच गुणों (रूप, रस, गन्ध, स्पर्श, शब्द) का दर्शन करता है। उसी के कारण शरीर सदा सुख-दुःख का अनुभव करता है और जिसके वियोग के कारण शरीर की किसी वस्तु का अनुभव नहीं होता ।।३६।। जब रूप, स्पर्श नहीं रहता, अग्नि में उष्ण स्पर्श नहीं रह जाता, उस समय देहाग्नि के शान्त हो जाने पर आत्मा शरीर को छोड़ देता है तथा शरीर नष्ट हो जाता है ।।४०।। सब कुछ जलमय है। शरीर भी जलमय है। सब प्राणियों के इस जलमय शरीर में लोकस्रष्टा मानस ब्रह्मा निवास करता है ।।४१।। उसको सब लोकों का हित करने वाला आत्मा समझो। वह इस शरीर में कमल- पत्र पर पड़े जल बिन्दु के समान निर्लिप्त रहता है ।।४२।। नित्य लोकहित करने वाले उसको क्षेत्रज्ञ समझो। सत्त्व, रज, तम ये जीव के गुण हैं, जीव का गुण अचेतन है। वह आत्मा जब इच्छा करता है तभी सारे पदार्थों में कम्पन होता है। इसके अनन्तर जो सातों लोकों का अधिष्ठाता है उसके विषय में केवल क्षेत्रज्ञ ही जानता है ।।४३-४४।। देह-नाश होने पर जीव का नाश नहीं होता, इसको मिथ्या कहने वाले अज्ञानी हैं। जीव दूसरे शरीर में जाता है परन्तु उस जीव और इस पांचभौतिक शरीर में सर्वथा अन्तर है ।।४५।। इस प्रकार जीव सब प्राणियों में गुप्त रूप से गमनागमन करता है जिसको केवल तत्त्वदर्शी अपनी सूक्ष्म कुशल बुद्धि से ही देख सकते हैं ।।४६।। उसको पूर्व अपर रात्रि में अर्थात् सर्वदा योग युक्त होकर अनायास प्राप्त आहार पर ही संतोष कर जीवन यापन करने वाले विशुद्धात्मा बुध जन ही अपने अन्तःकरण में देखते हैं ।।४७।। अपने चित्त की प्रसन्नता से
२७८ नारदीयपुराणम् चित्तस्य हि प्रसादेन हित्वा कर्म शुभाशुभम् । प्रसन्नात्मात्मनि स्थित्वा सुखमानंत्यमश्नुते ॥४८॥ मानसोऽग्निः शरीरेषु जीव इत्यभिधीयते । सृष्टिः प्रजापतेरेषा भूताध्यात्मविनिश्चये ॥४९॥ असृजद्ब्राह्मणान्नेव पूर्वं ब्रह्मा प्रजापतिः । आत्मतेजोऽभिनिर्वृत्तान्भास्कराग्निसमप्रभान् ॥५०॥ ततः सत्यं च धर्मं च तथा ब्रह्म च शाश्वतम् । आचारं चैव शौचं च स्वर्गाय विदधे प्रभुः ॥५१॥ देवदानवगंधर्वा दैत्यासुरमहोरगाः । यक्षराक्षसनागाश्च पिशाचा मनुजास्तथा ॥५२॥ ब्राह्मणाः क्षत्रिया वैश्याः शूद्राणामसितस्तथा । भरद्वाज उवाच ॥५३॥ चातुर्वर्ण्यस्य वर्णेन यदि वर्णो विभिद्यते स्वेदमूत्रपुरीषाणि श्लेष्मा पित्तं सशोणितम् । त्वन्तः क्षरति सर्वेषां कस्माद्वर्णो विभज्यते ॥५४॥ जंगमानामसंख्येयाः स्थावराणां च जातयः । तेषां विविधवर्णानां कुतो वर्णविनिश्चयः ॥५५॥ भृगुरुवाच न विशेषोऽस्ति वर्णानां सर्वं ब्रह्ममयं जगत् । ब्रह्मणा पूर्वसृष्टं हि कर्मणा वर्णतां गतम् ॥५६॥ कामभोगाः प्रियास्तीक्ष्णाः क्रोधनाप्रियसाहसाः । त्यक्तस्वधर्मरक्तांगास्ते द्विजाः क्षत्रतां गताः ॥५७॥ गोभ्यो वृत्तिं समास्थाय पीताः कृष्युपजीविनः । स्वधर्मान्नानुतिष्ठं ते ते द्विजा वैश्यतां गताः ॥५८॥ हिंसानृतपरा लुब्धाः सर्वकर्मोपजीविनः । कृष्णाः शौचपरिभ्रष्टास्ते द्विजाः शूद्रतां गताः ॥५९॥ इत्येतैः कर्मभिर्व्याप्ता द्विजा वर्णान्तरं गताः । ब्राह्मणा धर्मतन्त्रस्थास्तपस्तेषां न नश्यति ॥६०॥ जीवन के शुभ-अशुभ कर्मों को छोड़कर प्रसन्नात्मा अपने में ही ध्यानस्थ होकर अनन्त सुख का अनुभव करता है ॥४८॥ शरीर में मानस अग्नि को ही जीव कहते हैं, प्रजापति ने भूत (दृश्यमान पदार्थ) और अध्यात्म (परोक्ष- तत्त्व) के निश्चय के लिये इसकी सृष्टि की है ॥४९॥ पहले प्रजापति ब्रह्मा ने अपने तेज से प्रदीप्त एवं सूर्य, अग्नि के समान तेजस्वी ब्राह्मणों को उत्पन्न किया ॥५०॥ तदनन्तर प्रभु ने सत्य, धर्म, शाश्वत ब्रह्म (वेद), आचार और शौच को स्वर्ग प्राप्ति के लिए बनाया ॥५१॥ देव, दानव, गन्धर्व, दैत्य, असुर, महासर्प, यक्ष, राक्षस, नाग, पिशाच, मनुष्य और उनमें ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र और चाण्डालों को बनाया ॥५२½॥ भरद्वाज बोले--चारों वर्णों का विभाग यदि वर्ण-भेद के कारण होता है तो यह उचित नहीं; क्योंकि सब वर्णों के लोग एक ही प्रकार से पसीना छोड़ते, मूत्र, मल, कफ आदि का त्याग करते और पित्त, शोणित में भी समानता है तब क्यों वर्ण-भेद की सृष्टि की गई। असंख्य स्थावर और जंगमों की अनगिनत जातियाँ हैं। उनके विविध वर्णों को देखते हुए वर्ण का निश्चय तो असम्भव जान पड़ता है ॥५३-५५॥ भृगु बोले--वर्णों में कोई विशेषता नहीं, सारा संसार ब्रह्ममय है। ब्रह्मा के पूर्व सृष्ट अपने कर्मों की भिन्नता से भिन्नवर्ण का हो गया। जो द्विज इच्छानुसार भोग करने वाले, उग्र प्रकृति के क्रोधी, साहसी और अपने कर्मों को छोड़ने वाले हुए वे रक्तवर्ण के मनुष्य क्षत्रियत्व को प्राप्त हुए ॥५६-५७॥ जो द्विज अपने द्विजत्व को छोड़कर गौओं का पालन कर जीविका चलाते थे, कृषि-व्यापार जिनको प्रिय थे और जिनकी स्वधर्मानुष्ठान में रुचि नहीं थी वे वैश्यत्व को प्राप्त हुए ॥५८॥ जो द्विज हिंसक, असत्यवादी, वधिक, प्रत्येक पाप कर्म से अपनी जीविका चलाने वाले थे, वे शौच और आचार भ्रष्ट, कृष्णवर्ण के द्विज शूद्रत्व को प्राप्त हुए ॥५९॥ इस प्रकार उपर्युक्त कर्मों के कारण ही द्विज भिन्न वर्णों को प्राप्त हुए। ब्राह्मण धर्मप्रिय और तपस्वी होते हैं। उनकी तपस्या
त्रिचत्वारिंशोऽध्यायः २७६ ब्रह्म धारयतां नित्यं व्रतानि नियमांस्तथा । ब्रह्म चैव पुरा सृष्टं येन जानंति तद्विदः ॥६१॥ तेषां बहुविधास्त्वन्यास्तत्र तत्र द्विजातयः । पिशाचा राक्षसाः प्रेता विविधा म्लेच्छजातयः सा सृष्टिर्मानसी नाम धर्मतंत्रपरायणा ॥६२॥ भरद्वाज उवाच ब्राह्मणः केन भवति क्षत्रियो वा द्विजोत्तम । वैश्यः शूद्रश्च विप्रर्षे तद्ब्रूहि वदतां वर ॥६३॥ भृगुरुवाच जातकर्मोदिभिर्यस्तु संस्कारैः संस्कृतः शुचिः । वेदाध्ययनसंपन्नो ब्रह्मकर्मस्ववस्थितः ॥६४॥ शौचाचारस्थितः सम्यग्विद्याभ्यासी गुरुप्रियः । नित्यव्रती सत्यपरः स वै ब्राह्मण उच्यते ॥६५॥ सत्यं दानमथोद्रोह आनृशंस्यं कृपा घृणा । तपस्यां दृश्यते यत्र स ब्राह्मण इति स्मृतः ॥६६॥ क्षत्रजं सेवते कर्म वेदाध्ययनसंगतः । दानादानरतिर्यस्तु स वै क्षत्रिय उच्यते ॥६७॥ विशत्याशु पशुभ्यश्च कृष्यादानरतिः शुचिः । वेदाध्ययनसंपन्नः स वैश्य इति संज्ञितः ॥६८॥ सर्वभक्षरतिर्नित्यं सर्वकर्मकरोऽशुचिः । त्यक्तवेदस्त्वनाचारः स वै शूद्र इति स्मृतः ॥६९॥ शूद्रे चैतद्भवेल्लक्ष्म द्विजे तच्च न विद्यते । न वै शूद्रो भवेच्छूद्रो ब्राह्मणो ब्राह्मणो न च ॥७०॥ सर्वोपायैस्तु लोभस्य क्रोधस्य च विनिग्रहः । एतत्पवित्रं ज्ञानानां तथा चैवात्मसंयमः ॥७१॥ वर्ज्यौ सर्वात्मना तौ हि श्रेयोघातार्थमुद्यतौ । नित्यक्रोधाच्छ्रियं रक्षेत्तपो रक्षेत्तु मत्सरात् ॥७२॥ कभी नष्ट नहीं होती ॥६०॥ ब्रह्म (वेद ज्ञान) के धारण करने वाले उनके व्रत और नियम कभी भंग नहीं होते । पहले ब्रह्म की ही सृष्टि हुई, जिसका ज्ञान केवल वेदज्ञ ज्ञानियों को ही है ॥६१॥ उसी श्रेणी की अनेकों प्रकार की द्विजातियां यत्र-तत्र हैं । पिशाच-राक्षस, प्रेत और विविध म्लेच्छ जातियां भी इसी प्रकार द्विजाति से भ्रष्ट हैं । वह ब्राह्मण सृष्टि धर्म का ही अनुशासन मानने वाली मानसी सृष्टि है ॥६२॥ भरद्वाज बोले--द्विजोत्तम, किस कर्म से ब्राह्मण होते हैं, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्रों के कर्म क्या हैं, विप्रर्षे ! श्रेष्ठ वाग्मी ! इसको कहिए ॥६३॥ भृगु बोले-जो जाति कर्म आदि से और संस्कारों से संस्कृत और शुचि है, जो वेदाध्ययन में लगा रहता, ब्रह्मकर्म का पालन करता, पवित्र आचारों को ही अपनाता है, सर्वदा गुरु की सेवा में लीन रहकर भली भाँति विद्या का अभ्यास करता है, जो सत्य-परायण और नित्य प्रति व्रतों का अनुष्ठान करता है वही ब्राह्मण कहा जाता है ॥६४-६५॥ सत्य, दान, अद्रोह, कोमलता, कृपा, अघृणा और तपस्या जिस व्यक्ति में दिखाई दे उसको ब्राह्मण कहा जाता है ॥६६॥ जो क्षत्रियोचित कर्मों को वेदाध्ययनपूर्वक करते हैं, दान के लिए आदान (कर लेने) में जिसकी रुचि हो उसको क्षत्रिय कहते हैं ॥६७॥ जो पशुपालन और कृषि द्वारा जीवन-निर्वाह करता जिसकी दान में विशेष रुचि रहती और जो वेदाध्ययन किये हुए हो उसको वैश्य कहा जाता है ॥६८॥ भक्ष्याभक्ष्य का विचार न करने वाला, सब भले-बुरे कामों को करने वाला, अशुचि, वेद मर्यादा को न मानने वाला और आचारहीन शूद्र कहा जाता है ॥६९॥ शूद्र में ये सभी लक्षण होते हैं और द्विज में ये लक्षण नहीं होते हैं । यदि शूद्र में उक्त शूद्र के लक्षण न हों तो वह शूद्र नहीं है और ब्राह्मण में ब्राह्मण के लक्षण न हों तो वह ब्राह्मण नहीं है । सब उपायों से क्रोध और लोभ को वश में करना चाहिए । ज्ञानियों का यह पवित्र धर्म है, आत्मसंयम ही ज्ञानी का मुख्य कर्त्तव्य है ॥७०-७१॥ इन कल्याण के शत्रु क्रोध और लोभ को सर्वथा दूर रखना चाहिए । नित्य क्रोध से श्री की रक्षा और मात्सर्य से तप की रक्षा करनी चाहिए ॥७२॥ मान और अपमान
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२८० नारदीयपुराणम् ॥७३॥ विद्यां मानापमानाभ्यामात्मानं तु प्रमादतः यस्य सर्वे समारंभा निराशीर्बन्धना द्विज । त्यागे यस्य हुतं सर्वं स त्यागी स च बुद्धिमान् ॥७४॥ अहिंस्रः सर्वभूतानां मैत्रायणगतश्चरेत् । परिग्रहात्परित्यज्य भवेद्बुद्ध्या जितेन्द्रियः ॥७५॥ अशोकस्थानमातिष्ठेदिह चामुत्र चाभयम् । तपोनित्येन दांतेन मुनिना संयतात्मना ॥७६॥ अजितं जेतुकामेन व्यासंगेषु ह्यसंगिना । इन्द्रियैर्गृह्यते यद्यत्तत्तद्व्यक्तमिति स्थितिः ॥७७॥ अव्यक्तमिति विज्ञेयं लिङ्गग्राह्यमतीन्द्रियम् । अविश्रंभेण मंतव्यं विश्रंभे धारयेन्मनः ॥७८॥ मनः प्राज्ञेन गृह्णीयात्प्राणं ब्रह्मणि धारयेत् । निर्वेदादेव निर्वाणं न च किंचिद्विचिंतयेत् ॥७९॥ सुखं वै ब्राह्मणो ब्रह्मान्निर्वेदेनाधिगच्छति । शौचे तु सततं युक्तः सदाचारसमन्वितः ॥८०॥ स्वनुक्रोशश्च भूतेषु तद्विज्जातिषु लक्षणम् । सत्यं व्रतं तपः शौचं सत्यं विसृजते प्रजा ॥८१॥ सत्येन धार्यते लोकः स्वः सत्येनैव गच्छति । अनृतं तमसो रूपं तमसा नीयते ह्यधः ॥८२॥ तमोग्रस्तानि पश्यंति प्रकाशं तमसावृताः । सुदुष्प्रकाश इत्याहुर्नरकं तम एव च ॥८३॥ सत्यानृतं तदुभयं प्राप्यते जगतीचरैः । तत्राप्येवंविधा लोके वृत्तिः सत्यानृते भवेत् ॥८४॥ धर्माधर्मौ प्रकाशश्च तमो दुःखसुखं तथा । शरीरैर्मानसैर्दुःखैः [सुखैश्चाप्यसुखोदर्यैः ॥८५॥] लोकसृष्टं प्रपश्यन्तो न मुह्यंति विचक्षणाः । तत्र दुःखविमोक्षार्थं प्रयतेत विचक्षणः ॥८६॥ सुखं ह्यनित्यं भूतानामिह लोके परत्र च । राहुग्रस्तस्य सोमस्य यथा ज्योत्स्ना न भासते ॥८७॥ तथा तमोभिभूतानां भूतानां नश्यते सुखम् ॥८८॥ ────────────────────────────────────────────────────────── से विद्या की और प्रमाद से अपनी रक्षा करनी चाहिए ॥७३॥ द्विज ! जो आशा और फलेच्छा को छोड़कर सब कार्य करता है और जिसने त्याग के अग्नि में अपने सब स्वार्थों की आहुति दे दी वही त्यागी और बुद्धिमान् है ॥७४॥ जो सब प्राणियों के प्रति हिंसा की भावना नहीं रखता, सबके प्रति मैत्री का व्यवहार करता है, जो धन इकट्ठा करने के फेर में न पड़कर विवेकपूर्वक जितेन्द्रिय बनता है वही बुद्धिमान् है ॥७५॥ लोक और परलोक शोक- रहित और अभय स्थान को अपनाना चाहिए । नित्य तपस्या करने वाले मन को वश में रखने वाले, संयमी मुनि अजित को जीतने की इच्छा से, आसक्ति को विराग से जीतने की कामना से इन्द्रियों से जिस-जिस वस्तु को ग्रहण करते हैं उन सब को व्यक्त कहते हैं ॥७६-७७॥ अव्यक्त उसको कहते हैं जो अतीन्द्रिय और लिंग-ग्राह्य अर्थात् अभास मात्र से जानने योग्य हो । सब से पहले मन को अविश्वास से हटाकर विश्वास में लगावे । मन को प्राण से वश में करे और प्राण को ब्रह्म में स्थिर करे । निर्वेद (संसार को असार समझने) से ही निर्वाण प्राप्त होता है। इसके अतिरिक्त दूसरी वस्तु का चिन्तन नहीं करना चाहिए ॥७८-७९॥ ब्रह्मन् ! ब्राह्मण निर्वेद से ही सुख पाता है । वह सर्वदा पवित्र और सदाचार पालन में लीन रहे ॥८०॥ प्राणियों पर दया-भाव रखना ही द्विजाति का लक्षण है । सत्य, व्रत, तप और पवित्रता से ही प्रजा की सृष्टि हुई है ॥८१॥ सत्य से ही यह लोक टिका हुआ है । सत्य से ही स्वर्गलोक भी प्राप्त होता है । अनृत (असत्य) अन्धकार-स्वरूप है । अन्धकार से ही मनुष्य निम्न स्थान की ओर जाता है ॥८२॥ अन्धकार से घिरा और इसमें डूबा मनुष्य प्रकाश का पता नहीं पाता है । प्रकाश को स्वर्ग और अन्धकार को ही नरक कहा जाता है ॥८३॥ सांसारिक प्राणियों को सत्य और असत्य दोनों प्राप्त होते हैं । साथ ही संसार में सत्य और असत्य में लोक-व्यवहार चलता है । धर्म-अधर्म, प्रकाश-अन्धकार, सुख-दुःख से यह लोक व्याप्त है । शारीरिक और मानसिक दुःखों एवं परिणामतः कष्टदायक सुखों से व्याप्त इस लोक-सृष्टि को देखते हुए सुधीजन मोह में नहीं पड़ते, प्रत्युत दुःखों से मुक्ति पाने के लिए यत्न करते हैं ॥८४-८६॥ इस लोक और परलोक में सुख अनित्य है । राहु से ग्रस्त चन्द्रमा की प्रभा शोभा नहीं पाती । उसी प्रकार तम से आच्छाद्य
त्रिचत्वारिंशोऽध्यायः २८१ तत्तत्खलु द्विविधं सुखमुच्यते शारीरं मानसं च। इह खल्वमुष्मिंश्च लोके वस्तुप्रवृत्तयः सुखार्थमभिधीयन्ते नहीतः परत्वापवर्गफलाद्धि शिष्टतरमस्ति। स एव काम्यो गुणविशेषो धर्मार्थगुणारंभस्त द्धेतुरस्योत्पत्तिः सुखप्रयोजनार्थमारंभाः। भरद्वाज उवाच वदैतद्भवताभिहितं सुखानां परमा स्थितिरिति ॥८६॥ न तदुपगृह्णीमो न ह्येषामृषीणां महति स्थितानाम् ॥८०॥ अप्राप्य एष काम्यगुणविशेषो न चैनमभिशीलयंति। तपसि श्रूयते ॥८१॥ त्रिलोककृद्ब्रह्मा प्रभुरेशको तिष्ठति ब्रह्मचारी न कामसुखेष्वात्मानमवदधाति ॥८२॥ अपि च भगवान्विश्वेश्वर उमापतिः काममभिवर्तमानमनंगतवेन सममनयत् ॥८३॥ तस्माद्भूमो न तु महात्मभिरंजयति गृहीतो न त्वेष तावद्विशिष्टो गुणविशेष इति नैतद्भगवतः प्रत्येमि भवता तूक्तं सुखानां परमाः स्त्रिय इति ॥८४॥ लोकप्रवादो हि द्विविधः फलोदयः सुकृतात्सुखमवाप्यतेऽन्यथा दुःखमिति भृगुरुवाच अत्रोच्यते अनृतात्खलु तमः प्रादुर्भूतं ततस्तमोग्रस्ता अधर्ममेवा- नुवर्तते न धर्मं क्रोधलोभमोहहिंसानृतादिमिरवच्छन्नाः खल्व- स्मिँल्लोकेनामुत्र सुखमाप्नुवंति विविधव्याधिरुजोपतापैरवकीर्यन्ते जीवों का सुख नष्ट हो जाता है ॥८७-८८॥ वह सुख दो प्रकार का है शारीरिक और मानसिक। इस लोक और परलोक में सुख के लिए ही प्रत्येक वस्तुओं को ओर प्राणी का झुकाव होता है। लोक-परलोक में मुक्ति से बढ़- कर कोई फल नहीं है। उसी विशेष फल को सभी चाहते हैं। धर्म के लिए ही अपवर्ग गुण की सृष्टि हुई है। सारे आरम्भ सुख के लिए हैं। भरद्वाज बोले-आपने कहा है कि सुख ही लोक में एकमात्र परम काम्य है परन्तु सुख तो मिलता ही नहीं, न तो महत्तत्त्व में रमने वाले महर्षियों को ही प्राप्त होता है। यह काम्य (सुख) प्रायः दुष्प्राप्य है, इस गुण- विशेष की योगी आकांक्षा भी नहीं करते। ऐसा सुना जाता है कि लोककर्ता ब्रह्मा अकेले तपस्या-मग्न रहते हैं। वे ब्रह्मचारी ब्रह्मा काम-सुख को तुच्छ समझते हैं ॥८९-९१॥ इसके विपरीत उमापति विश्वेश्वर ने काम के पीछे पड़कर उसको भस्म करके अनङ्ग बना दिया ॥९२॥ अतएव इस लोक में सुख की ओर महात्माओं का अनुराग नहीं, न तो परम सुख को विशिष्ट गुण हो लोग मानते हैं ॥९३॥ अतः आपकी इस बात में भी कुछ शंका हो जाती है। आपने कहा कि सुख का कारण स्त्रियाँ हैं, ऐसा लोक-प्रसिद्ध है। लोक में फल-प्राप्ति भी दो रूपों में देखी जाती है। शुभ कर्मों से सुख मिलता और अशुभ कर्मों से दुःख ॥९४॥ भृगु बोले- इस विषय में कहता हूँ, सुनिये। अनृत से अन्धकार उत्पन्न हुआ। तदनन्तर अन्धकार में पड़े हुए प्राणी अधर्म को ही अपनाते हैं, धर्म को नहीं। क्रोध, लोभ, मोह, हिंसा, असत्य आदि से विमूढ़ मानव लोक- परलोक कहीं सुख नहीं पाते। वे तो विविध व्याधि, रोग और संताप से ग्रस्त रहते हैं। हत्या, बंधन, क्लेश, भूख, प्यास, श्रम से उत्पन्न रोगों से संतप्त रहते हैं। वर्षा, वायु, सर्दी-गर्मी और शारीरिक दुःखों से कष्ट पाते रहते हैं, ३६ ना० पु०
२८२ नारदीयपुराणम् वधबन्धनपरिक्लेशादिभिश्च क्षुत्पिपासाश्रमकृतैरुपरूपैस्तपप्यंते वर्षवाता- त्युष्णातिशीतकृतैश्च प्रतिभयैः शारीरैर्दुःखैरुयतप्यंते बंधुधनविनाश- विप्रयोगकृतैश्च मानसैः शोकैश्चाभिभूयंते जरामृत्युकृतैश्चान्यैरिति यस्त्वेतैः ॥६५॥ शारीरं मानसं नास्ति न जरा न च पातकम् । नित्यमेव सुखं स्वर्गे सुखं दुःखमिहोभयम् ॥६६॥ नरके दुःखमेवाहुः सुखं तत्परमं पदम् । पृथिवी सर्वभूतानां जनित्री तद्विधाः स्त्रियः ॥६७॥ पुमान्प्रजापतिस्तत्र शुक्लं तेजोमयं विदुः । इत्येतल्लोकनिर्माता धर्मस्य चरितस्य च ॥६८॥ तपसश्च सुतप्तस्य स्वाध्यायस्य हुतस्य च । हुतेन शाम्यते पापं स्वाध्याये शांतिरुत्तमा ॥६९॥ दानेन भोगानित्याहुस्तपसा स्वर्गमाप्नुयात् । दानं तु द्विविधं प्राहुः परत्रार्थमिहैव च ॥१००॥ सद्म्यो यद्दीयते किंचित्तत्परत्रोपतिष्ठते । असद्भ्यो दीयते यत्तु तद्दानमिह भुज्यते यादृशं दीयते दानं तादृशं फलमश्नुतं ॥१०१॥ भरद्वाज उवाच किं कस्य धर्माचरणं किं वा धर्मस्य लक्षणम् । धर्मः कतिविधो वापि तद्भवान्वक्तुमर्हति ॥१०२॥ भृगुरुवाच स्वधर्माचरणे युक्ता ये भवंति मनीषिणः । तेषां स्वर्गफलावाप्तिर्योऽन्यथा स विमुह्यते ॥१०३॥ भरद्वाज उवाच यदेतच्चातुराश्रम्यं ब्रह्मर्षिविहितं पुरा । तेषां स्वे स्वे समाचारास्तन्मे वक्तुमिहार्हसि ॥१०४॥ बन्धुओं और धन के विनाश तथा वियोग से उत्पन्न मानसिक चिन्ता से चिन्तित रहते हैं ॥६५॥ स्वर्ग में शारीरिक अथवा मानसिक किसी प्रकार का कष्ट नहीं होता । वहाँ पाप और बुढ़ापे का भय नहीं । वहाँ सदा सुख ही सुख है । इस भूलोक में सुख-दुःख दोनों हैं ॥६६॥ नरक में केवल दुःख ही है। अतः नित्य सुख ही परम पद है, पृथ्वी सब प्राणियों की जननी है। उसी प्रकार स्त्रियाँ प्रजा की जननी हैं ॥६७॥ पुरुष प्रजापति है। उसका वीर्य तेजोमय है। इस प्रकार प्रजापति ब्रह्मा ने लोक-निर्माण किया है। धर्म, चरित्र, तपस्या, स्वाध्याय और हवन की व्यवस्था उसने ही की है। हवन से सारे पाप नष्ट होते हैं। स्वाध्याय से परम शान्ति प्राप्त होती है ॥९८-९९॥ दान से भोग मिलता और तपस्या से स्वर्ग । दान दो प्रकार के होते हैं—एक तो परलोक में फल देता, दूसरा यहीं फल दे देता है। सत्पात्र को दिया हुआ दान परलोक में फलदायक होता है, परन्तु असत्पात्र में दिया हुआ यहीं फल दे देता है। जैसा दान दिया जाता है वैसा ही फल मिलता है ॥१००-१०१॥ भरद्वाज बोले-धर्म का लक्षण क्या है, किसके प्रति किस प्रकार का धर्माचरण करना चाहिए और धर्म के कितने भेद हैं ? इसको आप कृपा पूर्वक कहिए ॥१०२॥ भृगु ने कहा-जो मनीषी अपने धर्म के पालन में लगे रहते हैं वे स्वर्ग के भागी होते हैं जो ऐसा नहीं करते वे मूढ़ हैं ॥१०३॥ भरद्वाज बोले-ये जो चार आश्रम हैं, जिनकी प्राचीन काल में ब्रह्मर्षि ने व्यवस्था की है, उनके आचारों को आप कृपया कहिए ॥१०४॥
त्रिचत्वारिंशोऽध्यायः २८३ भृगुरुवाच पूर्वमेव भगवता ब्रह्मणा लोकहितमनुतिष्ठता । धर्मसंरक्षणार्थमाश्रमाश्चत्वारोऽभिनिर्दिष्टाः ॥१०५॥ तत्र गुरुकुलवासमेव प्रथममाश्रममाहरंति सम्यगत्र शौचसंस्कारनियमव्रतविनियतात्मा उभे संध्ये भास्करा- ग्निदेवतान्युपस्थाय विहाय तदह्न्यालस्यं गुरोरभिवाद- नवेदाभ्यासश्रवणपवित्रीकृतांतरात्मा त्रिषवणमुपस्पृश्य ब्रह्मचर्याग्निपरिचरणगुरुशुश्रूषानित्या भिक्षाभैक्ष्यादिसर्व- निवेदितांतरात्मा गुरुवचननिदेशानुष्ठानाप्रतिकूलो गुरुप्रसादलब्धस्वाध्यायतत्परः स्यात् ॥१०६॥ भवति चात्र श्लोकः । गुरुं यस्तु समाराध्य द्विजो वेदमवाप्नुयात् । तस्य स्वर्गफलावाप्तिः सिद्धयते चास्य मानसम् । ॥१०७॥ इति गार्हस्थ्यं खलु द्वितीयमाश्रमं वदंति तस्य सदाचारलक्षणं सर्वमनुव्याख्यास्यामः । समावृतानां ॥१०८॥ सदाचाराणां सहधर्मचर्यफलार्थिनां गृहाश्रमो विधीयते धर्मार्थकामावाप्तिह्यत्र त्रिवर्गसाधनमपेक्ष्यागर्हितकर्मणा धनान्यादाय स्वाध्यायोपलब्धप्रकर्षेण वा ब्रह्मर्षिनिर्मितेन वा अद्भिः सागरगतेन वा द्रव्यनियममभ्यासदैवत- प्रसादोपलब्धेन वा धनेन गृहस्थो गार्हस्थ्यं वर्तयेत् ॥१०६॥ भृगु बोले-पहले ही लोक-व्यवस्थापक ब्रह्मा ने विचारपूर्वक धर्म-रक्षा के लिए चार आश्रमों की व्यवस्था की ॥१०५॥ उनमें गुरुकुलवास (ब्रह्मचर्य) पहला आश्रम है । उस आश्रम में रहकर बालक को शौच, संस्कार, नियम, व्रत आदि का पालन करना पड़ता है । प्रतिदिन दोनों काल में सूर्य, अग्नि की पूजा कर निरलस भाव से गुरु का अभिवादन करे; वेदाभ्यास और वेदशिक्षा द्वारा अन्तःकरण को पवित्र करे; त्रिषवन (तीनों संध्या) आचमन कर ब्रह्मचर्य, अग्नि-परिचर्या तथा गुरुसेवा में तत्पर रहकर प्रतिदिन भिक्षा करे और भिक्षा में पाये हुए द्रव्य और अपने को सर्वात्मना गुरु की सेवा में अर्पित कर दे । गुरु की आज्ञा का अक्षरशः पालन करता हुआ, गुरु-कृपा से प्राप्त विद्या और उपदेश को हृदयङ्गम करे ॥१०६॥ इस विषय में एक श्लोक भी है-जो द्विज गुरु की सेवा कर वेदाध्ययन करता है उसको स्वर्ग मिलता है और उसकी सारी मनःकामनायें पूरी होती हैं। इसके बाद दूसरा गृहस्थाश्रम है ॥१०७॥ इस आश्रम के आचारों को कह रहा हूँ । ब्रह्मचर्याश्रम के नियमों का पालन करने के उपरान्त स्त्री के साथ धर्म पालन करने के इच्छुक के लिए यह आश्रम है ॥१०८॥ इस आश्रम में धर्म, अर्थ और काम की प्राप्ति होती है । त्रिवर्ग (धर्म, अर्थ, काम) को दृष्टि में रखकर सत्कर्म द्वारा, अपनी विद्या या ज्ञान के उत्कर्ष द्वारा, ब्रह्मर्षि निर्मित साधन द्वारा, समुद्र यात्रा या सागरगत द्रव्यों के व्यापार द्वारा या अन्य किसी द्रव्योपार्जन के साधन द्वारा अथवा किसी देवता की कृपा से धन प्राप्त कर गृहस्थ अपने आश्रमोचित कार्यों को
२६४ नारदीयपुराणम् तद्धि सर्वाश्रमाणां मूलमुदाहरंति गुरुकुलनिवासिनः परिव्राजका येऽन्ये संकल्पितव्रतविशेषधर्मानुष्ठानिन- ॥११०॥ स्तेषामप्यंतरा च भिक्षाबलिसंविभागाः प्रवर्त्तते वानप्रस्थानां च द्रव्योपस्कार इति प्रायशः खल्वेते साधवः साधुपथ्योदनाः स्वाध्यायप्रसंगिनस्तीर्थाभिगमनदेशदर्श- ॥१११॥ नार्थं पृथिवीं पर्यटंति तेषां प्रत्युत्थानाभिगमनमनसूयावाग्दानसुखसत्कारासन- ॥११२॥ सुखशयनाभ्यवहारसत्क्रिया चेति भवति चात्र श्लोकः अतिथिर्यस्य भग्नाशो गृहात्प्रतिनिवर्तते । स दत्त्वा दुष्कृतं तस्मै पुण्यमादाय गच्छति ॥११३॥ अपि चात्र यज्ञक्रियाभिर्देवताः प्रीयंते निवापेन पितरो ॥११४॥ विद्याभ्यासश्रवणधारणेन ऋषयः अपत्योत्पादनेन प्रजापतिरिति श्लोकौ चात्रभवतः वात्सल्यं सर्वभूतेभ्यो वायोः श्रोत्रस्तथा गिरा । परितापोपघातश्च पारुष्यं चात्र गर्हितम् ॥११५॥ अवज्ञानमहंकारो दंभश्चैव विगर्हितः । अहिंसा सत्यमक्रोधं सर्वाश्रमगतं तपः ॥११६॥ अपि चात्र माल्याभरणवस्त्राभ्यंगानित्योपभोगनृत्यगीत- वादित्रश्रुतिसुखनयनस्नेहरामादर्शनानां प्राप्तिर्भक्ष्यभोज्य ॥११७॥ लेह्यपेयचोष्याणामभ्यवहार्याणां विविधानामुपभोगः करे ॥१०६॥ इस आश्रम को सब आश्रमों का मूल कहा गया है। गुरुकुल निवासी, परिव्राजक अथवा अन्य जो संकल्पित व्रत का अनुष्ठान करने वाले हैं सभी इस आश्रम से भिक्षा और बलि भाग पा जाते हैं ॥११०॥ वान- प्रस्थाश्रम में द्रव्योपार्जन की भावना छोड़ दी जाती है। प्रायः वानप्रस्थाश्रमी साधु सात्विक भोजन करते, सज्जनों के अन्न एवं आतिथ्य को ग्रहण करते, स्वाध्याय और हरिचर्चा में लीन रहकर देशाभ्रमण और तीर्थयात्रा के उद्देश्य से पृथ्वी पर इधर-उधर घूमते हैं ॥१११॥ ऐसे साधुओं का, आने पर उठकर और पास जाकर स्वागत करना, प्रियवाक्य, दान, सुखदायक सत्कार, आसन और सुखपूर्वक सोने की व्यवस्था, मधुर भोजन आदि द्वारा सम्मान करना चाहिए ॥११२॥ इस विषय में भी एक श्लोक है, जिसके घर से अतिथि निराश होकर लौट जाता है वह उस घर वाले को अपना सारा पाप देकर उसके पुण्य को लेकर चला जाता है ॥११३॥ एक बात और है, यज्ञ क्रिया द्वारा देवता प्रसन्न होते हैं; तर्पण और श्राद्ध से पितर, विद्याभ्यास और वेदोपदेश सुनने से ऋषि और पुत्रोत्पादन से प्रजापति प्रसन्न होते हैं ॥११४॥ दो श्लोक और कहे गए हैं कि—सब प्राणियों पर दया, प्राण, वाणी एवं अन्य किसी इन्द्रिय द्वारा किसी को कष्ट न देना प्रत्युत सबके कष्टों को दूर करना, किसी से कठोर व्यवहार न करना यह जीवन की तपस्या है। अपमान, अहंकार और दम्भ अत्यन्त निन्दनीय हैं। अहिंसा, सत्य और अक्रोध सब आश्रमों के लिए विहित तप है। गृहस्थ जीवन में माला, आभरण एवं वस्त्र धारण करना चाहिए। अंगों में अंगराग या लेप लगाना, प्रतिदिन सुखोपभोग करना, नृत्य, श्रुति सुखद गीत और मधुर वाद्य सुनना, नयनों में अंजन लगाना, मनोहर रमणियों का दर्शन, विविध स्वादु भोज्य, लेह्य, पेय और चोष्य खाद्य
त्रिचत्वारिंशोऽध्यायः २८५ स्वविहारसंतोषः कामसुखावाप्तिरिति । त्रिवर्गगुणनिवृत्तिर्यस्य नित्यं गृहाश्रमे । स सुखान्यनुभूयेह शिष्टानां गतिमाप्नुयात् ॥११८॥ उंछवृत्तिर्गृहस्थो यः स्वधर्मचरणे रतः । त्यक्तकामसुखारंभः स्वर्गस्तस्य न दुर्लभः ॥११९॥ वानप्रस्थाः खल्वपि धर्ममनुसरंतः पुण्यानि तीर्थानि नदीप्रस्रवणानि स्वभक्तेष्वरण्येषु मृगवराहमहिषशार्दूल वनगजाकीर्णेषु तपस्यंते अनुसंचरंति ॥१२०॥ त्यक्तग्राम्यवस्त्राभ्यवहारोपभोगा वन्यौषधिफलमूलपर्णप- रिमितविचित्रनियताहाराः स्थानासनिनोभूपाषाणसि- कताशर्कराबालुकाभस्मशायिनः काशकुशचर्मवल्कलसंवृ- तांगाः केशश्मश्रुनखरोमधारीणो नियतकालोपस्पर्शानाः शुष्कबलिहोमकालानुष्ठायिनः । समित्कुशकुसुमापहारसं- मार्जनलब्धविश्रामाःशीतोष्णपवनविष्टंभविभिन्नसर्वत्वचो विविधनियमयोगचर्यानुष्ठानविहीनपरिशुष्कमांसशोणित- त्वगस्थिभूता धृतिपराः सत्त्वयोगाच्छरीराण्युद्वहंते ॥१२१॥ यस्त्वेतां नियतचर्यां ब्रह्मर्षिविहितां चरेत् । स दहेदग्निवद्दोषाञ्जयेल्लोकांश्च दुर्जयान् ॥१२२॥
पदार्थों का सेवन, स्वविहार में सन्तोष और कामसुख की प्राप्ति होती है। जिस गेही के आश्रम में धर्म, अर्थ और काम का नित्य सम्पादन होता है, वह समस्त सांसारिक सुखों का अनुभव कर सज्जनों की गति पाता है ।।११५-११८।। जो गृहस्थ उञ्छवृत्ति द्वारा अपने आश्रम का पालन करता है और जिसने सब सुखदायक पदार्थों और कर्मों का त्याग कर दिया है उसके लिए स्वर्ग दुर्लभ नहीं है ॥११९॥ वानप्रस्थाश्रमी लोग धर्म का पालन करते हुए पुण्य- तीर्थ, नदी, उद्गम स्थान आदि में तथा मृग, वाराह, महिष, व्याघ्र और जंगली हाथियों से भरे वनों में आसन लगाकर तपस्या करें ॥१२०॥ सभी ग्रामीण वस्त्र और भोजन आदि का त्याग कर जंगली ओषधियों, फल, मूल, पत्तियों को परिमित मात्रा में खायें। एक स्थान पर आसन लगाकर बैठें। पृथ्वी, पत्थर, बालू, कंकड़ी अथवा धूल आदि से भरे स्थान पर सो जायें। कास, कुशा, चर्म अथवा वल्कल से अंगों को ढक लें। सिर के केश, दाढ़ी, मूंछ और नख न कटवायें। नियत समय पर स्नान, आचमन आदि करें। हवन काल में शुष्क बलि वैश्व और हवन करें। समिधा, कुश और फूल आदि सामग्री लाकर स्वयं आश्रम में झाडू लगायें इसमें सुख का अनुभव करें। सर्दी, वायु, लू से उनके शरीर की त्वचाएँ फटी हों, विविध नियम, योग और विहित अनुष्ठान से मांस, रक्त एवं चमड़ा सूखकर शरीर केवल अस्थिमात्र शेष रह जाय, इस प्रकार धीरता धरण कर सत्त्वगुण-प्रधान योग- साधना द्वारा समय बितायें ॥१२१॥ जो इस प्रकार ब्रह्मर्षि द्वारा विहित नियत आचार का पालन करता है वह अपने सब पापों को अग्नि की भाँति जलाकर दुर्जय लोकों को भी जीत लेता है ॥१२२॥ अब संन्यास आश्रम के नियमों को बता रहा हूँ।
२८६ नारदीयपुराणम् परिव्राजकानां पुनराचारः तद्यथा । विमुच्याग्निं धनकल- त्रपरिबर्हंसंगेष्वात्मानं स्नेहपाशानवधूय परिव्रजंति । ।।१२३।। समलोष्टाश्मकांचनास्त्रिवर्गप्रवृत्तेष्वसक्तबुद्धयः अरिमित्रोदासीनानां तुल्यदर्शनाः स्थावरजरायुजांडजस्वे- दजानां भूतानां वाङ्मनः कर्मभिरनभिद्रोहिणोऽनिकेताः पर्वतपुलिनवृक्षमूलदेवायतान्यनुसंचरंतो वासार्थमुपेयुर्न- गरं ग्रामं वा न क्रोधदर्पलोभमोहकार्पण्यदंभपरिवादाभि- माननिवृत्तिर्हिंसा इति ।।१२४।। भवंति चात्र श्लोक : अभयं सर्वभूतेभ्यो दत्त्वा यश्चरते मुनिः । न तस्य सर्वभूतेभ्यो भयमुत्पद्यते क्वचित् ।।१२५।। कृत्वाग्निहोत्रं स्वशरीरसंस्थं शरीरमग्निं स्वमुखे जुहोति ।।१२६।। विप्रस्तु भैक्षोपगतैर्हविर्भिश्शिताग्नि संव्रजते हि लोकान् । मोक्षाश्रमं यश्चरते यथोक्तं शुचिः स्वसंकल्पितयुक्तबुद्धिः ।।१२७।। अनिधनं ज्योतिरिव प्रशांतं स ब्रह्मलोकं श्रयते द्विजातिः इति श्रीबृहन्नारदीयपुराणे पूर्वभागे द्वितीयपादे भृगुभारद्वाजसंवादे ब्राह्मणाचारनिरूपणं नाम त्रिचत्वारिंशोऽध्यायः ।।४३।। तीन आश्रमों का पालन करने के बाद मनुष्य अग्नि, धन, स्त्री, सब सामग्रियों और बन्धु जनों से स्नेह संबन्ध तोड़ कर संन्यास ग्रहण कर लेते हैं । इस आश्रम में मिट्टी, पत्थर और सोने को समान समझ कर, त्रिवर्गसाधन से सर्वथा विरक्त हो जाना चाहिए ।।१२३।। शत्रु, मित्र या तटस्थ सब के प्रति समान भाव रखना चाहिए । संन्यासियों को स्थावर, जरायुज, अंडज, स्वेदज अर्थात् किसी भी प्राणी के प्रति मन, वचन और कर्म से भी द्रोहबुद्धि नहीं करनी चाहिए । अपने रहने के लिए घर न बनाकर पर्वत, नदीतट, पेड़ों की छाया अथवा देव-मन्दिर में रहकर अथवा ग्राम-ग्राम, नगर-नगर में घूमते हुए वे (अपना) समय बितायें । उनके हृदय में क्रोध, अभिमान, लोभ, मोह, संकीर्णता, दंभ, निन्दाभावना और हिंसा न रहे ।।१२४।। इस विषय में कहा गया है कि जो मुनि सब प्राणियों को अभय दान देता है उसको कहीं पर किसी जीव से भय नहीं होता है ।।१२५।। जो विप्र अग्नि- होत्र करने के बाद अपने शरीरस्थ अग्नि में मुख के द्वारा भिक्षा द्वारा प्राप्त हविष्य अन्न का हवन करता है वह उत्तम लोकों को प्राप्त करता है ।।१२६।। जो द्विजाति पवित्र होकर दृढ़ संकल्प कर संन्यासाश्रम का पालन करता है, वह स्वयं प्रकाशमान ज्योति की भाँति ब्रह्मलोक में निवास करता है ।।१२७।। श्रीनारदीयमहापुराण में ब्राह्मणाचार निरूपण नामक तैंतालीसवाँ अध्याय समाप्त ।।४३।।
अथ चतुश्चत्वारिंशोऽध्यायः भरद्वाज उवाच आस्मल्लोकात्परो लोकः श्रूयते नोपलभ्यते । तमहं ज्ञातुमिच्छामि तद्भवान्वक्तुमर्हति ॥१॥ भृगुरुवाच उत्तरे हिमवत्पार्श्वे पुण्ये सर्वगुणान्विते । पुण्यः क्षेम्यश्च काम्यश्च स परो लोक उच्यते ॥२॥ तत्र ह्यपापकर्माणः शुचयोऽत्यंतनिर्मलाः । लोभमोहपरित्यक्ता मानवा निरुपद्रवाः ॥३॥ स स्वर्गसदृशो देशः तत्र ह्युक्ताः शुभा गुणाः । काले मृत्युः प्रभवति स्पृशंति व्याधयो न च ॥४॥ न लोभः परदारेषु स्वदारनिरतो जनः । नान्यो हि वध्यते तत्र द्रव्येषु च न विस्मयः ॥५॥ परो ह्यधर्मो नैवास्ति संदेहो नापि जायते । कृतस्य तु फलं तत्र प्रत्यक्षमुपलभ्यते ॥६॥ यानासनाशनोपेताः प्रसादभवनाश्रयाः । सर्वकामैर्वृताः केचिद्धेमाभरणभूषिताः ॥७॥ प्राणधारणमात्रं तु केषांचिदुपपद्यते । श्रमेण महता केचित्कुर्वन्ति प्राणधारणम् ॥८॥ इह धर्मपराः केचित्केचिन्न्नैकृतिका नरा । सुखिता दुःखिताः केचिन्निर्धना धनिनो परे ॥६॥ इह श्रमो भयं मोहः क्षुधा तीव्रा च जायते । लोभश्चार्थकृतो नृणां येन मुह्यंत्यपंडिताः ॥१०॥
अध्याय ४४ ध्यानयोग-निरूपण भरद्वाज बोले--इस लोक से परे दूसरा लोक है ऐसा सुना जाता है परन्तु देखा नहीं जाता, इसलिए उस लोक के विषय में मैं जानना चाहता हूँ। आप कृपाकर कहिए ॥१॥ भृगु बोले--उत्तर दिशा में सब गुणों से युक्त, पवित्र, हिमालय के पार्श्व में एक पवित्र, क्षेमकर, काम्य लोक है उसी को परलोक कहते हैं ॥२॥ वहाँ पुण्यशील, पवित्र, अत्यन्त शुद्ध हृदय, लोभ-मोह से दूर रहने वाले शान्त प्राणी रहते हैं ॥३॥ वह स्वर्गोपम देश है। वहाँ उपर्युक्त शुभगुण सदा रहते हैं। वहाँ समय आने पर ही मृत्यु होती है। रोग तो किसी को होता ही नहीं ॥४॥ किसी को परस्त्रीगमन की इच्छा नहीं होती। सभी स्वस्त्री से ही प्रेम करते हैं। कोई किसी की हत्या नहीं करता और किसी की संपत्ति देखकर दूसरे को आश्चर्य नहीं होता ॥५॥ किसी प्रकार का अधर्म वहाँ नहीं है। न तो किसी के प्रति किसी को सन्देह ही रहता है। किये हुए कर्मों का सबको प्रत्यक्षफल मिलता है ॥६॥ सब बड़े-बड़े महलों में रहते और सवारी, स्थान और भोजन की सुविधा प्रत्येक व्यक्ति को है। सब लोग सभी कामनाओं से पूर्ण रहते हैं। कुछ लोग तो स्वर्णाभरणों से आभूषित रहते हैं। इसके विपरीत इस भूलोक में कुछ तो धर्मपरायण होते और कुछ पाप कर्म को ही इष्ट कर्म ही समझते हैं। यहाँ कोई सुखी है तो कोई दुःखी। कुछ धनी हैं तो कुछ निर्धन ॥७-९॥ यहाँ थकावट, भय, मोह तथा भूख-प्यास लगती है। धन का लोभ मनुष्यों को अत्यधिक है, जिससे अज्ञ जन सर्वदा मोहवश धन की ओर