भारतकोश
बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,008 पृष्ठ

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त्रिचत्वारिंशोऽध्यायः २८५ स्वविहारसंतोषः कामसुखावाप्तिरिति । त्रिवर्गगुणनिवृत्तिर्यस्य नित्यं गृहाश्रमे । स सुखान्यनुभूयेह शिष्टानां गतिमाप्नुयात् ॥११८॥ उंछवृत्तिर्गृहस्थो यः स्वधर्मचरणे रतः । त्यक्तकामसुखारंभः स्वर्गस्तस्य न दुर्लभः ॥११९॥ वानप्रस्थाः खल्वपि धर्ममनुसरंतः पुण्यानि तीर्थानि नदीप्रस्रवणानि स्वभक्तेष्वरण्येषु मृगवराहमहिषशार्दूल वनगजाकीर्णेषु तपस्यंते अनुसंचरंति ॥१२०॥ त्यक्तग्राम्यवस्त्राभ्यवहारोपभोगा वन्यौषधिफलमूलपर्णप- रिमितविचित्रनियताहाराः स्थानासनिनोभूपाषाणसि- कताशर्कराबालुकाभस्मशायिनः काशकुशचर्मवल्कलसंवृ- तांगाः केशश्मश्रुनखरोमधारीणो नियतकालोपस्पर्शानाः शुष्कबलिहोमकालानुष्ठायिनः । समित्कुशकुसुमापहारसं- मार्जनलब्धविश्रामाःशीतोष्णपवनविष्टंभविभिन्नसर्वत्वचो विविधनियमयोगचर्यानुष्ठानविहीनपरिशुष्कमांसशोणित- त्वगस्थिभूता धृतिपराः सत्त्वयोगाच्छरीराण्युद्वहंते ॥१२१॥ यस्त्वेतां नियतचर्यां ब्रह्मर्षिविहितां चरेत् । स दहेदग्निवद्दोषाञ्जयेल्लोकांश्च दुर्जयान् ॥१२२॥

पदार्थों का सेवन, स्वविहार में सन्तोष और कामसुख की प्राप्ति होती है। जिस गेही के आश्रम में धर्म, अर्थ और काम का नित्य सम्पादन होता है, वह समस्त सांसारिक सुखों का अनुभव कर सज्जनों की गति पाता है ।।११५-११८।। जो गृहस्थ उञ्छवृत्ति द्वारा अपने आश्रम का पालन करता है और जिसने सब सुखदायक पदार्थों और कर्मों का त्याग कर दिया है उसके लिए स्वर्ग दुर्लभ नहीं है ॥११९॥ वानप्रस्थाश्रमी लोग धर्म का पालन करते हुए पुण्य- तीर्थ, नदी, उद्गम स्थान आदि में तथा मृग, वाराह, महिष, व्याघ्र और जंगली हाथियों से भरे वनों में आसन लगाकर तपस्या करें ॥१२०॥ सभी ग्रामीण वस्त्र और भोजन आदि का त्याग कर जंगली ओषधियों, फल, मूल, पत्तियों को परिमित मात्रा में खायें। एक स्थान पर आसन लगाकर बैठें। पृथ्वी, पत्थर, बालू, कंकड़ी अथवा धूल आदि से भरे स्थान पर सो जायें। कास, कुशा, चर्म अथवा वल्कल से अंगों को ढक लें। सिर के केश, दाढ़ी, मूंछ और नख न कटवायें। नियत समय पर स्नान, आचमन आदि करें। हवन काल में शुष्क बलि वैश्व और हवन करें। समिधा, कुश और फूल आदि सामग्री लाकर स्वयं आश्रम में झाडू लगायें इसमें सुख का अनुभव करें। सर्दी, वायु, लू से उनके शरीर की त्वचाएँ फटी हों, विविध नियम, योग और विहित अनुष्ठान से मांस, रक्त एवं चमड़ा सूखकर शरीर केवल अस्थिमात्र शेष रह जाय, इस प्रकार धीरता धरण कर सत्त्वगुण-प्रधान योग- साधना द्वारा समय बितायें ॥१२१॥ जो इस प्रकार ब्रह्मर्षि द्वारा विहित नियत आचार का पालन करता है वह अपने सब पापों को अग्नि की भाँति जलाकर दुर्जय लोकों को भी जीत लेता है ॥१२२॥ अब संन्यास आश्रम के नियमों को बता रहा हूँ।