बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)
Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें२६४ नारदीयपुराणम् तद्धि सर्वाश्रमाणां मूलमुदाहरंति गुरुकुलनिवासिनः परिव्राजका येऽन्ये संकल्पितव्रतविशेषधर्मानुष्ठानिन- ॥११०॥ स्तेषामप्यंतरा च भिक्षाबलिसंविभागाः प्रवर्त्तते वानप्रस्थानां च द्रव्योपस्कार इति प्रायशः खल्वेते साधवः साधुपथ्योदनाः स्वाध्यायप्रसंगिनस्तीर्थाभिगमनदेशदर्श- ॥१११॥ नार्थं पृथिवीं पर्यटंति तेषां प्रत्युत्थानाभिगमनमनसूयावाग्दानसुखसत्कारासन- ॥११२॥ सुखशयनाभ्यवहारसत्क्रिया चेति भवति चात्र श्लोकः अतिथिर्यस्य भग्नाशो गृहात्प्रतिनिवर्तते । स दत्त्वा दुष्कृतं तस्मै पुण्यमादाय गच्छति ॥११३॥ अपि चात्र यज्ञक्रियाभिर्देवताः प्रीयंते निवापेन पितरो ॥११४॥ विद्याभ्यासश्रवणधारणेन ऋषयः अपत्योत्पादनेन प्रजापतिरिति श्लोकौ चात्रभवतः वात्सल्यं सर्वभूतेभ्यो वायोः श्रोत्रस्तथा गिरा । परितापोपघातश्च पारुष्यं चात्र गर्हितम् ॥११५॥ अवज्ञानमहंकारो दंभश्चैव विगर्हितः । अहिंसा सत्यमक्रोधं सर्वाश्रमगतं तपः ॥११६॥ अपि चात्र माल्याभरणवस्त्राभ्यंगानित्योपभोगनृत्यगीत- वादित्रश्रुतिसुखनयनस्नेहरामादर्शनानां प्राप्तिर्भक्ष्यभोज्य ॥११७॥ लेह्यपेयचोष्याणामभ्यवहार्याणां विविधानामुपभोगः करे ॥१०६॥ इस आश्रम को सब आश्रमों का मूल कहा गया है। गुरुकुल निवासी, परिव्राजक अथवा अन्य जो संकल्पित व्रत का अनुष्ठान करने वाले हैं सभी इस आश्रम से भिक्षा और बलि भाग पा जाते हैं ॥११०॥ वान- प्रस्थाश्रम में द्रव्योपार्जन की भावना छोड़ दी जाती है। प्रायः वानप्रस्थाश्रमी साधु सात्विक भोजन करते, सज्जनों के अन्न एवं आतिथ्य को ग्रहण करते, स्वाध्याय और हरिचर्चा में लीन रहकर देशाभ्रमण और तीर्थयात्रा के उद्देश्य से पृथ्वी पर इधर-उधर घूमते हैं ॥१११॥ ऐसे साधुओं का, आने पर उठकर और पास जाकर स्वागत करना, प्रियवाक्य, दान, सुखदायक सत्कार, आसन और सुखपूर्वक सोने की व्यवस्था, मधुर भोजन आदि द्वारा सम्मान करना चाहिए ॥११२॥ इस विषय में भी एक श्लोक है, जिसके घर से अतिथि निराश होकर लौट जाता है वह उस घर वाले को अपना सारा पाप देकर उसके पुण्य को लेकर चला जाता है ॥११३॥ एक बात और है, यज्ञ क्रिया द्वारा देवता प्रसन्न होते हैं; तर्पण और श्राद्ध से पितर, विद्याभ्यास और वेदोपदेश सुनने से ऋषि और पुत्रोत्पादन से प्रजापति प्रसन्न होते हैं ॥११४॥ दो श्लोक और कहे गए हैं कि—सब प्राणियों पर दया, प्राण, वाणी एवं अन्य किसी इन्द्रिय द्वारा किसी को कष्ट न देना प्रत्युत सबके कष्टों को दूर करना, किसी से कठोर व्यवहार न करना यह जीवन की तपस्या है। अपमान, अहंकार और दम्भ अत्यन्त निन्दनीय हैं। अहिंसा, सत्य और अक्रोध सब आश्रमों के लिए विहित तप है। गृहस्थ जीवन में माला, आभरण एवं वस्त्र धारण करना चाहिए। अंगों में अंगराग या लेप लगाना, प्रतिदिन सुखोपभोग करना, नृत्य, श्रुति सुखद गीत और मधुर वाद्य सुनना, नयनों में अंजन लगाना, मनोहर रमणियों का दर्शन, विविध स्वादु भोज्य, लेह्य, पेय और चोष्य खाद्य