बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)
Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंत्रिचत्वारिंशोऽध्यायः २८३ भृगुरुवाच पूर्वमेव भगवता ब्रह्मणा लोकहितमनुतिष्ठता । धर्मसंरक्षणार्थमाश्रमाश्चत्वारोऽभिनिर्दिष्टाः ॥१०५॥ तत्र गुरुकुलवासमेव प्रथममाश्रममाहरंति सम्यगत्र शौचसंस्कारनियमव्रतविनियतात्मा उभे संध्ये भास्करा- ग्निदेवतान्युपस्थाय विहाय तदह्न्यालस्यं गुरोरभिवाद- नवेदाभ्यासश्रवणपवित्रीकृतांतरात्मा त्रिषवणमुपस्पृश्य ब्रह्मचर्याग्निपरिचरणगुरुशुश्रूषानित्या भिक्षाभैक्ष्यादिसर्व- निवेदितांतरात्मा गुरुवचननिदेशानुष्ठानाप्रतिकूलो गुरुप्रसादलब्धस्वाध्यायतत्परः स्यात् ॥१०६॥ भवति चात्र श्लोकः । गुरुं यस्तु समाराध्य द्विजो वेदमवाप्नुयात् । तस्य स्वर्गफलावाप्तिः सिद्धयते चास्य मानसम् । ॥१०७॥ इति गार्हस्थ्यं खलु द्वितीयमाश्रमं वदंति तस्य सदाचारलक्षणं सर्वमनुव्याख्यास्यामः । समावृतानां ॥१०८॥ सदाचाराणां सहधर्मचर्यफलार्थिनां गृहाश्रमो विधीयते धर्मार्थकामावाप्तिह्यत्र त्रिवर्गसाधनमपेक्ष्यागर्हितकर्मणा धनान्यादाय स्वाध्यायोपलब्धप्रकर्षेण वा ब्रह्मर्षिनिर्मितेन वा अद्भिः सागरगतेन वा द्रव्यनियममभ्यासदैवत- प्रसादोपलब्धेन वा धनेन गृहस्थो गार्हस्थ्यं वर्तयेत् ॥१०६॥ भृगु बोले-पहले ही लोक-व्यवस्थापक ब्रह्मा ने विचारपूर्वक धर्म-रक्षा के लिए चार आश्रमों की व्यवस्था की ॥१०५॥ उनमें गुरुकुलवास (ब्रह्मचर्य) पहला आश्रम है । उस आश्रम में रहकर बालक को शौच, संस्कार, नियम, व्रत आदि का पालन करना पड़ता है । प्रतिदिन दोनों काल में सूर्य, अग्नि की पूजा कर निरलस भाव से गुरु का अभिवादन करे; वेदाभ्यास और वेदशिक्षा द्वारा अन्तःकरण को पवित्र करे; त्रिषवन (तीनों संध्या) आचमन कर ब्रह्मचर्य, अग्नि-परिचर्या तथा गुरुसेवा में तत्पर रहकर प्रतिदिन भिक्षा करे और भिक्षा में पाये हुए द्रव्य और अपने को सर्वात्मना गुरु की सेवा में अर्पित कर दे । गुरु की आज्ञा का अक्षरशः पालन करता हुआ, गुरु-कृपा से प्राप्त विद्या और उपदेश को हृदयङ्गम करे ॥१०६॥ इस विषय में एक श्लोक भी है-जो द्विज गुरु की सेवा कर वेदाध्ययन करता है उसको स्वर्ग मिलता है और उसकी सारी मनःकामनायें पूरी होती हैं। इसके बाद दूसरा गृहस्थाश्रम है ॥१०७॥ इस आश्रम के आचारों को कह रहा हूँ । ब्रह्मचर्याश्रम के नियमों का पालन करने के उपरान्त स्त्री के साथ धर्म पालन करने के इच्छुक के लिए यह आश्रम है ॥१०८॥ इस आश्रम में धर्म, अर्थ और काम की प्राप्ति होती है । त्रिवर्ग (धर्म, अर्थ, काम) को दृष्टि में रखकर सत्कर्म द्वारा, अपनी विद्या या ज्ञान के उत्कर्ष द्वारा, ब्रह्मर्षि निर्मित साधन द्वारा, समुद्र यात्रा या सागरगत द्रव्यों के व्यापार द्वारा या अन्य किसी द्रव्योपार्जन के साधन द्वारा अथवा किसी देवता की कृपा से धन प्राप्त कर गृहस्थ अपने आश्रमोचित कार्यों को