भारतकोश
बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,008 पृष्ठ

पृष्ठ 301, कुल 1008 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 301

२८२ नारदीयपुराणम् वधबन्धनपरिक्लेशादिभिश्च क्षुत्पिपासाश्रमकृतैरुपरूपैस्तपप्यंते वर्षवाता- त्युष्णातिशीतकृतैश्च प्रतिभयैः शारीरैर्दुःखैरुयतप्यंते बंधुधनविनाश- विप्रयोगकृतैश्च मानसैः शोकैश्चाभिभूयंते जरामृत्युकृतैश्चान्यैरिति यस्त्वेतैः ॥६५॥ शारीरं मानसं नास्ति न जरा न च पातकम् । नित्यमेव सुखं स्वर्गे सुखं दुःखमिहोभयम् ॥६६॥ नरके दुःखमेवाहुः सुखं तत्परमं पदम् । पृथिवी सर्वभूतानां जनित्री तद्विधाः स्त्रियः ॥६७॥ पुमान्प्रजापतिस्तत्र शुक्लं तेजोमयं विदुः । इत्येतल्लोकनिर्माता धर्मस्य चरितस्य च ॥६८॥ तपसश्च सुतप्तस्य स्वाध्यायस्य हुतस्य च । हुतेन शाम्यते पापं स्वाध्याये शांतिरुत्तमा ॥६९॥ दानेन भोगानित्याहुस्तपसा स्वर्गमाप्नुयात् । दानं तु द्विविधं प्राहुः परत्रार्थमिहैव च ॥१००॥ सद्म्यो यद्दीयते किंचित्तत्परत्रोपतिष्ठते । असद्भ्यो दीयते यत्तु तद्दानमिह भुज्यते यादृशं दीयते दानं तादृशं फलमश्नुतं ॥१०१॥ भरद्वाज उवाच किं कस्य धर्माचरणं किं वा धर्मस्य लक्षणम् । धर्मः कतिविधो वापि तद्भवान्वक्तुमर्हति ॥१०२॥ भृगुरुवाच स्वधर्माचरणे युक्ता ये भवंति मनीषिणः । तेषां स्वर्गफलावाप्तिर्योऽन्यथा स विमुह्यते ॥१०३॥ भरद्वाज उवाच यदेतच्चातुराश्रम्यं ब्रह्मर्षिविहितं पुरा । तेषां स्वे स्वे समाचारास्तन्मे वक्तुमिहार्हसि ॥१०४॥ बन्धुओं और धन के विनाश तथा वियोग से उत्पन्न मानसिक चिन्ता से चिन्तित रहते हैं ॥६५॥ स्वर्ग में शारीरिक अथवा मानसिक किसी प्रकार का कष्ट नहीं होता । वहाँ पाप और बुढ़ापे का भय नहीं । वहाँ सदा सुख ही सुख है । इस भूलोक में सुख-दुःख दोनों हैं ॥६६॥ नरक में केवल दुःख ही है। अतः नित्य सुख ही परम पद है, पृथ्वी सब प्राणियों की जननी है। उसी प्रकार स्त्रियाँ प्रजा की जननी हैं ॥६७॥ पुरुष प्रजापति है। उसका वीर्य तेजोमय है। इस प्रकार प्रजापति ब्रह्मा ने लोक-निर्माण किया है। धर्म, चरित्र, तपस्या, स्वाध्याय और हवन की व्यवस्था उसने ही की है। हवन से सारे पाप नष्ट होते हैं। स्वाध्याय से परम शान्ति प्राप्त होती है ॥९८-९९॥ दान से भोग मिलता और तपस्या से स्वर्ग । दान दो प्रकार के होते हैं—एक तो परलोक में फल देता, दूसरा यहीं फल दे देता है। सत्पात्र को दिया हुआ दान परलोक में फलदायक होता है, परन्तु असत्पात्र में दिया हुआ यहीं फल दे देता है। जैसा दान दिया जाता है वैसा ही फल मिलता है ॥१००-१०१॥ भरद्वाज बोले-धर्म का लक्षण क्या है, किसके प्रति किस प्रकार का धर्माचरण करना चाहिए और धर्म के कितने भेद हैं ? इसको आप कृपा पूर्वक कहिए ॥१०२॥ भृगु ने कहा-जो मनीषी अपने धर्म के पालन में लगे रहते हैं वे स्वर्ग के भागी होते हैं जो ऐसा नहीं करते वे मूढ़ हैं ॥१०३॥ भरद्वाज बोले-ये जो चार आश्रम हैं, जिनकी प्राचीन काल में ब्रह्मर्षि ने व्यवस्था की है, उनके आचारों को आप कृपया कहिए ॥१०४॥