बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)
Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)
पृष्ठ 300, कुल 1008 में से
संदर्भ में पढ़ेंत्रिचत्वारिंशोऽध्यायः २८१ तत्तत्खलु द्विविधं सुखमुच्यते शारीरं मानसं च। इह खल्वमुष्मिंश्च लोके वस्तुप्रवृत्तयः सुखार्थमभिधीयन्ते नहीतः परत्वापवर्गफलाद्धि शिष्टतरमस्ति। स एव काम्यो गुणविशेषो धर्मार्थगुणारंभस्त द्धेतुरस्योत्पत्तिः सुखप्रयोजनार्थमारंभाः। भरद्वाज उवाच वदैतद्भवताभिहितं सुखानां परमा स्थितिरिति ॥८६॥ न तदुपगृह्णीमो न ह्येषामृषीणां महति स्थितानाम् ॥८०॥ अप्राप्य एष काम्यगुणविशेषो न चैनमभिशीलयंति। तपसि श्रूयते ॥८१॥ त्रिलोककृद्ब्रह्मा प्रभुरेशको तिष्ठति ब्रह्मचारी न कामसुखेष्वात्मानमवदधाति ॥८२॥ अपि च भगवान्विश्वेश्वर उमापतिः काममभिवर्तमानमनंगतवेन सममनयत् ॥८३॥ तस्माद्भूमो न तु महात्मभिरंजयति गृहीतो न त्वेष तावद्विशिष्टो गुणविशेष इति नैतद्भगवतः प्रत्येमि भवता तूक्तं सुखानां परमाः स्त्रिय इति ॥८४॥ लोकप्रवादो हि द्विविधः फलोदयः सुकृतात्सुखमवाप्यतेऽन्यथा दुःखमिति भृगुरुवाच अत्रोच्यते अनृतात्खलु तमः प्रादुर्भूतं ततस्तमोग्रस्ता अधर्ममेवा- नुवर्तते न धर्मं क्रोधलोभमोहहिंसानृतादिमिरवच्छन्नाः खल्व- स्मिँल्लोकेनामुत्र सुखमाप्नुवंति विविधव्याधिरुजोपतापैरवकीर्यन्ते जीवों का सुख नष्ट हो जाता है ॥८७-८८॥ वह सुख दो प्रकार का है शारीरिक और मानसिक। इस लोक और परलोक में सुख के लिए ही प्रत्येक वस्तुओं को ओर प्राणी का झुकाव होता है। लोक-परलोक में मुक्ति से बढ़- कर कोई फल नहीं है। उसी विशेष फल को सभी चाहते हैं। धर्म के लिए ही अपवर्ग गुण की सृष्टि हुई है। सारे आरम्भ सुख के लिए हैं। भरद्वाज बोले-आपने कहा है कि सुख ही लोक में एकमात्र परम काम्य है परन्तु सुख तो मिलता ही नहीं, न तो महत्तत्त्व में रमने वाले महर्षियों को ही प्राप्त होता है। यह काम्य (सुख) प्रायः दुष्प्राप्य है, इस गुण- विशेष की योगी आकांक्षा भी नहीं करते। ऐसा सुना जाता है कि लोककर्ता ब्रह्मा अकेले तपस्या-मग्न रहते हैं। वे ब्रह्मचारी ब्रह्मा काम-सुख को तुच्छ समझते हैं ॥८९-९१॥ इसके विपरीत उमापति विश्वेश्वर ने काम के पीछे पड़कर उसको भस्म करके अनङ्ग बना दिया ॥९२॥ अतएव इस लोक में सुख की ओर महात्माओं का अनुराग नहीं, न तो परम सुख को विशिष्ट गुण हो लोग मानते हैं ॥९३॥ अतः आपकी इस बात में भी कुछ शंका हो जाती है। आपने कहा कि सुख का कारण स्त्रियाँ हैं, ऐसा लोक-प्रसिद्ध है। लोक में फल-प्राप्ति भी दो रूपों में देखी जाती है। शुभ कर्मों से सुख मिलता और अशुभ कर्मों से दुःख ॥९४॥ भृगु बोले- इस विषय में कहता हूँ, सुनिये। अनृत से अन्धकार उत्पन्न हुआ। तदनन्तर अन्धकार में पड़े हुए प्राणी अधर्म को ही अपनाते हैं, धर्म को नहीं। क्रोध, लोभ, मोह, हिंसा, असत्य आदि से विमूढ़ मानव लोक- परलोक कहीं सुख नहीं पाते। वे तो विविध व्याधि, रोग और संताप से ग्रस्त रहते हैं। हत्या, बंधन, क्लेश, भूख, प्यास, श्रम से उत्पन्न रोगों से संतप्त रहते हैं। वर्षा, वायु, सर्दी-गर्मी और शारीरिक दुःखों से कष्ट पाते रहते हैं, ३६ ना० पु०