बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)
Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें२८६ नारदीयपुराणम् परिव्राजकानां पुनराचारः तद्यथा । विमुच्याग्निं धनकल- त्रपरिबर्हंसंगेष्वात्मानं स्नेहपाशानवधूय परिव्रजंति । ।।१२३।। समलोष्टाश्मकांचनास्त्रिवर्गप्रवृत्तेष्वसक्तबुद्धयः अरिमित्रोदासीनानां तुल्यदर्शनाः स्थावरजरायुजांडजस्वे- दजानां भूतानां वाङ्मनः कर्मभिरनभिद्रोहिणोऽनिकेताः पर्वतपुलिनवृक्षमूलदेवायतान्यनुसंचरंतो वासार्थमुपेयुर्न- गरं ग्रामं वा न क्रोधदर्पलोभमोहकार्पण्यदंभपरिवादाभि- माननिवृत्तिर्हिंसा इति ।।१२४।। भवंति चात्र श्लोक : अभयं सर्वभूतेभ्यो दत्त्वा यश्चरते मुनिः । न तस्य सर्वभूतेभ्यो भयमुत्पद्यते क्वचित् ।।१२५।। कृत्वाग्निहोत्रं स्वशरीरसंस्थं शरीरमग्निं स्वमुखे जुहोति ।।१२६।। विप्रस्तु भैक्षोपगतैर्हविर्भिश्शिताग्नि संव्रजते हि लोकान् । मोक्षाश्रमं यश्चरते यथोक्तं शुचिः स्वसंकल्पितयुक्तबुद्धिः ।।१२७।। अनिधनं ज्योतिरिव प्रशांतं स ब्रह्मलोकं श्रयते द्विजातिः इति श्रीबृहन्नारदीयपुराणे पूर्वभागे द्वितीयपादे भृगुभारद्वाजसंवादे ब्राह्मणाचारनिरूपणं नाम त्रिचत्वारिंशोऽध्यायः ।।४३।। तीन आश्रमों का पालन करने के बाद मनुष्य अग्नि, धन, स्त्री, सब सामग्रियों और बन्धु जनों से स्नेह संबन्ध तोड़ कर संन्यास ग्रहण कर लेते हैं । इस आश्रम में मिट्टी, पत्थर और सोने को समान समझ कर, त्रिवर्गसाधन से सर्वथा विरक्त हो जाना चाहिए ।।१२३।। शत्रु, मित्र या तटस्थ सब के प्रति समान भाव रखना चाहिए । संन्यासियों को स्थावर, जरायुज, अंडज, स्वेदज अर्थात् किसी भी प्राणी के प्रति मन, वचन और कर्म से भी द्रोहबुद्धि नहीं करनी चाहिए । अपने रहने के लिए घर न बनाकर पर्वत, नदीतट, पेड़ों की छाया अथवा देव-मन्दिर में रहकर अथवा ग्राम-ग्राम, नगर-नगर में घूमते हुए वे (अपना) समय बितायें । उनके हृदय में क्रोध, अभिमान, लोभ, मोह, संकीर्णता, दंभ, निन्दाभावना और हिंसा न रहे ।।१२४।। इस विषय में कहा गया है कि जो मुनि सब प्राणियों को अभय दान देता है उसको कहीं पर किसी जीव से भय नहीं होता है ।।१२५।। जो विप्र अग्नि- होत्र करने के बाद अपने शरीरस्थ अग्नि में मुख के द्वारा भिक्षा द्वारा प्राप्त हविष्य अन्न का हवन करता है वह उत्तम लोकों को प्राप्त करता है ।।१२६।। जो द्विजाति पवित्र होकर दृढ़ संकल्प कर संन्यासाश्रम का पालन करता है, वह स्वयं प्रकाशमान ज्योति की भाँति ब्रह्मलोक में निवास करता है ।।१२७।। श्रीनारदीयमहापुराण में ब्राह्मणाचार निरूपण नामक तैंतालीसवाँ अध्याय समाप्त ।।४३।।