बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)
Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंअथ चतुश्चत्वारिंशोऽध्यायः भरद्वाज उवाच आस्मल्लोकात्परो लोकः श्रूयते नोपलभ्यते । तमहं ज्ञातुमिच्छामि तद्भवान्वक्तुमर्हति ॥१॥ भृगुरुवाच उत्तरे हिमवत्पार्श्वे पुण्ये सर्वगुणान्विते । पुण्यः क्षेम्यश्च काम्यश्च स परो लोक उच्यते ॥२॥ तत्र ह्यपापकर्माणः शुचयोऽत्यंतनिर्मलाः । लोभमोहपरित्यक्ता मानवा निरुपद्रवाः ॥३॥ स स्वर्गसदृशो देशः तत्र ह्युक्ताः शुभा गुणाः । काले मृत्युः प्रभवति स्पृशंति व्याधयो न च ॥४॥ न लोभः परदारेषु स्वदारनिरतो जनः । नान्यो हि वध्यते तत्र द्रव्येषु च न विस्मयः ॥५॥ परो ह्यधर्मो नैवास्ति संदेहो नापि जायते । कृतस्य तु फलं तत्र प्रत्यक्षमुपलभ्यते ॥६॥ यानासनाशनोपेताः प्रसादभवनाश्रयाः । सर्वकामैर्वृताः केचिद्धेमाभरणभूषिताः ॥७॥ प्राणधारणमात्रं तु केषांचिदुपपद्यते । श्रमेण महता केचित्कुर्वन्ति प्राणधारणम् ॥८॥ इह धर्मपराः केचित्केचिन्न्नैकृतिका नरा । सुखिता दुःखिताः केचिन्निर्धना धनिनो परे ॥६॥ इह श्रमो भयं मोहः क्षुधा तीव्रा च जायते । लोभश्चार्थकृतो नृणां येन मुह्यंत्यपंडिताः ॥१०॥
अध्याय ४४ ध्यानयोग-निरूपण भरद्वाज बोले--इस लोक से परे दूसरा लोक है ऐसा सुना जाता है परन्तु देखा नहीं जाता, इसलिए उस लोक के विषय में मैं जानना चाहता हूँ। आप कृपाकर कहिए ॥१॥ भृगु बोले--उत्तर दिशा में सब गुणों से युक्त, पवित्र, हिमालय के पार्श्व में एक पवित्र, क्षेमकर, काम्य लोक है उसी को परलोक कहते हैं ॥२॥ वहाँ पुण्यशील, पवित्र, अत्यन्त शुद्ध हृदय, लोभ-मोह से दूर रहने वाले शान्त प्राणी रहते हैं ॥३॥ वह स्वर्गोपम देश है। वहाँ उपर्युक्त शुभगुण सदा रहते हैं। वहाँ समय आने पर ही मृत्यु होती है। रोग तो किसी को होता ही नहीं ॥४॥ किसी को परस्त्रीगमन की इच्छा नहीं होती। सभी स्वस्त्री से ही प्रेम करते हैं। कोई किसी की हत्या नहीं करता और किसी की संपत्ति देखकर दूसरे को आश्चर्य नहीं होता ॥५॥ किसी प्रकार का अधर्म वहाँ नहीं है। न तो किसी के प्रति किसी को सन्देह ही रहता है। किये हुए कर्मों का सबको प्रत्यक्षफल मिलता है ॥६॥ सब बड़े-बड़े महलों में रहते और सवारी, स्थान और भोजन की सुविधा प्रत्येक व्यक्ति को है। सब लोग सभी कामनाओं से पूर्ण रहते हैं। कुछ लोग तो स्वर्णाभरणों से आभूषित रहते हैं। इसके विपरीत इस भूलोक में कुछ तो धर्मपरायण होते और कुछ पाप कर्म को ही इष्ट कर्म ही समझते हैं। यहाँ कोई सुखी है तो कोई दुःखी। कुछ धनी हैं तो कुछ निर्धन ॥७-९॥ यहाँ थकावट, भय, मोह तथा भूख-प्यास लगती है। धन का लोभ मनुष्यों को अत्यधिक है, जिससे अज्ञ जन सर्वदा मोहवश धन की ओर