भारतकोश
बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,008 पृष्ठ

पृष्ठ 307, कुल 1008 में से

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२८८ नारदीयपुराणम् यस्तद्वेदोभयं प्राज्ञः पाप्मना न स लिप्यते । सोपधे निकृतिः स्तेयं परिवादोऽभ्यसूयता ॥११॥ परोपघातो हिंसा च पैशुन्यमनृतं तथा । एतान्संवते यस्तु तपस्तस्य प्रहीयते ॥१२॥ यस्त्वेतानाचरेद्विद्वान्न तपस्तस्य वर्द्धते । इह चिन्ता बहुविधा धर्माधर्मस्य कर्मणः ॥१३॥ कर्मभूमिरियं लोके इह कृत्वा शुभाशुभम् । शुभैः शुभमवाप्नोति तथाशुभमथाऽन्यथा ॥१४॥ इह प्रजापतिः पूर्वं देवाः सर्षिगणास्तथा । इष्ट्वेष्टतपसः पूता ब्रह्मलोकमूपाश्रिताः ॥१५॥ उत्तरः पृथिवीभागः सर्वपुण्यतमः शुभः । इहस्थास्तत्र जायंते ये वै पुण्यकृतो जनाः ॥१६॥ यदि सत्कारमिच्छंति तिर्यग्योनिषु चापरे । क्षीणापुधस्तथा चाज्ये नश्यन्ति पृथिवीतले ॥१७॥ अन्योन्यभक्षणासक्ता लोभमोहसमन्विताः । इहैव परिवर्तन्ते न च यान्त्युत्तरां दिशम् ॥१८॥ गुरुनुपासते ये तु नियता ब्रह्मचारिणः । पंथानं सर्वलोकानां विजानंति मनीषिणः ॥१९॥ इत्युक्तोऽयं मया धर्मः संक्षिप्तो ब्रह्मनिर्मितः । धर्माधर्मौ हि लोकस्य यो वै वेत्ति स बुद्धिमान् ॥२०॥ भरद्वाज उवाच अध्यात्मं नाम यदिदं पुरुषस्येह चिन्त्यते । यदध्यात्मं यथा चैतत्तन्मे ब्रूहि तपोधन ॥२१॥ भृगुरुवाच अध्यात्ममिति विप्रर्षे यदेतदनुपृच्छसि । तद्वयाख्यास्यामि ते तात श्रेयस्करतमं सुखम् ॥२२॥ सृष्टिप्रलयसंयुक्तमाचार्यैः परिदर्शितम् । यज्ज्ञात्वा पुरुषो लोके प्रीतिं सौख्यं च विंदति ॥२३॥ खिंचे रहते हैं । जिसको दोनों लोकों का ज्ञान है वह प्राज्ञ है । जो शठता, चोरी, निन्दा, ईर्ष्या, हिंसा, चुगली, असत्य दूसरे के साथ विश्वासघात, दुष्कर्मों आदि को करता है उसकी सारी तपस्या का क्षय हो जाता है ॥१०-१२॥ जो विद्वान् इन दुष्कर्मों को नहीं करता है उसकी तपस्या में वृद्धि होती है । इस लोक में धर्म-अधर्म की अनेकों चिन्तायें (व्यवस्थायें) हैं । इस भूलोक में भारतवर्ष कर्मभूमि है, यहाँ मनुष्य शुभ-अशुभ कर्मों के अनुसार शुभ- अशुभ फलों को पाता है ॥१३-१४॥ इस लोक में पूर्वकाल में प्रजापति, देवता और ऋषिगणों ने इच्छानुकूल इष्ट तप करके ब्रह्मलोक को प्राप्त किया है ॥१५॥ पृथ्वो का उत्तरीय भाग शुभ और सबसे अधिक पुण्य भूमि है । इस भूभाग के रहने वाले जो मनुष्य शुभ कर्म करते हैं और शुभ फल चाहते हैं, वे ही वहाँ जन्म पाते हैं ॥१६॥ जो लोग शुभ की इच्छा करते हैं परन्तु शुभ कर्म करते नहीं वे उस लोक में तिर्यग्योनि में जन्म पाते हैं । इसके विपरीत जो अन्य व्यक्ति हैं वे यहीं अल्पायु होकर इसी पृथ्वी तल पर नष्ट हो जाते हैं ॥१७॥ एक-दूसरे की हत्या करने वाले, लोभ और मोह के बन्धन में फँसे रहने वाले मनुष्य इसी लोक में बार-बार जन्म पाते हैं कभी उत्तर दिशा में जन्म नहीं पाते ॥१८॥ जो नियमित रूप से ब्रह्मचारी रहकर गुरु की उपासना करते हैं वे मनीषी सब लोकों के मार्ग जानते हैं; अर्थात् सब लोकों में जा सकते हैं ॥१९॥ इस प्रकार मैंने ब्रह्मनिर्मित धर्म का संक्षेप में वर्णन किया है जो मनुष्य लौकिक धर्म और अधर्म को जानता है वह बुद्धिमान् है ॥२०॥ भरद्वाज बोले-तपोधन ! पुरुष के अध्यात्म की चर्चा प्रायः चलती है, उसके अध्यात्म का चिन्तन प्रायः किया जाता है, उस अध्यात्म का जो रूप है और उसकी जो परिभाषा है, उसको आप कृपा कर कहिए ॥२१॥ भृगु बोले--विप्रर्षे ! जो तुमने अध्यात्म के विषय में पूछा है, उसकी व्याख्या कर रहा हूँ जो कि श्रेय- स्कर सुख को देने वाला है ॥२२॥ अध्यात्म को आचार्यों ने सृष्टि-प्रलय से युक्त बतलाया है, जिसका ज्ञान प्राप्त

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