भारतकोश
बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,008 पृष्ठ

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द्विचत्वारिंशोऽध्यायः २७३ बाहुष्वग्निस्तु विततः समानेन समीरितः । रसान्बाहूंश्च दोषांश्च वर्तयन्नतिचेष्टते ॥१०५॥ अपानप्राणयोर्मध्ये प्राणापानसमीहितः । समन्वितस्त्वधिष्ठानं सम्यक् पचति पावकः ॥१०६॥ आस्यं हि पायुपर्यन्तमंते स्याद्गुदसंज्ञिते । रेतस्तस्मात्प्रजायंते सर्वस्रोतांसि देहिनाम् ॥१०७॥ प्राणानां सन्निपाताच्च सन्निपातः प्रजायते । ऊष्मा चाग्निरिति ज्ञेयो योऽन्नं पचति देहिनाम् ॥१०८॥ अग्निवेगवहः प्राणो गुदांते प्रतिहन्यते । स ऊर्ध्वमागम्य पुनः समुत्क्षिपति पावकम् ॥१०९॥ पक्वाशयस्त्वधो नाभ्या ऊर्ध्वमामाशयः स्मृतः । नाभिमूले शरीरस्य सर्वे प्राणाश्च संस्थिताः ॥११०॥ प्रस्थिता हृदयात्सर्वे तिर्यगूर्ध्वमधस्तथा । वहंत्यन्नरसान्नाड्यो दशप्राणप्रचोदिताः ॥१११॥ एष मार्गोऽपि योगानां येन गच्छंति तत्पदम् । जितक्लमाः समा धीरा मूर्द्धन्यात्मानमादधन् ॥११२॥ एवं सर्वेषु विहितप्राणापानेषु देहिनाम् । तस्मिन्समिध्यते नित्यमग्निः स्थाल्यामिवार्हिताः ॥११३॥ इति श्रीबृहन्नारदीयपुराणे पूर्वभागे द्वितीयपादे भृगुभरद्वाजसंवादे जगदुत्पत्तिवर्णनं नाम द्विचत्वारिंशोऽध्यायः ॥४२॥ फैलता है। यह वायु रसों, वाहों और दोषों से सम्बद्ध होकर क्रियाशील रहता है ॥१०५॥ अपान और प्राण के के मध्य में प्राण तथा अपान से प्रेरित एवं समन्वित होकर अग्नि अधिष्ठान (भुक्त द्रव्य) को भली भाँति पकाता है ॥१०६॥ मुख से गुदा तक भुक्त द्रव्य को पहुँचाना अग्नि तथा वायु का ही कार्य है। अन्न-पाचन के बाद वीर्य बनता है और उससे प्राणियों के सब स्रोत उत्पन्न होते हैं। प्राणों के सन्निपात (सम्बन्ध) से सन्निपात रोग होता है। ऊष्मा को अग्नि कहते हैं, जो प्राणियों के खाये हुए अन्न को पकाता है ॥१०७-१०८॥ अग्निवेग से प्रेरित होकर प्राण वायु गुदा के अन्तिम भाग से टकराता है। वह पुनः वहाँ से ऊपर लौटकर पावक को ऊपर की ओर फेंकता है ॥१०९॥ नाभि के नीचे पक्वाशय और ऊपर की ओर आमाशय है, और नाभि के मूल में सब प्राण स्थित हैं ॥११०॥ सभी हृदय केन्द्र से ऊपर, नीचे और तिरछे जाते हैं। नाड़ियाँ प्राणवायु से प्रेरित होकर अन्न रस को इधर-उधर ले जाती हैं ॥१११॥ योगियों के लिए भी यही 'प्राण' मार्ग है जिससे वे ब्रह्म पद को जाते हैं। मूर्धा में आत्मा को व्यवस्थित कर बाह्य बाधाओं को जीत कर धीर योगीजन आत्मपद को प्राप्त करते हैं। इस प्रकार प्राणियों के शरीर में प्राण, अपान आदि की व्यवस्था है, जिसमें शरीराग्नि स्थाली में रखे हुए अग्नि के समान नित्य प्रज्वलित रहती है ॥११२-११३॥ श्रीनारदीय महापुराण में जगदुत्पत्ति-वर्णन नामक बयालीसवां अध्याय समाप्त ॥४२॥ ३५ ना० पु०