भारतकोश
बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,008 पृष्ठ

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पृष्ठ 293

अथ त्रिचत्वारिंशोऽध्यायः भरद्वाज उवाच यदि प्राणपतिर्वायुर्वायुरेव विचेष्टते । श्वसित्याभाषते चैव ततो जीवो निरर्थकः ॥१॥ य ऊष्मभाव आग्नेयो वह्निनैवोपलभ्यते । अग्निर्जरयते चैतत्तदा जीवो निरर्थकः ॥२॥ जंतोः प्रह्रियमाणस्य जीवो नैवोपलभ्यते । वायुरेव जहात्येनमूष्मभावश्च नश्यति ॥३॥ यदि वायुमयो जीवः संश्लेषो यदि वायुना । वायुमंडलवत्पश्येद्गच्छेत्सह मरुद्गणैः ॥४॥ संश्लेषो यदि वा तेन यदि तस्मात्प्रणश्यति । महार्णवविमुक्तत्वादन्यत्सलिलभाजनम् ॥५॥ कूपे वा सलिलं दद्यात्प्रदीपं वा हुताशने । क्षिप्रं प्रविश्य नश्येत यथा नश्यत्यसौ तथा ॥६॥ पंचधारणके ह्यस्मिञ्छरीरे जीवितं कृतम् । येषामन्यतराभावाच्चतुर्णां नास्ति संशयः ॥७॥ नश्यंत्यापो ह्यनाहाराद्वायुरुच्छ्वासनिग्रहात् । नश्यते कोष्ठभेदार्थमग्निर्नश्यत्यभोजनात् ॥८॥ व्याधिव्रणपरिक्लेशैर्मेदिनी चैव शीर्यते । पीडितेऽन्यतरे ह्येषां संघात याति पंचताम् ॥६॥ तस्मिन्पञ्चत्वमापन्ने जावः किमनुधावति । किं खेदयति वा जीवः किं शृणोति ब्रवीति च ॥१०॥ एषा गौः परलोकस्थं तारयिष्यति मामिति । यो दत्त्वा म्रियते जंतुः सा गौः कं तारयिष्यति ॥११॥


अध्याय ४३ जीव की गति और द्विज का आचार निरूपण भरद्वाज बोले-- यदि वायु ही प्राणपति है, वही चेष्टायें करता, श्वास वही लेता और बोलता भी वही है तो जीव निरर्थक है ॥१॥ जो ऊष्म भाव अग्नि का ही गुण है वह अग्नि से ही प्राप्त हो जाता है और अग्नि ही बुढ़ापा भी ला देता है तो जीव का क्या अस्तित्व माना जाय ॥२॥ प्राणी के मृत्यु-काल में जीव का निकलना तो देखा नहीं जाता । वायु ही शरीर को छोड़ देता है, जिससे शरीर का ऊष्मभाव नष्ट हो जाता है ॥३॥ यदि जीव वायुमय है, वह वायु से ही चिपका रहता है, वायुमण्डल के समान देखता है, मरुद्गणों के साथ जाता है, यदि उसी (वायु) के साथ उस (जीव) का दृढ़ संयोग है और उससे वियुक्त होने पर उसी तरह नष्ट हो जाता है, जैसे महासागर से अलग हुआ जल अन्य जल-स्थान में या कूप में डाला जाने पर और दीपक अग्नि में डाला जाने पर नष्ट हो जाते हैं ॥४-६॥ जीव इस पाँच भौतिक शरीर में जीवित रहता है । उन पाँच भूतों में एक के अभाव से चारों का अभाव हो जाता है, इसमें सन्देह नहीं ॥७॥ अनाहार के कारण जल तत्त्व नष्ट हो जाता है । श्वास के निरोध से वायु, भोजन न करने से अग्नि, व्याधि, व्रण आदि शारीरिक क्लेश से पृथ्वी तत्त्व नष्ट ही जाता है । इनमें से एक के भी पीड़ित होने पर इनका समूह भी नष्ट हो जाता है । ॥८-९॥ शरीर के छूट जाने पर जीव किसके पीछे जाता है ? अथवा उसको किस बात का खेद रहता है ? क्या सुनता और क्या बोलता है ? ॥१०॥ 'दान में दी हुई यह गाय परलोक में मेरा उद्धार करेगी' यह सोचकर जो जन्तु गाय का दान कर मर जाता है वह गाय किसको तारेगी ? ॥११॥ जब गाय, दाता और प्रतिग्रहीता समान रूप से यहीं