भारतकोश
बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,008 पृष्ठ

पृष्ठ 289, कुल 1008 में से

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२७० नारदीयपुराणम् यदाऽसृजत्सहस्राणि भूतानां स महामतिः । पश्चात्तेष्वेव भूतत्वं कथं समुपपद्यते ॥५९॥ भृगुरुवाच अमितानि महाष्टानि यांति भूतानि संभवम् । अतस्तेषां महाभूतशब्दोऽयमुपपद्यते ॥६०॥ चेष्टा वायुः खमाकाशमूष्माग्निः सलिलं द्रवः । पृथिवी चात्र संघातः शरीरं पांचभौतिकम् ॥६१॥ इत्यतः पंचभिर्युक्तैर्युक्तं स्थावरजंगमम् । श्रोत्रे घ्राणो रसः स्पर्शो दृष्टिश्चेंद्रियसंज्ञिताः ॥६२॥ भरद्वाज उवाच पंचभिर्यदि भूतैस्तु युक्ताः स्थावरजंगमाः । स्थावराणां न दृश्यंते शरीरे पंच धातवः ॥६३॥ अनूष्मणामचेष्टानां घनानां चैव तत्त्वतः । वृक्षाणां नोपलभ्यन्ते शरीरे पंच धातवः ॥६४॥ न शृण्वंति न पश्यंति न गंधरसवेदिनः । न च स्पर्शं हि जानंति ते कथं पंच धातवः ॥६५॥ अद्रवत्वादह्नित्वाद् भूमित्वादवायुतः । आकाशस्याप्रमेयत्वाद्वृक्षाणां नास्ति भौतिकम् ॥६६॥ भृगुरुवाच घनानामपि वृक्षाणामाकाशोऽस्ति न संशयः । तेषां पुष्पफलव्यक्तिर्नित्यं समुपपद्यते ॥६७॥ ऊष्मतो म्लायते पर्णं त्वक्फलं पुष्पमेव च । म्लायते शीर्यते चापि स्पर्शस्तेनात्र विद्यते ॥६८॥ वाय्वग्न्यशनिनिर्घोषैः फलं पुष्पं विशीर्यते । श्रोत्रेण गृह्यते शब्दस्तस्माच्छृण्वंति पादपाः ॥६९॥ वल्ली वेष्टयते वृक्षान्सर्वतश्चैव गच्छति । नह्यदृष्टेश्च मार्गोऽस्ति तस्मात्पश्यंति पादपाः ॥७०॥ पुण्यापुण्यैस्तथा गंधैर्धूपैश्च विविधैरपि । अरोगाः पुष्पिताः संति तस्माज्जिघ्रंति पादपाः ॥७१॥ हैं और जिनसे सारे लोक ढके हैं जब उस महामति ने सहस्रों भूत (प्राणी) बनाये तो क्यों उन पांचों को ही भूत की उपाधि मिली और उन्हीं में भूतत्त्व कैसे संगत हुआ ? ॥५८-५९॥ भृगु बोले—इन्हीं पाँचों पदार्थों से असीम महान् अष्ट भूत उत्पन्न होते हैं, अतएव उनकी महाभूत संज्ञा युक्तियुक्त है। प्राणियों की चेष्टा वायु है, शरीर के स्थान आकाश, ऊष्मा-अग्नि इसके द्रव पदार्थ रक्त आदि जल और ठोस पदार्थ पृथ्वी है। इस प्रकार इन पाँचों महाभूतों का मिलित रूप ही पाञ्चभौतिक शरीर है ॥६०-६१॥ इन पाँचों से ही सारे स्थावर-जंगम बने हुए हैं। श्रोत्र, नासिका, रसना, स्पर्श (त्वक्) और दृष्टि (नेत्र) इन्द्रियाँ कहलाती हैं ॥६२॥ भरद्वाज बोले—यदि सारे स्थावर-जंगम पंच महाभूतों से युक्त रहते हैं तो स्थावर पदार्थों के शरीर में ये पाँच धातु क्यों नहीं दिखाई देते ? ॥६३॥ चेष्टा और ऊष्मा से शून्य वृक्षों के शरीर में तो तत्त्वतः पंच धातु नहीं पाये जाते ॥६४॥ वे न तो सुनते हैं, न देखते हैं। उन्हें न तो गन्ध और रस का ज्ञान रहता है और न स्पर्श का ही। तब उनमें पंच धातु का सम्मिश्रण कैसे माना जाय ॥६५॥ अतएव उनमें द्रवत्व, अग्नित्व, वायुत्व और भूमित्व न होने के कारण और आकाश के अप्रमेय होने के कारण वे भौतिक नहीं हैं ॥६६॥ भृगु बोले—अत्यन्त घने (ठोस) वृक्षों में भी आकाश है इसमें सन्देह नहीं। उनमें फूल-फल सर्वदा निक- लते हैं, गर्मी लगने से उनकी पत्तियाँ, वल्कल (छाल), फल और पुष्प मुरझा जाते हैं, मलिन हो जाते हैं, सूख कर गिर जाते हैं तो क्या उनमें स्पर्श ज्ञान नहीं है ? ॥६७-६८॥ वायु, अग्नि और बिजली की कड़कड़ाहट के शब्द से उनके फल और फूल टूटकर गिर जाते हैं कान से शब्द सुना जाता है; अतः वृक्ष भी सुनते हैं ॥६९॥ लतायें वृक्षों से लिपट जाती हैं, इधर-उधर फैलती भी हैं। बिना नेत्र के मार्ग कैसे दिखाई दे सकता है ? अतः वृक्ष भी देखते हैं ॥७०॥ पुण्य-अपुण्य, विविध गंध और धूप (किरणों) से ये वृक्ष नीरोग रहते और फूलते हैं। इससे जान

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