बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)
Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)
पृष्ठ 290, कुल 1008 में से
संदर्भ में पढ़ेंद्विचत्वारिंशोऽध्यायः २७१ सुखदुःखयोर्ग्रहणाच्छिन्नस्य च विरोहणात् । जीवं पश्यामि वृक्षाणामचैतन्यं न विद्यते ॥७२॥ तेन तज्जलमादत्ते जरयत्यग्निमारुतौ । आहारपरिणामाच्च स्नेहो वृद्धिश्च जायते ॥७३॥ जंगमानां च सर्वेषां शरीरे पंच धातवः । प्रत्येकशः प्रभिद्यंते यैः शरीरं विचेष्टते ॥७४॥ त्वक् च मांसं तथास्थीनि मज्जा स्नायुश्च पंचमः । इत्येतदिह संघातं शरीरे पृथिवीमये ॥७५॥ तेजो ह्यग्निस्तथा क्रोधश्चक्षुरूष्मा तथैव च । अग्निर्जनयते यच्च पंचाग्नेयाः शरीरिणः ॥७६॥ श्रोत्रं घ्राणं तथास्यं च हृदयं कोष्ठमेव च । आकाशात्प्राणिनामेते शरीरे पंच धातवः ॥७७॥ श्लेष्मा पित्तमथ स्वेदो वसा शोणितमेव च । इत्यापः पंचधा देहे भवंति प्राणिनां सदा ॥७८॥ प्राणात्प्रीयते प्राणी व्यानाद्व्यायच्छते तथा । गच्छत्यपानोऽधश्चैव समानो हृद्यवस्थितः ॥७९॥ उदानादुच्छ्वसितीति पञ्च (प्रति) भेदाच्च भाषते । इत्येते वायवः पंच वेष्टयंतीह देहिनम् ॥८०॥ भूमेर्गंधगुणान्वेत्ति रसं चाद्भ्यः शरीरवान् । तस्य गंधस्य वक्ष्यामि विस्तराभिहितान्गुणान् ॥८१॥ इष्टश्चानिष्टगंधश्च मधुरः कटुरेव च । निर्हारी संहतः स्निग्धो रुक्षो विशद एव च ॥८२॥ एवं नवविधो ज्ञेयः पार्थिवो गंधविस्तरः । ज्योतिः पश्यति चक्षुर्भ्यः स्पर्शं वेत्ति च वायुना ॥८३॥ शब्दः स्पर्शश्च रूपं च रसश्चापि गुणाः स्मृताः । रसज्ञानं तु वक्ष्यामि तन्मे निगदतः शृणु ॥८४॥ रसो बहुविधः प्रोक्त ऋषिभिः प्रथितात्मभिः । मधुरो लवणस्तिक्तः कषायोऽम्लः कटुस्तथा ॥८५॥ एष षड्विधविस्तारो रसो वारिमयः स्मृतः । शब्दः स्पर्शश्च रूपञ्च त्रिगुणं ज्योतिरुच्यते ॥८६॥ ज्योतिः पश्यति रूपाणि रूपं च बहुधा स्मृतम् । ह्रस्वो दीर्घस्तथा स्थूलश्चतुरस्रोऽणुवृत्तवान् ॥८७॥ शुक्लः कृष्णस्तथा रक्तो नीलः पीतोऽरुणस्तथा । कठिनश्चिक्कणः श्लक्ष्णः पिच्छिलो मृदु दारुणः ॥८८॥ पड़ता है कि वृक्ष सूंघते हैं ॥७१॥ पेड़ों को सुख-दुःख का अनुभव होता है, काटे जाने पर वे बढ़ते भी हैं। अतः उनमें जीव है और चेतनता भी ॥७२॥ इसीलिए वे जल पीते हैं, अग्नि और वायु के प्रभाव से वृद्ध भी होते हैं। आहार के अनुसार उनमें रस उत्पन्न होता और वे बढ़ते भी हैं ॥७३॥ और सब जंगमों के शरीर में पांच धातुयें हैं। भिन्न- भिन्न प्रकार की शारीरिक चेष्टाओं द्वारा प्रत्येक धातुओं की अभिव्यक्ति होती है ॥७४॥ इस पृथिवीमय शरीर में त्वक्, मांस, अस्थि, मज्जा और पांचवें स्नायु का संयोग है ॥७५॥ तेज, अग्नि, क्रोध, चक्षु और ऊष्मा इनको अग्नि उत्पन्न करता है। अतः ये पाँचों देह के आग्नेय तत्त्व हैं ॥७६॥ कान, नासिका, मुख, हृदय और कोष्ठ ये शरीर में आकाश से उत्पन्न होते हैं ॥७७॥ प्राणियों के शरीर में कफ, पित्त, स्वेद, वसा (चर्बी) और रक्त ये जल के पाँच रूप हैं ॥७८॥ प्राण वायु से प्राणी तृप्त होता, व्यान से अंग प्रसारण करता, अपान शरीर के अधो भाग से बाहर निकलता है, समान हृदय में रहता और उदान से मनुष्य उच्छ्वास छोड़ता है। इस प्रकार वायु के पाँच भेद हैं। ये पाँच वायु देही को घेरे रहते हैं ॥७९-८०॥ शरीर भूमितत्त्व के कारण गन्ध ग्रहण करता और जल से रस का आस्वादन करता है। उस गन्ध के गुणों को विस्तार के साथ कह रहा हूँ ॥८१॥ इष्ट, अनिष्ट, मधुर, कटु, निर्हारी, संहत, स्निग्ध, रूक्ष और विशद ये नव पार्थिव गन्ध के भेद हैं ॥८२॥ नेत्र से ज्योति देखी जाती है, वायु से स्पर्श का ज्ञान होता है। शब्द, स्पर्श, रूप और रस ये गुण हैं। अब मैं रस का ज्ञान बता रहा हूँ, उसको मुझसे सुनो ॥८३-८४॥ प्रसिद्ध ज्ञानी ऋषियों ने रस के बहुत से भेद कहे हैं। मधुर, लवण, तिक्त, कषाय, अम्ल, कटु ये रस के छह भेद हैं जो जल के ही विकृत रूप हैं ॥८५॥ शब्द, स्पर्श और रूप ये तीनों गुण ज्योति कहे गये हैं। ज्योति से ही रूप का दर्शन होता है। रूप विविध प्रकार के हैं। ह्रस्व, दीर्घ, स्थूल, चौकोर, अणु, शुक्ल, कृष्ण, रक्त, नील, पीत, अरुण, कठिन, चिकना, कोमल, पिच्छिल (फिसलने योग्य), मृदु, दारुण (कठोर)