भारतकोश
बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,008 पृष्ठ

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पृष्ठ 288

द्विचत्वारिंशोऽध्यायः २६६ भृगुरुवाच ब्रह्मकल्पे पुरा ब्रह्मन् ब्रह्मर्षीणां समागमे। लोकसंभवसंदेहः समुत्पन्नो महात्मनाम् ॥४६॥ तेऽतिष्ठन् ध्यानमालम्ब्य मौनमास्थाय निश्चलाः। त्यक्ताहाराः स्पर्द्धमाना दिव्यं वर्षशतं द्विजाः ॥४७॥ तेषां ब्रह्ममयी वाणी सर्वेषां श्रोत्रमागमत्। दिव्या सरस्वती तत्र संबभूव नभस्तलात् ॥४८॥ पुरास्तिमितमाकाशमनंतमचलोपमम्। नष्टचंद्रार्कपवनं प्रसुप्तमिव संबभौ ॥४६॥ ततः सलिलमुत्पन्नं तमसीव तमः परम्। तस्माच्च सलिलोत्पीडादुदतिष्ठत मारुतः ॥५०॥ यथाभवनमच्छिद्रं निःशब्दमिव लक्ष्यते। तच्चांभसा पूर्यमाणं सशब्दं कुरुतेऽनिलः ॥५१॥ तथा सलिलसंरुद्धे नभसोंऽतं निरंतरम्। भित्त्वार्णवतलं वायुः समुत्पतति घोषवान् ॥५२॥ एषु वै चरते वायुरर्णवोत्पीडसंभवः। आकाशस्थानमासाद्य प्रशांतिं नाधिगच्छति ॥५३॥ तस्मिन्वाय्वम्बुसंघर्षे दीप्ततेजा महाबलः। प्रादुरासीदूर्ध्वशिखः कृत्वा निस्तिमिरं तमः ॥५४॥ अग्निः पवनसंयुक्तः खं समाक्षिपते जलम्। तदग्निवायुसंपर्काद्घनत्वमुपपद्यते ॥५५॥ तस्याकाशं निपतितः स्नेहात्तिष्ठति योऽपरः। स संघातत्वमापन्नो भूमितवमनुगच्छति ॥५६॥ रसानां सर्वगंधानां स्नेहानां प्राणिनां तथा। भूमियोंनिरियं ज्ञेया यस्याः सर्वं प्रसूयते ॥५७॥ भरद्वाज उवाच य एते धातवः पंच रक्ष्या यानसृजत्प्रभुः। आवृता यैरिमे लोका महाभूताभिसंज्ञितैः ॥५८॥ भृगु बोले-पहले ब्रह्म-कल्प में ब्रह्मर्षिगण एक दिन इकट्ठे हुए। उन महात्माओं के मन में इसी प्रकार लोक-सृष्टि के विषय में सन्देह हुआ। वे मौन होकर निश्चल भाव से ध्यानस्थ हो गए। इस रहस्य की जानने की उत्सुकता में उन लोगों ने भोजन तक छोड़ दिया ॥४६-४७॥ इस प्रकार उन महर्षियों ने सौ दिव्य वर्ष बिता दिये ॥४८॥ निदान उनको ब्रह्ममयी वाणी सुनाई दी और आकाश से दिव्य सरस्वती प्रकट हुई ॥४८॥ उसके प्रकट होते ही आकाश शान्त, निःशब्द और अचल के समान हो गया। चन्द्र, सूर्य और पवन के बिना उस समय आकाश ऐसा जान पड़ता था मानो सो गया हो ॥४६॥ तदनन्तर जल उत्पन्न हुआ, जैसे अन्धकार से ही अन्ध- कार की उत्पत्ति हुई हो उस जल के संघर्ष या दबाव से वायु उत्पन्न हुआ ॥५०॥ जिस प्रकार छिद्ररहित भवन निःशब्द-सा लगता है और उसे जल से भरे जाने पर, वायु शब्द के सहित कर देता है। उसी प्रकार जल से संरुद्ध आकाश में समुद्र तल का भेदन कर शब्दवान् वायु ऊपर उठता है। इस प्रकार वह वायु समुद्र की हलचल से उत्पन्न होकर गतिमान् होता है। वह आकाश में जाकर शान्त नहीं होता ॥५१-५३॥ उस वायु और जल के संघर्ष से महाशक्तिशाली तेजस्वी अग्नि उत्पन्न हुआ, जिसकी लपटें ऊपर को उठ रही थीं और जिसको प्रभा से सारा आकाश तमोहीन हो गया था ॥५४॥ अग्नि वायु की सहायता से आकाश में जल उछालता है, उस समय अग्नि और वायु के संयोग से जल धीरे-धीरे जमने लगता है और ठोस होकर बादल के रूप में परिणत हो जाता है ॥५५॥ वह जब आकाश में ऊपर उड़ता और जलीय भाग को बरसा देता है तो उसका दूसरा स्नेह- भाग रुक जाता है और वही एक में मिलते-मिलते भूमि के रूप में परिणत हो जाता है। रस, सब प्रकार के गन्ध स्नेह और प्राणियों का उत्पत्ति-स्थान यही भूमि है जिससे यह पदार्थ उत्पन्न होते हैं ॥५६-५७॥ भरद्वाज बोले--जो ये पाँच रक्षणीय धातु हैं जिनकी रचना प्रभु ने की है, जो महाभूत नाम से प्रसिद्ध