भारतकोश
बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,008 पृष्ठ

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पृष्ठ 309

२६० नारदीयपुराणम् मनः षष्ठानि भूतानि बुद्धयभावे कुतो गुणाः । इति तन्मयमेवैतत्सर्वं स्थावरजंगमम् ॥३७॥ प्रलीयते चोद्भवति तस्मान्निर्दिश्यते तथा । येन पश्यति तच्चक्षुः शृणोति श्रोत्रमुच्यते ॥३८॥ जिघ्रति घ्राणमित्याहुः रसं जानाति जिह्वया । त्वचा स्पर्शयति स्पर्शं बुद्धिविक्रियते सकृत् ॥३९॥ येन प्रार्थयते किंचित्तदा भवति तन्मनः । अधिष्ठानात्तु बुद्धेर्हि पृथगर्थानि पञ्चधा ॥४०॥ इंद्रियाणीति तान्याहुस्तान्यदृष्टोऽधितिष्ठति । पुरुषे तिष्ठती बुद्धिस्त्रिषु भावेषु वर्तते ॥४१॥ कदाचिल्लभते प्रीतिं कदाचिदुपशोचति । न सुखेन न दुःखेन कदाचिदपि वर्तते ॥४२॥ एवं नराणां मनसि त्रिषु भावेषु वर्तते । सेयं भावात्मिका भावांस्त्रीनेतानतिवर्तते ॥४४॥ सरितां सागरो भर्ता वेलानामिव वारिधिः । अतिभावगता बुद्धिर्भावैर्मनसि वर्तते ॥४५॥ वर्तमानो मुनिस्त्वेवं स्वभावमनुवर्तते । इंद्रियाणि हि सर्वाणि प्रवर्तयति सा सदा ॥४६॥ प्रीतिः सत्त्वं रजः शोकस्तमः क्रोधस्तु ते त्रयः । ये ये च भावा लोकेऽस्मिन्सर्वेऽप्येतेषुवै त्रिषु ॥४७॥ इति बुद्धिगताः सर्वा व्याख्यातास्तव भावनाः । इंद्रियाणि च सर्वाणि विजेतव्यानि धीमता ॥४८॥ सत्त्वं रजस्तमश्चैव प्राणिनां संश्रिताः सदा । त्रिविधा वेदनाश्चैव सर्वसत्त्वेषु दृश्यते ॥४९॥ सात्त्विकी राजसी चैव तामसी चेति मानद । सुखस्पर्शः सत्त्वगुणो दुःखस्पर्शो रजोगुणः ॥५०॥ तमोगुणेन संयुक्तौ भवतो व्यावहारिकौ । तव यत्प्रीतिसंयुक्तं काये मनसि वा भवेत् ॥५१॥ वर्तते सात्त्विको भाव इत्याचक्षीत तत्तथा । अथ यद्दुःखसंयुक्तमप्रीतिकरमात्मनः ॥५२॥ सकते हैं ॥३७॥ ये सम्पूर्ण स्थावर-जंगम जगत् आत्ममय हैं, उसी से यह उत्पन्न होता और उसी में विलीन होता है, इसलिए इसका उसी रूप में निर्देश किया जाता है ॥३८॥ जिससे वह (आत्मा) देखता उसको चक्षु, जिससे सुनता उसको श्रोत्र (कान) और जिससे सूंघता उसको नासिका कहते हैं। वह जिह्वा के द्वारा रस का स्वाद लेता और त्वचा के द्वारा स्पर्श का ज्ञान करता है। बुद्धि में बार-बार विकार होता है ॥३९-४०॥ पुरुष जिससे कुछ इच्छा करता है, वह मन है। बुद्धि इन सबका अधिष्ठान है। अतः पाँच विषय और पाँच इन्द्रियाँ उससे पृथक् कही गई हैं। इन सब का अधिष्ठाता चेतन क्षेत्रज्ञ इनसे नहीं देखा जाता। पुरुष में रहती हुई बुद्धि तीन भावों में विद्यमान रहती है ॥४१-४२॥ पुरुष कभी प्रसन्न होता तो कभी शोक करता है। एकान्ततः न तो उसको सुख ही होता है न दुःख ही ॥४३॥ इस प्रकार मनुष्यों का मन तीनों भावों में वर्त्तमान रहता है। वह भावात्मिका बुद्धि इन तीनों भावों को उसी तरह अपने अधीन कर लेती है जैसे नदियों का स्वामी समुद्र नदियों को आत्मसात् कर लेता है ॥४४॥ उच्च भाव को प्राप्त बुद्धि भावों द्वारा मन में वर्तमान रहती है। वर्तमान मुनि इस प्रकार स्वभाव का अनुसरण करता है और बुद्धि सदा सकल इन्द्रियों को प्रेरित करती रहती है। प्रीति सत्त्व का रूप है, शोक रज का और क्रोध तम का रूप है। इस लोक में जो भाव हैं वे सब इन तीनों गुणों में ही सन्निहित हैं ॥४५-४७॥ इस प्रकार तुम्हारी बुद्धिस्थ सब भावनाओं की व्याख्या कर दी गई। धीमान् मनुष्य सब इन्द्रियों को अपने वश में करे ॥४८॥ सत्त्व, रज और तम ये तीनों प्राणियों में सर्वदा वर्त्तमान रहते हैं। त्रिविध (सात्त्विक रजस, तामस) वेदनायें भी प्राणियों में सदा देखी जाती हैं ॥४९॥ मानद ! सत्त्वगुण सुखद स्पर्श वाला है और रजोगुण दुःखद ॥५०॥ जब वे दोनों तमोगुण से मिलते हैं तभी व्यवहारोपयोगी होते हैं। जब तुम्हारे मन में या शरीर में प्रसन्नता का अनुभव हो तब यह समझना कि तुम्हारे मन या शरीर में सत्त्वगुण का प्रवेश हुआ है। मुनि-श्रेष्ठ ! जब मन में कुछ अप्रीतिकर या दुःख की अनुभूति हो तो रजोगुण का उद्रेक हो गया