भारतकोश
बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,008 पृष्ठ

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पृष्ठ 310

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चतुश्चत्वारिंशोऽध्यायः २६१ प्रवृत्तं रज इत्येव जानीहि मुनिसत्तम । अथ यन्मोहसंयुक्तमव्यक्तविषयं भवेत् ॥५३॥ अप्रतर्क्यमविज्ञेयं तमस्तदुपधारयेत् । प्रहर्षः प्रीतिरानंदः सुखं वा शान्तचित्तता ॥५४॥ कथंचिदभिवर्तन्त इत्येते सात्त्विका गुणाः । असंतुष्टिः परितापश्च शोको लोभस्तथा क्षमा ॥५५॥ लिंगानि रजसस्तानि दृश्यंते देहहेतुभिः । अपमानस्तथा मोहः प्रमादः स्वप्नतंद्रिते ॥५६॥ कथंचिदभिवर्तंते विविधास्तामसा गुणाः । दूषणं बहुधागामि प्रार्थनासंशयात्मकम् ॥५७॥ मनः स्वनियतं यस्य स सुखी प्रेत्य चेह च । सत्त्वक्षेत्रज्ञयोरेतदन्तरं यस्य सूक्ष्मयोः ॥५८॥ सृजते च गुणानैक एको न सृजते गुणान् । मशकोदुंबरी वापिः संप्रयुक्तौ यथा सदा ॥५९॥ अन्योन्यमेतौ स्यातां च संप्रयोगस्तथोभयोः । पृथग्भूतौ प्रकृत्या तौ संप्रयुक्तौ च सर्वदा ॥६०॥ यथा मत्स्यो जलं चैव संप्रयुक्तो तथैव तौ । न गुणा विदुरात्मानं स गुणान्वेत्ति सर्वशः ॥६१॥ परिद्रष्टा गुणानां तु संस्रष्टा मन्यते तथा । इन्द्रियैस्तु प्रदीपार्थं कुरुते बुद्धि सत्तमैः ॥६२॥ निर्विचेष्टैरजानद्भिः परमात्मा प्रदीपवान् । सृजते हि गुणान्सत्त्वं क्षेत्रज्ञः परिपश्यति ॥६३॥ संप्रयोगस्तयोरेव सत्त्वक्षेत्रज्ञयोर्ध्रुवम् । आश्रयो नास्ति सत्त्वस्य क्षेत्रज्ञस्य च कश्चन ॥६४॥ सत्त्वं मनः संसृजते न गुणान्ये कदाचन । रश्मींस्तेषां स मनसा यदा सम्यङ्‌नियच्छति ॥६५॥ तदा प्रकाशतेऽस्यात्मा घटे दीपो ज्वलन्निव । त्यक्त्वा यः प्राकृतं कर्म नित्यमात्मरतिर्मुनिः ॥६६॥ सर्वभूतात्मभूतस्तस्मात्स गच्छेदुत्तमां गतिम् । यथा वारिचरः पक्षी सलिलेन न लिप्यते ॥६७॥ एवमेव कृतप्रज्ञो भूतेषु परिवर्तते । एवं स्वभावमेवैतत्स्वबुद्ध्या विहरेन्नरः ॥६८॥

ऐसा जानो ॥५२॥ इसके अनन्तर जब मन मोहाकुल हो जाय और किसी विषय का प्रत्यक्षानुभव न हो, तर्क और ज्ञान से कुछ निश्चय न हो तो समझो कि तमोगुण ने शरीर में अपना प्रभाव दिखलाया है ॥५३॥ प्रहर्ष, प्रीति, आनन्द, सुख अथवा शान्ति ये सात्त्विक गुण हैं जो कभी किसी प्रकार मनुष्य को प्राप्त होते हैं ॥५४॥ असन्तोष, परिताप-शोक, लोभ और क्रोध ये रजोगुण के चिह्न हैं। जिनका अनुभव देहधारी करते हैं ॥५५॥ अपमान, मोह, प्रमाद, निद्रा और तन्द्रा (आलस्य) ये विविध भाव तामस गुण हैं जो किसी भाँति शरीर में व्याप्त हो जाते हैं ॥५६॥ बहुधा शरीर में दोष आ जाते हैं, जो कि अधिकतर आकांक्षा संशय के कारण उत्पन्न होते हैं। जिसका मन अपने वश में है वही लोक और परलोक में सुख पाता है ॥५७॥ सूक्ष्म सत्त्व (जीव) और क्षेत्रज्ञ में यह अन्तर है कि एक (क्षेत्रज्ञ) गुणों की सृष्टि करता है और एक गुण की सृष्टि नहीं करता। जिस प्रकार मशक (कीड़ा) और गूलर परस्पर मिले रहते हैं, उसी प्रकार ये दोनों मिले रहते हैं ॥५८-५६॥ प्रकृति‌तः ये दोनों पृथक्-पृथक् हैं परन्तु सदा ये मिले ही रहते हैं। जिस प्रकार मछली और जल सर्वदा परस्पर संबद्ध रहते हैं उसी प्रकार ये दोनों ॥६०॥ गुण आत्मा को नहीं जानते परन्तु आत्मा गुणों को जानता है। यद्यपि पुरुष गुणों का द्रष्टा मात्र है, तथापि बुद्धि के संसर्ग से वह अपने को उनका स्रष्टा मानता है। इस प्रकार सत्त्व और पुरुष का संसर्ग हुआ है, किन्तु इनका पार्थक्य निश्चित है। जब बुद्धि मन के द्वारा इन्द्रियरूपी घोड़ों की रास खींचती है और भली भाँति वश में रखती है उस समय घड़े में रखे हुए प्रज्वलित दीपक की भाँति आत्मा प्रकाशित होने लगता है ॥६१-६५॥ जो मुनि प्राकृत कर्मों का परित्याग कर नित्य आत्मा से ही प्रेम करता है वह सब प्राणियों के अन्त- रात्मा की बातें जानता है और उत्तम गति को प्राप्त करता है। जैसे जल में रहने वाला पक्षी जल से लिप्त नहीं होता उसी प्रकार प्रज्ञावान् व्यक्ति सब भूतों के मध्य रहकर भी उनमें आसक्त नहीं होता ॥६६-६७॥ मनुष्य इसी प्रकार निलिप्त भाव से इच्छानुकूल विचरण करे। बिना शोक और हर्ष के, ईर्ष्या का त्याग कर समान