बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)
Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें२६२ नारदीयपुराणम् अशोचन्नप्रहृष्यंश्च समो विगतमत्सरः । भावयुक्त्या प्रयुक्तस्तु स नित्यं सृजते गुणान् ॥६६॥ ऊर्णनाभिर्यथा सूत्रं विज्ञेयास्तंतुवद्गुणाः । प्रध्वस्ता न निवर्तन्ते निवृत्तिर्नोपलभ्यते ॥७०॥ प्रत्यक्षेण परोक्षं तदनुमानेन सिद्ध्यति । एवमेके व्यवस्यंति निवृत्तिरिति चापरे ॥७१॥ उभयं संप्रधार्यैतद्व्यवस्येत यथामति । इतीमं हृदयग्रंथि बुद्धिरुचिन्तानयं दृढम् ॥७२॥ विमुच्य सुखमासीत न शोचेच्छिन्नसंशयः । मलिनाः प्राप्नुयुः शुद्धिं यथा पूर्णां नदीं नराः ॥७३॥ अवगाह्य सुविद्वांसो विद्धि ज्ञानमिदं तथा । महानद्यां हि पारज्ञस्तप्यते न तरन्यथा ॥७४॥ न तु तप्यति तत्त्वज्ञः कुलज्ञस्तु तरत्युत । एवं ये विदुरध्यात्मं कैवल्यं ज्ञानमुत्तमम् ॥७५॥ एवं बुद्धा नरः सर्वो भूतानामर्ति गतिम् । अवेक्ष्य च शनैर्बुद्ध्या लभते च शमं ततः ॥७६॥ त्रिवर्गो यस्य विदितः प्रेक्ष्य यश्च विमुंचति । अन्विष्य मनसा युक्तस्तत्त्वदर्शी निरुत्सुकः ॥७७॥ न चात्मा शक्यते द्रष्टुमिन्द्रियेषु विभाशः । तत्र तत्र विसक्तेषु दुर्भावेष्वकृतात्मभिः ॥७८॥ एतद् बुद्धा भवेद् बुद्धः किमन्यद् बुद्धलक्षणम् । विज्ञाय तद्धि मन्यन्ते कृतकृत्या मनीषिणः ॥७९॥ न भवति विदुषां ततो भयं यदविदुषां सुमहद्भयं भवेत् । नहि गतिरधिकास्ति कस्यचित्सति हि गुणे प्रवदंत्युतप्यताम् ॥८०॥ यः करोत्यनभिसंधिपूर्वकं तच्च निर्दहति यत्पुराकृतम् । नाप्रियं तदुभयं कुतः प्रियं तस्य तज्जनयतीह कुर्वतः ॥८१॥ भाव से रहे। प्रज्ञावान् व्यक्ति (जीव) भावयुक्त हो नित्य प्रति गुणों की सृष्टि करता है। जिस प्रकार मकड़ी अपने मुंह से सूत्र निकालती है उसी प्रकार यह भी गुणों की सृष्टि करता है। वे गुण ध्वस्त होते रहते हैं परन्तु यह उनकी सृष्टि करता ही रहता है, विराम नहीं करता। उस जीव का कर्तव्य प्रत्यक्ष सृष्टि द्वारा सिद्ध होता है और उस परोक्ष की अनुमान द्वारा सिद्धि होती है। इस प्रकार कुछ लोग मानते हैं कि वह नित्य प्रति व्यव- साय में लगा रहता है, और अन्य लोगों का मत है कि वह इस कार्य से विरत भी होता है। इन दोनों सिद्धान्तों का विवेचन कर मनुष्य यथामति उद्योग करे। इस प्रकार हृदय की उलझन को बुद्धि और विचारपूर्वक दृढ़ता से दूर कर सुखपूर्वक रहे और अपने संशय को दूर कर किसी प्रकार का शोक न करे। जिस प्रकार मैला- कुचैला मनुष्य स्वच्छ जल से पूर्ण नदी में नहा कर शुद्ध हो जाता है उसी प्रकार विद्वान् व्यक्ति ज्ञान की सरिता में नहा कर शुद्ध हो जाते हैं। जैसे तैराक महानदी को पार करते समय कष्ट का अनुभव नहीं करता वैसे ही कुल और तत्त्व के ज्ञाता को इस संसार में कष्ट नहीं होता, वह अनायास इस संसार-सागर को पार कर जाता है। इस प्रकार जो उत्तम कैवल्यदायक अध्यात्म ज्ञान को जानते हैं, वे ज्ञानी प्राणियों की गतिविधि को अपने ज्ञान द्वारा जानकर शान्ति प्राप्त करते हैं। जिसको त्रिवर्ग का ज्ञान है जो संसार को देखकर भी उसमें लिप्त नहीं होता, जो तत्त्वदर्शी मन से पदार्थों का सूक्ष्म निरीक्षण कर शान्त भाव से योग-युक्त होता है, उसे शान्ति मिलती है। जो अज्ञानी हैं वे तत्तत् विषयों में आसक्त इन्द्रियों में आत्मा को अलग-अलग करके नहीं देख सकते। आत्मज्ञ और ज्ञानी व्यक्ति ही बुद्ध कहा जाता है। इसके अतिरिक्त बुद्ध का दूसरा लक्षण क्या हो सकता है? मनीषी व्यक्ति इस प्रकार ज्ञान प्राप्त कर कृतकृत्य हो जाते हैं इस प्रकार ज्ञान प्राप्त हो जाने पर विद्वान् को वहाँ पर भी भय नहीं लगता जहाँ अज्ञानों को अत्यधिक भय लगता है। जो फल की इच्छा और आसक्ति का त्याग करके कर्म करता है, वह अपने पूर्व- कृत कर्म-बन्धन को जला देता है। ६८-८० ३। ऐसा पुरुष यदि कर्म करता है तो उसका किया हुआ कर्म प्रिय अथवा अप्रिय