बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)
Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंचतुश्चत्वारिंशोऽध्यायः २६३ लोकमायुरभिसुयते जनस्तस्य तज्जनयतीह कुर्वतः । तत्र पश्य कुशलान्न शोचते जायते यदि भयं पदं सदा ॥८२॥ भरद्वाज उवाच ध्यानयोगं समाचक्ष्व मह्यं तत्पदसिद्धये । यज्ज्ञात्वा मुच्यते ब्रह्मन्नरस्त्रिविधतापात् ॥८३॥ भृगुरुवाच हंत ते संप्रवक्ष्यामि ज्ञानयोगं चतुर्विधम् । यं ज्ञात्वा शाश्वतीं सिद्धिं गच्छन्तीह महर्षयः ॥८४॥ यथा स्वनुष्ठितं ध्यानं तथा कुर्वन्ति योगिनः । महर्षयो ज्ञानतृप्ता निर्वाणगतमानसाः ॥८५॥ नावर्तते पुनश्चापि मुक्ताः संसारदोषतः । जन्मदोषपरिक्षीणाः स्वभावे पर्यवस्थिताः ॥८६॥ निर्द्वन्द्वा नित्यसत्त्वस्था विमुक्ता निष्परिग्रहाः । असंगान्यविधादीनि मनः शांतिकराणि च ॥८७॥ तत्र ध्यानेन संक्लिष्टमेकाग्रं धारयेन्मनः । पिंडीकृत्येन्द्रियग्राममासीनः काष्ठवन्मुनिः ॥८८॥ शब्दं न विदेच्छ्रोत्रेण त्वचा स्पर्शं न वेद्येत् । रूपं न चक्षुषा विद्याज्जिह्वया न रसांस्तथा ॥८९॥ घ्रेयाण्यपि च सर्वाणि जहाद्द्यानेन तत्त्ववित् । पंचवर्गप्रमाथीनि नेच्छेच्चैतानि वीर्यवान् ॥९०॥ ततो मनसि संगृह्य पंचवर्गं विचक्षणः । समादध्यान्मनो भ्रांतमिंद्रियैः सह पञ्चभिः ॥९१॥ विसञ्चारि निरालम्बं पंचद्वारं बलाबलम् । पूर्वध्यानपथे धीरः समादध्यानमनस्त्वरा ॥९२॥ इन्द्रियाणि मनश्चैव यदा पिण्डीकरोत्ययम् । एष ध्यानपथः पूर्वो मया समनुवर्णितः ॥९३॥ फल नहीं उत्पन्न नहीं कर सकता। यदि मनुष्य अपनी आयु भर लोक को सताता है, तो कर्म में लगे हुए उस पुरुष का वह अशुभ कर्म उसके लिए यहाँ फल ही उत्पन्न करता है। देखो, कुशल (पुण्य) कर्म करने से कोई भी शोक में नहीं पड़ता, परन्तु यदि उससे पाप बनता है तो सदा के लिए भयपूर्ण स्थान प्राप्त होता है ॥८१-८२॥ भरद्वाज बोले- ब्रह्मन् ! आप ब्रह्मपद पाने के लिए उपयुक्त ध्यान योग को कहिए, जिसको जान कर मनुष्य त्रिविध ताप से मुक्त हो जाता है ॥८३॥ भृगु बोले- बहुत अच्छा, मैं अब चार प्रकार के ज्ञान योग को कह रहा हूँ, जिसको जानकर महर्षि शाश्वत पदवी को पा जाते हैं ॥८४॥ योग जैसे हो वैसे भली भाँति ध्यान योग को साधना करते हैं। ज्ञान से तृप्त और मुक्ति में ही रमने वाले योगी संसार के दोष से मुक्त हो कर पुनः उस बन्धन में नहीं पड़ते ॥८५३॥ वे जन्म के दोषों के सहज पापों को नष्ट कर स्वभाव (आत्मभाव) में ही स्थिर हो जाते हैं। सुख दुःख से परे, नित्य सात्विक वृत्ति में स्थित, विमुक्त और परिग्रह से विमुख योगी आवागमन के चक्कर में नहीं पड़ता। अनासक्ति आदि गुण मन को शान्ति देने वाले ध्यान के द्वारा अपने पीड़ित मन को एकाग्र करे। मुनि काष्ठ की भाँति अटल होकर बैठ जाय और सम्पूर्ण इन्द्रियों को विषयों की ओर से हटाकर, कानों से किसी प्रकार का शब्द न सुने, जिह्वा से रस और सब प्रकार के सूँघने योग्य पदार्थों को तत्त्वज्ञ व्यक्ति ध्यान के द्वारा छोड़ दे। इसके अनन्तर पराक्रमी योगी पाँचों इन्द्रियों को चंचल कर देने वाले विषयों की इच्छा न करे। विद्वान् मन में पंच वर्ग को वशीभूत कर पाँचों इन्द्रियों के साथ इधर-उधर भ्रमण करने वाले मन को एकाग्र करे। धीर व्यक्ति शीघ्र ही संचरणशील, निरालम्ब, पंच द्वार को (पाँचों इन्द्रियों को) पूर्व (कथित) ध्यान-पथ में समाधिस्थ करे ॥८६-९२॥ पाँचों इन्द्रियों और मन एक केन्द्र में (आत्मा में) केन्द्रित हो जाते हैं तब वह साधन ध्यान-