भारतकोश
बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,008 पृष्ठ

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२६४ नारदीयपुराणम् तस्य तत्पूर्वसंरुद्ध आत्मषष्ठमनंतरम् । स्फुरिष्यति समुद्रांता विद्युदम्बुधरे यथा ॥६४॥ जलबिंदुर्यथा लोलः पर्णस्थः सर्वतश्चलः । एवमेवास्य चित्तं च भवति ध्यानवर्त्मनि ॥६५॥ समाहितं क्षणं किंचिद्ध्यानवर्त्मनि तिष्ठति । पुनर्वायुपथं भ्रांतं मनो भवति वायुवत् ॥६६॥ अनिर्वेदो गतक्लेशो गततंद्रो ह्यमत्सरी । समादध्यात्पुनश्चेतो ध्यानेन ध्यानयोगवित् ॥६७॥ विचारश्च वितर्कश्च विवेकश्चोपजायते । मुनेः समाधियुक्तस्य प्रथमं ध्यानमादितः ॥६८॥ मनसा क्लिश्यमानस्तु समाधानं च कारयेत् । न निर्वेदं मुनिर्गच्छेत्कुर्यादेवात्मनो हितम् ॥६९॥ पांशुभस्मकरीषाणां यथा वै राशयश्चिताः । सहसा वारिणा सिक्ता न यांति परिभावनाः ॥१००॥ किंचित् स्निग्धं यथा च स्याच्छुष्कं चूर्णमभावितम् । क्रमेण तु शनैर्गच्छेत्सर्वं तत्परिभावनम् ॥१०१॥ एवमेवेन्द्रियग्रामं शनैः शं परिभावयेत् । संहरेत्क्रमशश्चैव सम्यक् तत्प्रशमिष्यति ॥१०२॥ स्वयमेव मनश्चैवं पंचवर्गं मुनीश्वर । पूर्वं ध्यानपथे स्थाप्य नित्ययोगेन शाम्यति ॥१०३॥ न तत्पुरुषकारेण न च दैवेन केनचित् । सुखमेष्यति तत्तस्य यदेवं संयतात्मनः ॥१०४॥ सुखेन तेन संयुक्तो रंस्यते ध्यानकर्मणि । गच्छंति योगिनो ह्येवं निर्वाणं तु निरामयम् ॥१०५॥ सनंदन उवाच इत्युक्तो भृगुणा ब्रह्मन्भरद्वाजः प्रतापवान् । भृगुं परमधर्मात्मा विस्मितः प्रत्यपूजयत् ॥१०६॥ एष ते प्रसवो विद्वन् जगतः संप्रकीर्तितः । निखिलेन महाप्राज्ञ किं भूयः श्रोतुमिच्छसि ॥१०७॥ इति श्रीबृहन्नारदीयपुराणे द्वितीयपादे चतुश्चत्वारिंशोऽध्यायः पथ कहा जाता है जिसका वर्णन पहले मैंने किया है । इसके अनन्तर पहले से वश में किये हुए मन में छठी आत्म-शक्ति का स्फुरण उसी प्रकार होता है जिस प्रकार समुद्र के गर्भ में रहने वाली विद्युत् का स्फुरण मेघों के बीच होता है । जैसे चंचल जलबिन्दु पत्ते (कमल) पर कभी स्थिर नहीं रहता, सर्वदा इधर-उधर हिलता रहता है उसी प्रकार योगी का चित्त ध्यान मार्ग में चंचल होता है । वह कुछ क्षण तक एकाग्र होकर ध्यान-मार्ग पर स्थिर रहता है, पुनः वायु पथ पर वायु की भाँति चंचल हो जाता है । इस अवस्था में ध्यानयोगविद् योगी निर्वेद, आलस्य, क्लेश और मात्सर्य से मुक्त होकर ध्यान के द्वारा पुनः मन को एकाग्र करे । समाधि युक्त मुनि को ध्यान के साथ ही विचार, वितर्क और विवेक उत्पन्न हो जाता है । उस समय मन में उठे हुए तर्कों का किसी प्रकार समाधान करे । उस समय मुनि किसी प्रकार के दुःख का अनुभव न करे प्रत्युत आत्म-हित की ओर ही ध्यान दे । जिस प्रकार धूलि, राख, और करसी की राशि और चिता जल से सींची जाने पर भी एकाएक शान्त नहीं होती, प्रत्युत पहले कुछ भीगती है, कुछ सूखी रहती है तब फिर धीरे-धीरे गोली बनती है । उसी प्रकार इन्द्रिय-समूह को धीरे-धीरे शान्त करे । क्रमशः इनको विषयों की ओर से हटाये फिर वे भली भाँति स्वयं शान्त हो जायँगी । मुनीश्वर ! स्वयम् ही मन और इन्द्रिय-समूह को ध्यान पथ पर आरूढ़ करे, तत्पश्चात् ये स्वयं नित्ययोग के द्वारा शान्त हो जायेंगे । वह सुख न तो पौरुष से अथवा दैव से ही प्राप्त हो सकता है जो सुख संयमी को अपनी इस ध्यान-साधना से प्राप्त हो सकता है । योगी उस सुख में मग्न हो कर ध्यान कर्म में रमता हुआ निरामय निर्वाण को प्राप्त करता है ॥९३-१०५ सनन्दन बोले- ब्रह्मन् ! इस प्रकार भृगु ने प्रतापी भरद्वाज से कहा । परम धर्मात्मा भरद्वाज भी भृगु की ज्ञान-गरिमा को देखकर विस्मित हो गए और उन्होंने उनकी पूजा की । विद्वन् ! यही जगत् की उत्पत्ति की सम्पूर्ण कथा है । महाप्राज्ञ ! अब तुम क्या सुनना चाहते हो ? ॥१०६-१०७॥ श्री नारदीयमहापुराण के पूर्वार्ध में चौवालीसवाँ अध्याय समाप्त ॥४४॥