भारतकोश
बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,008 पृष्ठ

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पृष्ठ 314

पञ्चचत्वारिंशोऽध्यायः सूत उवाच सनंदनवचः श्रुत्वा मोक्षधर्माश्रितं द्विजाः । पुनः पप्रच्छ तत्त्वज्ञो नारदोऽध्यात्मसत्कथाम् ॥१॥ नारद उवाच श्रुतं मया महाभाग मोक्षशास्त्रं त्वयोदितम् । न च मे जायते तृप्तिर्भूयोभूयोऽपि शृण्वतः ॥२॥ यथा संमुच्यते जंतुरविद्याबंधनान्मुने । तथा कथय सर्वज्ञ मोक्षधर्म सदाश्रितम् ॥३॥ सनंदन उवाच अत्राप्युदाहरंतीममितिहासं पुरातनम् । यथा मोक्षमनुप्राप्तो जनको मिथिलाधिपः ॥४॥ जनको जनदेवस्तु मिथिलाया अधीश्वरः । औध्वंदेहिकधर्माणामासीद्व्यक्तो विचिंतने ॥५॥ तस्य तु शतमाचार्या वसन्ति सततं गृहे । दर्शयंतः पृथग्धर्मान्नानापाखंडवादिनः ॥६॥ स तेषां प्रेत्यभावे च प्रेत्य जातो विनिश्चये । आगमस्थः स भूयिष्ठमात्मतत्त्वेन तुष्यति ॥७॥ तत्र पंचशिखो नाम कापिलेयो महामुनिः । परिधावन्महीं कृत्स्नां जगाम मिथिलामथ ॥८॥ सर्वसंन्यासधर्माणः तत्त्वज्ञानविनिश्चये । सुपर्यवसितायंश्च निर्द्वंद्वो नष्टसंशयः ॥६॥ अध्याय ४५ पञ्चशिख का राजा जनक को उपदेश सूत बोले—द्विजगण ! मोक्ष धर्म से युक्त सनन्दन की वाणी सुनकर तत्त्वज्ञ नारद मुनि ने पुनः अध्यात्म की सत् चर्चा छेड़ी ॥१॥ नारद बोले—महाभाग ! आपके मुख से मोक्ष का रहस्य सुन लिया, परन्तु बार-बार सत्कथा को सुनने पर भी मुझे तृप्ति नहीं हो रही है ॥२॥ मुने ! अविद्या के बन्धन से जीव को जिस उपाय से मुक्ति होती है उसको कहिए । सर्वज्ञ ! आप ही मोक्ष धर्म के ज्ञाता एवं पालक हैं ॥३॥ सनन्दन ने कहा—इस विषय में जिस प्रकार मिथिलापति जनक ने मोक्ष प्राप्त किया था, सुधीजन उस पुरातन इतिहास को उदाहरण रूप में प्रस्तुत करते हैं । राजा जनक मिथिला के अधीश्वर थे जिनको प्रजा देवता के समान मानती थी । वे सदा एकाग्र होकर परलोक धर्म (श्राद्ध या यम-विद्या) के विषय में चिन्तन किया करते थे ॥४-५॥ उनके यहाँ नाना प्रकार के तर्क करने वाले इस विद्या के ज्ञाता आचार्य रहा करते थे जो इस विद्या के सम्बन्ध में नाना प्रकार के धर्म (मत) प्रस्तुत करते थे । वह राजा उनके साथ, प्रेत्य भाव और मृत्यु के अनन्तर जाति ज्ञान के निर्णय के विषय में शास्त्रानुसार निश्चय कर उस आत्मतत्व के निर्णय से अत्यन्त प्रसन्न होते थे ॥६-७॥ किसी समय उनकी मिथिला पुरी में महामुनि पंचशिख कापिलेय (कपिल के पुत्र) सम्पूर्ण पृथ्वी को परिक्रमा करते हुए पहुँचे ॥८॥ वे मुनि सब प्रकार के संन्यास धर्म के तत्त्वज्ञान के निर्णायक थे । उनको तत्त्वार्थ ज्ञान के कारण किसी प्रकार का संशय नहीं था ॥९॥ वे स्वयं द्वन्द्वातीत थे । ऋषियों