भारतकोश
बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,008 पृष्ठ

पृष्ठ 315, कुल 1008 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 315

२६६ नारदीयपुराणम् ऋषीणामाहुरेकं यं कामादवसितं नृषु । शाश्वतं सुखमत्यंतमन्विच्छन्स सुदुर्लभम् ॥१०॥ यमाहुः कपिलं सांख्याः परमर्षिप्रजापतिम् । स मन्ये तेन रूपेण विख्यापयति हि स्वयम् ॥११॥ आसुरेः प्रथमं शिष्यं यमाहुश्चिरजीविनम् । पंचस्रोतसि यः सत्रमास्ते वर्षसहस्रकम् ॥१२॥ पंचस्रोतसमागम्य कापिलं मंडलं महत् । पुरुषावस्थमव्यक्तं परमार्थं न्यवेदयत् ॥१३॥ इष्टिमंत्रेण संयुक्तो भूयश्च तपसा सुरिः । क्षेत्रक्षेत्रज्ञयोर्व्यक्तिं विबुधे देहदर्शनः ॥१४॥ यत्तदेकाक्षरं ब्रह्म नानारूपं प्रदृश्यते । आसुरिमंडले तस्मिन्प्रतिपेदे तमव्ययम् ॥१५॥ तस्य पंचशिखः शिष्यो मानुष्या पयसा भृतः । ब्राह्मणी कपिली नाम काचिदासीत्कुटुम्बिनी ॥१६॥ तस्याः पुत्रत्वमागत्य स्त्रियाः स पिबति स्तनौ । ततश्च कापिलेयत्वं लेभे बुद्धिं च नैष्ठिकीम् ॥१७॥ एतन्मे भगवान्प्राह कापिलेयस्य संभवम् । तस्य तत्कापिलेयत्वं सर्ववित्त्वमनुत्तमम् ॥१८॥ सामात्यो जनको ज्ञात्वा धर्मज्ञो ज्ञातिनं मुने । उपेत्य शतमाचार्यान्मोहायास हेतुभिः ॥१९॥ जनकस्त्वभिसंरक्तः कापिलेयानुदर्शनात् । उत्सृज्य शतमाचार्यान्पृष्ठतोऽनुजगाम तम् ॥२०॥ तस्मै परमकल्याणं प्रणताय च धर्मतः । अब्रवीत्परमं मोक्षं यत्तत्सांख्यं विधीयते ॥२१॥ जातिनिर्वेदमुकत्वा स कर्मनिर्वेदमब्रवीत् । कर्मनिर्वेदमुक्त्वा च सर्वनिर्वेदमब्रवीत् ॥२२॥

में एक थे। उन्होंने मानव-जीवन में शाश्वत, सुदुर्लभ सुख की इच्छा से काम इच्छा को जीत लिया था। सांख्य के अनुयायी परमर्षि प्रजापति को कपिल कहते हैं। वे कपिल ही स्वयं को मानो उसी (पंचशिख) रूप में विख्यापित करते थे। उन्हें लोग आसुरि के प्रथम शिष्य और चिरंजीवी कहते हैं। उन्होंने पंचस्रोत में हजार वर्ष तक यज्ञ किया था ॥१०-१२॥ पंचस्रोत में महान् कापिल-मण्डल (कपिल मतानुयायी मुनि मण्डलो) को उन्होंने सब में अन्तर्यामी रूप से स्थित परमार्थस्वरूप अव्यक्त ब्रह्म के विषय में निवेदन किया था और क्षेत्र तथा क्षेत्रज्ञ की विशे- षता को जान लिया था। जो एकाक्षर ब्रह्म नाना रूपों में देखा जाता है, आसुरि ने उस मण्डल में उस अव्यय ब्रह्म को प्राप्त कर लिया था। उसी आसुरि का पंचशिख नामक शिष्य था जिसका पालन-पोषण मानुषी के दूध से हुआ। कोई कपिली नामकी एक गृहस्थ ब्राह्मणी थी। उस स्त्री के गर्भ से उत्पन्न होकर वह उसके स्तन को पीता था। इसके अनन्तर उसको कापिलेयत्व और नैष्ठिक बुद्धि प्राप्त हुई। कापिलेय की उस उत्पत्ति कथा को भगवान् ने मुझसे कहा था ॥१३-१७३ ।

मुने ! धर्मज्ञ जनक उस मुनि का कापिलेयत्व एवं सर्वोत्तम सर्वज्ञत्व जानकर मन्त्री के सहित सौ आचार्यों को साथ लेकर उस मुनि के समीप आये और अपने तर्क और हेतुवाद से उस मुनि को प्रसन्न कर दिया। राजा जनक उस कापिलेय के दर्शन से इतने अधिक प्रसन्न हो गए कि अपने सौ आचार्यों को छोड़कर उनके पीछे-पीछे चल पड़े। उन्होंने उस विनीत जनक को कल्याणमय परममोक्ष की व्याख्या सुनाई, जिसको सांख्ययोग कहते हैं। उसने प्रारम्भ में जाति-निर्वेद' को कहा फिर कर्मनिर्वेद की व्याख्या की। कर्मनिर्वेद की व्याख्या के पश्चात् सर्वनिर्वेद'

१. जन्म के गर्भवास आदि के कारण जो कष्ट होता है, उस पर विचार करके शरीर से वैराग्य होना 'जातिनिर्वेद' है। २. कर्मजनित क्लेश-नाना योनियों की प्राप्ति एवं नरकादि यातना का विचार करके पाप तथा काम्य कर्मों से विरत होना 'कर्मनिर्वेद' है। ३. इस जगत् की छोटी-से छोटी वस्तुओं से लेकर ब्रह्म-लोक तक के भोगों को क्षणभंगुरता और दुःख- रूपता का विचार करके सब ओर से विरक्त होना 'सर्वनिर्वेद' कहलाता है।