भारतकोश
बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,008 पृष्ठ

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पृष्ठ 316

पञ्चचत्वारिंशोऽध्यायः २६७ यदर्थं धर्मसंसर्गः कर्मणा च फलोदयः । तमनाश्वासिकं मोहं विनाशि चलमध्रुवम् ॥२३॥ दृश्यमाने विनाशे च प्रत्यक्षे लोकसाक्षिके । अगमात्परमस्तीति ब्रुवन्नपि पराजितः ॥२४॥ अनात्मा ह्यात्मनो मृत्युः क्लेशो मृत्युर्जरामयः । आत्मानं मन्यते मोहात्तदसम्पक् परं मतम् ॥२५॥ अथ चेदेवमप्यस्ति यल्लोके नोपपद्यते । अजरोऽयममृत्युश्च राजासौ मन्यते यथा ॥२६॥ अस्ति नास्तीतिवाप्येतत्तस्मिन्नसितलक्षणे । किमधिष्ठाय तद् ब्रूयाल्लोकयात्राविनिश्चयम् ॥२७॥ प्रत्यक्षं ह्य तयोर्मूलं कृतांतो ह्यतयोरपि । प्रत्यक्षो ह्यागमो भिन्नः कृतांतो वा न किचन ॥२८॥ यत्र तत्रानुमानेऽस्मिन्कृतं भावयतेऽपि च । अन्यो जीवः शरीरस्य नास्तिकानां मते स्थितः ॥२९॥ रेतोवटकणीकायां घृतपाकाधिवासनम् । जातिस्मृतिरयस्कांतः सूर्यकांतोऽबुभक्षणम् ॥३०॥ प्रेतभूतप्रियश्चैव देवता ह्युपयाचनम् । मृतकर्मनिवृत्तिं च प्रमाणमिति निश्चयः ॥३१॥ नन्वेते हेतवः संति ये केचिन्मूर्तिसंस्थिताः । अमूर्तस्य हि मूर्तेन सामान्यं नोपलभ्यते ॥३२॥ का रहस्योद्घाटन किया । उन्होंने कहा—'जिसके लिए धर्म का आचरण किया जाता है, जो कर्मों के फल का उदय होने पर प्राप्त होता है, वह इहलोक या परलोक का भोग नश्वर है। उस पर आस्था करना उचित नहीं। वह मोहरूप चंचल और अस्थिर है ॥१९-२३॥ कुछ नास्तिक ऐसा कहा करते हैं कि 'देहरूपी आत्मा का विनाश प्रत्यक्ष देखा जा रहा है, सम्पूर्ण लोक इसका साक्षी है; फिर भी यदि कोई शास्त्र-प्रमाण की ओट लेकर देह से भिन्न आत्मा की सत्ता का प्रतिपादन करता है तो वह परास्त ही है, क्योंकि उसका कथन लोकानुभव के विरुद्ध है । आत्मा के स्वरूप का अभाव हो जाना ही उसकी मृत्यु है । जरारोगमय क्लेश मृत्यु है । जो लोग मोहवश आत्मा को देह से भिन्न मानते हैं, उनको वह मान्यता ठीक नहीं है ॥२४-२५॥ यदि ऐसी वस्तु का भी अस्तित्व मान लिया जाय, जो लोक में संभव नहीं है, अर्थात् यदि शास्त्र के आधार पर यह स्वीकार किया जाय कि शरीर से भिन्न कोई अजर-अमर आत्मा है, जो स्वर्ग आदि लोकों में दिव्य सुख भोगता है, तब बंदी लोग, जो राजा को अजर-अमर कहते हैं, उनको वह बात भी ठीक माननी पड़ेगी । सारांश यह है कि जैसे बंदी लोग आशीर्वाद में उपचारतः राजा को अजर-अमर कहते हैं, उसी प्रकार शास्त्र का वह वचन भी औपचारिक ही है। नीरोग शरीर को ही अजर-अमर और यहाँ के प्रत्यक्ष सुख-भोग को ही स्वर्गीय सुख कहा गया है । यदि आत्मा है या नहीं यह संशय उपस्थित होने पर अनुमान से उसके अस्तित्व का साधन किया जाय तो इसके लिए कोई ऐसा ज्ञापक हेतु नहीं उपलब्ध होता, जो कहीं व्यभिचरित न होता हो; फिर किस अनुमान का आश्रय लेकर लोक-व्यवहार का निश्चय किया जा सकता है ? अनुमान और आगम—इन दोनों प्रमाणों का मुख्य प्रत्यक्ष प्रमाण है। आगम या अनुमान यदि प्रत्यक्ष अनुभव के विरुद्ध है तो वह कुछ भी नहीं है, उसकी प्रामाणिकता स्वीकार नहीं की जा सकती । जिस किसी भी अनुमान में ईश्वर, अदृष्ट अथवा नित्य आत्मा की सिद्धि के लिए की हुई भावना भी व्यर्थ है; अतः नास्तिकों के मत में शरीर से भिन्न जीव का अस्तित्व नहीं है, यह बात स्थिर हुई ॥२६-२९॥ जैसे वटवृक्ष के बीज में पत्र, पुष्प, फल, मूल तथा त्वचा आदि अन्तर्हित होते हैं, जैसे गाय के द्वारा खायी हुई घास में घी, दूध आदि प्रकट हो जाते हैं तथा जिस प्रकार अनेक ओषध द्रव्यों का पाक एवं अधिवासन करने से उसमें नशा पैदा करने वाली शक्ति आ जाती है उसी प्रकार वीर्य से ही शरीर आदि के साथ चेतनता भी प्रकट होती है। [उक्त मत का खण्डन--] मरे हुए शरीर में जो चेतनता का अतिक्रमण देखा जाता है, वही देहातिरिक्त आत्मा के अस्तित्व में प्रमाण है। यदि चेतनता देह का ही धर्म होता तो मृतक शरीर में भी उसकी उपलब्धि ३८—मार० पु०