भारतकोश
बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,008 पृष्ठ

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पृष्ठ 317

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२६८ नारदीयपुराणम् अविद्या कर्म तृष्णा च केचिदाहुः पुनर्भवम् । तस्मिन्नष्टे च दग्धे च चित्ते मरणधर्मिणि ॥३३॥ अन्योऽस्माज्जायते मोहस्तमाहुः सत्त्वसंक्षयम् । यदा सरूपतश्चान्यो जातितः श्रुततोऽर्थतः ॥३४॥ कथमस्मिन्स इत्येव संबंधः स्यादसंहितः । एवं सति च का प्रीतिर्ज्ञानविद्यातपोबलैः ॥३५॥ यदस्यान्येरितं कर्म सामान्यात्प्रतिपद्यते । अपि त्वयमिवैवान्यैः प्राकृतैर्दुःखितो भवेत् ॥३६॥ सुखितो दुःखितो वापि दृश्याद्दृश्यविनिर्णयः । यथा हि मुशलैर्हन्युः शरीरं तत्पुनर्भवेत् ॥३७॥ वृथा ज्ञानं यदन्यच्च येनैतन्नोपलभ्यते । ऋतुमंवत्सरौ तिष्यः शीतोष्णोऽथ प्रियाप्रिये ॥३८॥ यथा तातानि पश्यंति तादृशः सत्त्वसंक्षयः । जरयाभिपरीतस्य मृत्युना च विनाशितम् ॥३९॥ दुर्बलं दुर्बलं पूर्वं गृहस्येव विनश्यति । इन्द्रियाणि मनो वायुः शोणितं मांसमस्थि च ॥४०॥ आनुपूर्व्या विनश्यंति स्वं धातुमुपयाति च । लोकयात्राविघातश्च दानधर्मफलागमे ॥४१॥ तदर्थं वेदशब्दाश्च व्यवहाराश्च लौकिकाः । इति सम्यङ् मनस्येते बहवः संति हेतवः ॥४२॥ एतदस्तीति नास्तीति न कश्चित्प्रतिदृश्यते । तेषां विमृशतामेव तत्सम्यगभिधावताम् ॥४३॥ क्वचिन्निवसते बुद्धिस्तत्र जीर्यति वृक्षवत् । एवमर्थै रनर्थैश्च दुःखिताः सर्वजंतवः ॥४४॥ आगमैरपकृष्यंते हस्तिपैर्हस्तिनो यथा । ॥४५॥ होती । मृत्यु के पश्चात् कुछ काल तक शरीर तो रहता है, पर उसमें चेतना नहीं रहती। अतः चेतन आत्मा शरीर से भिन्न है--यह सिद्ध होता है । नास्तिक भी रोग आदि की निवृत्ति के लिए मन्त्र-जप तथा तान्त्रिक पद्धति से देवता आदि की आराधना करते हैं । वह देवता क्या है ? यदि पांचभौतिक है तो घर आदि की भांति उसका दर्शन होना चाहिए और यदि वह भौतिक पदार्थों से भिन्न है तो चेतन की सत्ता स्वतः सिद्ध हो गया । अतः देह से भिन्न आत्मा है--यह प्रत्यक्ष अनुभव से सिद्ध हो जाता है; और देह ही आत्मा है, यह प्रत्यक्ष अनुभव के विरुद्ध जान पड़ता है । यदि शरीर की मृत्यु के साथ आत्मा का मृत्यु मान ली जाय तब तो उसके किए हुए कर्मों का भी नाश मानना पड़ेगा; फिर तो उसके शुभाशुभ कर्मों का फल भोगने वाला कोई नहीं रह जायगा और देह की उत्पत्ति में अकृताभ्यागम (बिना किये हुए कर्म का ही भोग प्राप्त हुआ ऐसा) मानने का प्रसंग उपस्थित होगा । ये सब प्रमाण यह सिद्ध करते हैं कि देहातिरिक्त चेतन आत्मा की सत्ता अवश्य है । नास्तिकों की ओर से जो हेतुभूत दृष्टान्त दिये गये हैं, वे मूर्त पदार्थ हैं । मूर्त जड़-पदार्थ से मूर्त जड़-पदार्थ की ही उत्पत्ति होती है यही उनके द्वारा सिद्ध होता है। जैसे काष्ठ से अग्नि का उत्पत्ति आदि । पञ्चभूतों से आत्मा की उत्पत्ति की भांति यदि मूर्त से अमूर्त की उत्पत्ति मानी जाय तो पृथ्वी आदि मूर्त भूतों से अमूर्त आकाश की भी उत्पत्ति स्वीकार करनी पड़ेगी, जो असम्भव है, अतः स्थूल भूतों के संयोग से अमूर्त चेतन आत्मा की उत्पत्ति सर्वथा असम्भव है । आत्मा की सत्ता न मानने पर लोकयात्रा का निर्वाह नहीं होगा । दान, धर्म के फल की प्राप्ति के लिए कोई आस्था नहीं रहेगी, क्योंकि वैदिक शब्द तथा लौकिक व्यवहार सब आत्मा को ही सुख देने के लिए हैं । इस प्रकार मन में अनेक तर्क उठते हैं और उन तर्कों तथा युक्तियों से आत्मा की सत्ता या असत्ता का निर्धारण कुछ भी होता नहीं दिखायी देता । इस प्रकार विचार करते हुए भिन्न-भिन्न मतों की ओर दौड़ने वाले लोगों की बुद्धि कहीं एक जगह प्रवेश करती है और वहीं वृक्ष की भांति जड़ जमाये जीर्ण ही जाती है । इस प्रकार अर्थ और अनर्थ से सभी प्राणी दुःखी रहते हैं ॥३०-४४॥ केवल शास्त्र ही उन्हें खींचकर राह पर लाते हैं, ठीक उसी तरह