भारतकोश
बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,008 पृष्ठ

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पृष्ठ 318

पञ्चचत्वारिंशोऽध्यायः २६६ अर्थांस्तथा हंति सुखावहांश्च लिहंत एते बहवोऽपशुष्काः । महत्तरं दुःखमभिप्रपन्ना हित्वामिषं मृत्युवशं प्रयांति ॥४६॥ विनाशिनी ह्यध्रुवजीवितः किं किं बंधुभिर्मित्रपरिग्रहैश्च । विहाय यो गच्छति सर्वमेव क्षणेन गत्वा न निवर्तते च ॥४७॥ भूव्योमतोयानलवायवोऽपि सदा शरीरं प्रतिपालयंति । इतीदमालक्ष्य रतिः कुतो भवेद्विनाशिनाप्यस्य न शर्म विद्यते ॥४८॥ इदमनुपधिवाक्यमच्छलं परमनिरामयमात्मसाक्षिकम् । नरपतिरभिवीक्ष्य विस्मितः पुनरनुयोक्तुमिदं प्रचक्रमे ॥४६॥ जनक उवाच भगवन्यदि न प्रेत्य संज्ञा भवति कस्यचित् । एवं सति किम ज्ञानं ज्ञानं वा किं करिष्यति ॥५०॥ सर्वमुच्छेदनिष्ठं स्यात्पश्य चैतद्विजोत्तम । अप्रमत्तः प्रमत्तो वा किं विशेषं करिष्यति ॥५१॥ असंसर्गो हि भूतेषु संसर्गो वा विनाशिषु । कस्मै क्रियेत कल्पेत निश्चयः कोऽत्र तत्त्वतः ॥५२॥ सनंदन उवाच तमसा हि मतिच्छन्नं विश्रांतमिव चातुरम् । पुनः प्रशमयन्वाक्यैः कविः पंचशिखोऽब्रवीत् ॥५३॥ पंचशिख उवाच उच्छेदनिष्ठा नेहास्ति भावनिष्ठा न विद्यते । अयं ह्यपि समाहारः शरीरेन्द्रियचेतसाम् ॥५४॥ वर्तंते पृथगन्योन्यमप्युपाश्रित्य कर्मसु । धातवः पंचधा तोयं खे वायुर्ज्योतिर्बो धरा ॥५५॥ तेषु भावेन तिष्ठंति वियुज्यंते स्वभावतः । आकाशं वायुरुष्मा च स्नेहो यश्चापि पार्थिवः ॥५६॥ एष पञ्चसमाहारः शरीरमपि नैकधा । ज्ञानमूष्मा च वायुश्च त्रिविधः कायसंग्रहः ॥५७॥ इंद्रियाणींद्रियार्थाश्च स्वभावश्चेतनामनः । प्राणापानौ विकारश्च धातवश्चात्र निःसृताः ॥५८॥ श्रवणं स्पर्शनं जिह्वा दृष्टिर्नासा तथैव च । इंद्रियाणीति पंचैते चित्तपूर्वांगमा गुणाः ॥५६॥ जैसे महावत हाथो पर अंकुश रखकर उन्हें काबू में किये रहते हैं। बहुत से शुष्क हृदय वाले लोग ऐसे विषयों की लिप्सा रखते हैं, जो अत्यन्त सुखदायक हों; किन्तु इस लिप्सा में भारी से भारी दुःखों का सामना करना पड़ता है और वे अन्त में भोगों को छोड़कर मृत्यु के ग्रास बन जाते हैं। जो एक दिन नष्ट होने वाला है, जिसके जीवन का कुछ ठिकाना नहीं, ऐसे अनित्य शरीर को पाकर इन बन्धु-बान्धवों तथा स्त्री-पुत्रादि से क्या लाभ है ? यह सोचकर जो मनुष्य इन सबको क्षण भर में वैराग्यपूर्वक त्याग कर चल देता है, उसे मृत्यु के बाद फिर जन्म नहीं लेना पड़ता । पृथ्वी, आकाश, जल, अग्नि और वायु ये सदा शरीर की रक्षा करते रहते हैं, इस बात को अच्छी तरह समझ लेने पर इसके प्रति आसक्ति कैसे हो सकती है ? जो एक दिन मृत्यु के मुख में पड़ने वाला है, ऐसे शरीर से सुख कहां ? जो लोग मुक्ति के लिए प्रयत्नशील हों, उनको चाहिए कि सम्पूर्णा सकाम कर्मों तथा धन आदि का भी त्याग करें। जो त्याग किये बिना व्यर्थ ही विनीत (शमदमादि साधनों में तत्पर) होने का मिथ्या दावा करते हैं,