बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)
Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें३०२ नारदीयपुराणम् अपि च भवति मैथिलेन गीतं नगरमुपाहितमग्निनाभिवीक्ष्य । न खलु मम हि दह्यतेऽत्र किंचित्स्वयमिदमाह किल स्म भूमिपालः ॥८६॥ इमं हि यः पठति विमोक्षनिश्चयं महामुने सततमवेक्षते तथा । उपद्रवाननुभवते ह्यदुःखितः प्रमुच्यते कपिलमिवेत्य मैथिलः ॥८७॥ इतिबृहन्नारदीयपुराणे पूर्वभागे बृहदुपाख्याने द्वितीयपादे पञ्चचत्वारिंशोऽध्यायः ॥४५॥ अथ षट्चत्वारिंशोऽध्यायः सूत उवाच तच्छ्रुत्वा नारदो विप्रा मैथिलाध्यात्ममुत्तमम् । पुनः पप्रच्छ तं प्रीत्या सनंदनमुदारधीः ॥१॥ नारद उवाच आध्यात्मिकादिविविधं तापं नानुभवेद्यथा । प्रब्रूहि तन्मुने मह्यं प्रपन्नाय दयानिधे ॥२॥ हो गई कि एक बार मिथिला नगरी को आग से जलती देखकर भूपाल ने स्वयं यह उद्गार प्रकट किया कि 'इस नगर के जलने से मेरा कुछ भी नहीं जलता ।' महामुनि नारदजी, इस अध्याय में मोक्षतत्त्व का निर्णय किया गया है। जो सदा इसका स्वाध्याय और चिन्तन करता है, वह दुःख-शोक से रहित हो कभी किसी प्रकार के उपद्रव का अनुभव नहीं करता तथा जिस प्रकार राजा जनक पञ्चशिख के समागम से इस ज्ञान को पाकर मुक्त हो गए थे, उसी प्रकार वह भी मोक्ष प्राप्त करता है ॥८६-८७॥ श्रीनारदीयमहापुराण के पूर्वभाग में पैंतालीसवां अध्याय समाप्त ॥४५॥ नोट--इस अध्याय का अनुवाद दूसरे संस्करण से किया गया है, जो गीता प्रेस के सौजन्य से हमें प्राप्त हुआ। अतः गीता प्रेस के प्रति हम कृतज्ञता प्रकट करते हैं और पाठक के प्रति क्षमाप्रार्थना, क्योंकि मूलानुगामी अनुवाद न होने पर भी विषयानु कूल होने से हमने इसे उद्धृत किया है। [अनुवादक] अध्याय ४६ त्रिविध तापों से छूटने के उपाय आदि का प्रतिपादन सूत बोले-विप्रगण ! उदार बुद्धि नारद ने जनक के उस उत्तम अध्यात्मज्ञान को सुनकर पुनः प्रसन्न हो सनन्दन से पूछा- ॥१॥ नारद बोले-दयानिधि ! मुनिवर ! जिस उपाय से आध्यात्मिक आदि त्रिविध तापों से कष्ट न मिले ऐसा उपाय आप मुझको बतलाइये, मैं आपकी शरण में आया हूँ ॥२॥