भारतकोश
बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,008 पृष्ठ

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पृष्ठ 322

षट्चत्वारिंशोऽध्यायः ३०३ सनन्दन उवाच तदस्य त्रिविधं दुःखमिह जातस्य पंडित । गर्भे जन्मजराद्येषु स्थानेषु प्रभविष्यतः ॥३॥ निरस्तातिशयाह्लादसुखाभावैकलक्षणा । भेषजं भगवत्प्राप्तिरेका चात्यंतिकी मता ॥४॥ तस्मात्तत्प्राप्तये यत्नः कर्तव्यः पंडितैर्नरैः । तत्प्राप्तिहेतुज्ञानं च कर्म चोक्तं महामुने ॥५॥ आगमोत्थं विवेकाच्च द्विधा ज्ञानं तथोच्यते । शब्दब्रह्मागममयं परं ब्रह्म विवेकजम् ॥६॥ मनुरप्याह वेदार्थं स्मृत्वार्यं मुनिसत्तमः । तदेतच्छ्रूयतामत्र सुबोधं गदतो मम ॥७॥ द्वे ब्रह्मणी वेदितव्ये शब्दब्रह्म परं च यत् । शब्दब्रह्मणि निष्णातः परं ब्रह्माधिगच्छति ॥८॥ द्वे विद्ये वेदितव्ये चेत्याह चाथर्वणी श्रुतिः । परमा त्वक्षरप्राप्तिऋग्वेदादिमया परा ॥९॥ यत्तदव्यक्तमजरमनीयमजमव्ययम् । अनिर्देश्यमरूपं च पाणिपादादिसंयुतम् ॥१०॥ विभुं सर्वगतं नित्यं भूतयोनिमकारणम् । व्याप्यं व्याप्तं यतः सर्वं तं वै पश्यंति सुरयः ॥११॥ तद्ब्रह्म तत्परं धाम तद्धयेयं मोक्षकांक्षिभिः । श्रुतिवाक्योदितं सूक्ष्मं तद्विष्णोः परमं पदम् ॥१२॥ तदेव भगवद्वाच्यं स्वरूपं परमात्मनः । वाचको भगवच्छब्दस्तस्योद्दिष्टोऽक्षयात्मनः ॥१३॥ एवं निगदितार्थस्य यत्तत्त्वं तस्य तत्त्वतः । ज्ञायते येन तज्ज्ञानं परमन्यत्त्रयोमयम् ॥१४॥ अशब्दगोचरस्यापि तस्य वै ब्रह्मणो द्विज । पूजायां भगवच्छब्दः क्रियते ह्यौपचारिकः ॥१५॥ शुद्धे महाविभूत्याख्ये परे ब्रह्मणि वर्तते । भगवन्भगवच्छब्दः सर्वकारणकारणे । ज्ञेयं ज्ञातेति तथा भकारोऽर्थद्वयात्मकः । तेनागमयिता स्रष्टा गकारोऽथ तथा मुने ॥१६॥

सनन्दन ने कहा-पंडित ! जन्मजरादि के स्थान इस संसार में उत्पन्न जीव के साथ इन त्रिविध तापों का सम्बन्ध गर्भ में आने के साथ ही हो जाता है ॥३॥ इस त्रिविध ताप के शमन की एक मात्र ओषधि अत्यन्त सुख को तिरस्कृत करने वाली भाव-लक्षणा भगवत्प्राप्ति हो है ॥४॥ इसलिए पंडित मनुष्य उस भगवान् को पाने का प्रयत्न करें । महामुने ! उसको पाने का साधन भी ज्ञान और कर्म है ॥५॥ ज्ञान भी दो प्रकार का है, शास्त्राध्ययन द्वारा प्राप्त और विवेक द्वारा प्राप्त । शब्दब्रह्म अर्थात् वेद का ज्ञान शास्त्रज्ञान है और परब्रह्म परमात्मा का बोध विवेकजन्य ज्ञान है ॥६॥ मुनिश्रेष्ठ ! मनु ने भी वेदार्थ का स्मरण कर इसो बात का समर्थन किया है। यहाँ उस ज्ञान को कह रहा हूँ सुनो ॥७॥ दो प्रकार के ब्रह्म-शब्द ब्रह्म और परब्रह्म को जानना आवश्यक है। शब्द ब्रह्म का पूर्ण ज्ञान प्राप्त कर लेने वाला पर-ब्रह्म को प्राप्त कर लेता है ॥८॥ आथर्वणी श्रुति भी कहती है 'दो विद्याओं को अवश्य जानना चाहिए-परा और अपरा । परा अक्षर प्राप्ति को कहते हैं और अपरा ऋग्वेदादिमयो है ॥९॥ जो अव्यक्त, अजर, अनीह, अज, अव्यय, अनिर्देश्य, अरूप, पाणिपाद से युक्त, विभु, सर्वगत, नित्य, प्राणियों का उत्पादक, अकारण, और जिससे सारा जगत् व्याप्त है उस ब्रह्म का सुधीजन सर्वदा दर्शन करते हैं ॥१०-११॥ मोक्ष के इच्छुक जनों को उस ब्रह्म, परमधाम का ध्यान करना चाहिए। श्रुतियों ने उस विष्णु के सूक्ष्म परम पद का वर्णन किया है ॥१२॥ वही भगवान् नाम से प्रसिद्ध है, परमात्मा का वही स्वरूप है । उस अविनाशी का वाचक भगवान् शब्द है ॥१३॥ इस प्रकार जिसकी व्याख्या की गई है उसका जो सार है उसको जिस साधन से जानते हैं वही पर ज्ञान है और दूसरा त्रयो (वेदत्रयी) मय जो है वह अपर ज्ञान (आगममय) है ॥१४॥ द्विज ! यद्यपि वह ब्रह्म किसी शब्द या वाणी का गोचर नहीं है परन्तु उसकी पूजा के लिए भगवान् शब्द औपचारिक (आरोपित) प्रयोग है अन्यथा उसका स्मरण या पूजा कैसे संभव होती ॥१५॥ भगवन् ! शुद्ध, सर्वकारणकारण, महाविभूति परब्रह्म के लिए भगवान् शब्द का प्रयोग किया जाता है । मुने ! भकार के दो अर्थ हैं-ज्ञेय और ज्ञाता ।