बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)
Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें३०४ नारदीयपुराणम् ऐश्वर्यस्य समग्रस्य वीर्यस्य यशसः श्रियः । ज्ञानवैराग्ययोश्चैव षण्णां भग इतीरणा ॥१७॥ वसन्ति तत्र भूतानि भूतात्मन्यखिलात्मनि । सर्वभूतेष्वशेषेषु वकारार्थस्ततोऽव्ययः ॥१८॥ एवमेव महाशब्दो भगवानिति सत्तम । परमब्रह्मभूतस्य वासुदेवस्य नान्यगः ॥१९॥ तत्र पूज्यपदार्थोक्तिः परिभाषासमन्वितः । शब्दोऽयं नोपचारेण चान्यत्र ह्युपचारतः ॥२०॥ उत्पत्तिं प्रलयं चैव भूतानामगतिं गतिम् । वेत्ति विद्यामविद्यां च स वाच्यो भगवानिति ॥२१॥ ज्ञानशक्तिबलैश्वर्यवीर्यतेजांस्यशेषतः । भगवच्छब्दवाच्यानि विना हेयैर्गुणादिभिः ॥२२॥ सर्वाणि तत्र भूतानि वसन्ति परमात्मनि । भूतेषु वसनादेव वासुदेवस्ततः स्मृतः ॥२३॥ खांडिक्यं जनकं प्राह पृष्टः केशिध्वजः पुरा । नामव्याख्यामनंतस्य वासुदेवस्य तत्त्वतः ॥२४॥ भूतेषु वसते सोऽन्तर्वसंस्त्यत्र च तानि यत् । धाता विधाता जगतां वासुदेवस्ततः प्रभुः ॥२५॥ स सर्वभूतप्रकृतिं विकारं गुणादिदोषांश्च मुने ह्यतीतः । अतीतसर्वावरणोऽखिलात्मा तेनास्तृतं यद्भुवनांतरालम् ॥२६॥ समस्तकल्याणगुणं गुणात्मको हित्वातिदुःखावृतभूतसर्गः । इच्छागृहीताभिमतोरुदेहः संसाधितशेषजगद्धितोऽसौ ॥२७॥ तेजोबलैश्वर्यमहावबोधं स्ववीर्यशक्त्यादिगुणैकराशिः । परः पराणां सकला न यत्र क्लेशादयः संति परावरेशे ॥२८॥
गकार के तीन अर्थ हैं—गमयिता (प्रेरक), नेता (संचालक) तथा स्रष्टा । भ और ग के योग से भग शब्द बनता है, जिसका अर्थ इस प्रकार है सम्पूर्ण ऐश्वर्य, वीर्य, यश, श्री, वैराग्य, ज्ञान इन छह अर्थों में भग शब्द का प्रयोग कहा गया है ॥१६-१७॥ उस अखिलात्मा और भूतात्मा में सब भूत (पदार्थ) रहते हैं और वह अशेष पदार्थों में रहता है। वकार का अर्थ अव्यय है ॥१८॥ महात्मन् ! भगवान् इस महाशब्द का ऐसा ही अर्थ है। परम ब्रह्मभूत वासुदेव का द्योतक और शब्द नहीं है ॥१९॥ पूज्य पद का जो अर्थ है, उसको सूचित करने की परिभाषा से युक्त यह भगवत् शब्द परमात्मा के लिए तो प्रधान रूप से प्रयुक्त होता है और दूसरों के लिए गौण रूप से। जो उत्पत्ति, प्रलय, भूतों की गति-अगति और विद्या-अविद्या को जानता है उसको ही भगवान् कहा जाता है ॥२१॥ ज्ञानशक्ति, बल, ऐश्वर्य, वीर्य और अशेष तेज ये भगवत् शब्द के अर्थ हैं। बिना इन गुणों के भगवत् शब्द का प्रयोग कैसे किया जा सकता है ॥२२॥ उस परमात्मा में सब भूत निवास करते हैं और वह समस्त भूतों में वास करता है, इसलिए उसको वासुदेव कहा जाता है ॥२३॥ पहले खाण्डिक्य जनक के पूछने पर केशि- ध्वज ने उनसे इसी वासुदेव के नाम-माहात्म्य को तत्त्वतः कहा था ॥२४॥ वह सब भूतों में रहता है और सारे पदार्थ उसमें रहते हैं। वह संसार का धाता और विधाता है, अतः उसको प्रभु वासुदेव कहते हैं ॥२५॥ मुने ! वह सब भूतों की प्रकृति, विकृति और गुण आदि के दोषों से परे है। वह अखिलांतरात्मा सब आवरणों से मुक्त है। उससे सम्पूर्ण भुवन-मण्डल व्याप्त है ॥२६॥ सम्पूर्ण कल्याणमय गुण उसके स्वरूप हैं। उन्होंने अपनी शक्ति के लेशमात्र से सम्पूर्ण भूतसमुदाय को व्याप्त कर रखा है। वे अपनी इच्छा मात्र से मन के अनुकूल अनेक शरीर धारण करते रहते हैं और सारे जगत् का हित साधन करते रहते हैं ॥२७॥ तेज, बल, ऐश्वर्य, महाज्ञान, वीर्य, शक्ति और सब गुणों की वह एक राशि है। वे प्रकृति आदि से भी परे हैं और उन समस्त कार्यकारणों के स्वामी परमेश्वर में किसी प्रकार का क्लेश नहीं है ॥२८॥