भारतकोश
बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,008 पृष्ठ

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षट्चत्वारिंशोऽध्यायः ३०५ स ईश्वरो व्यष्टिसमष्टिरूपोऽव्यक्तस्वरूपः प्रकटस्वरूपः । सर्वेश्वरः सर्वंनिसर्गवेत्ता समस्तशक्तिः परमेश्वराख्यः ॥२९॥ स ज्ञायते येन तदस्तदोषं शुद्धं परं निर्मलमेव रूपम् । संदृश्यते चाप्यवगम्यते च तज्ज्ञानमज्ञानमतोऽन्यदुक्तम् ॥३०॥ स्वाध्यायसंयमाभ्यां स दृश्यते पुरुषोत्तमः । तत्प्राप्तिकारणं ब्रह्म तदेतत्प्रतिपद्यते ॥३१॥ स्वाध्यायाद्योगमासीत योगात्स्वाध्यायमामनेत् । स्वाध्याययोगसंपत्त्या परमात्मा प्रकाशते ॥३२॥ तदीक्षणाय स्वध्यायश्चक्षुर्योगस्तथापरम् । न मांसचक्षुषा द्रष्टुं ब्रह्मभूतः स शक्यते ॥३३॥ नारद उवाच भगवंस्तमहं योगं ज्ञातुमिच्छामि तं वद । ज्ञाते यन्नाखिलाधारं पश्येयं परमेश्वरम् ॥३४॥ सनंदन उवाच केशिध्वजो यथा प्राह खांडिक्याय महात्मने । जनकाय पुरा योगं तथाहं कथयामि ते ॥३५॥ नारद उवाच खांडिक्यः कोऽभवद्ब्रह्मन्को वा केशिध्वजोऽभवत् । कथं तयोश्च संवादो योगसंबन्धवानभूत् ॥३६॥ सनंदन उवाच धर्मध्वजो वै जनकस्तस्य पुत्रोऽमितध्वजः । कृतध्वजोऽस्य भ्राताभूत्सवाध्यात्मरतिर्नृपः ॥३७॥ कृतध्वजस्य पुत्रोऽभूद्धन्यः केशिध्वजो द्विजः । पुत्रोऽमितध्वजस्यापि खांडिक्यजनकाभिधः ॥३८॥ जो ईश्वर व्यष्टि और समष्टि स्वरूप, अव्यक्त और व्यक्त स्वरूप, सर्वेश्वर, सर्वप्रकृतिज्ञाता, समस्त शक्ति से युक्त परमेश्वर है ॥२९॥ उसको जैसे जाना जाता है और उसके निर्दोष, शुद्ध, पर, निर्मल रूप को जिसके द्वारा जाना जाता है या देखा जाता है उसको ज्ञान और उससे अतिरिक्त को अज्ञान कहते हैं ॥३०॥ वह पुरुषोत्तम स्वाध्याय और संयम के द्वारा प्राप्त होता है। उसकी प्राप्ति का कारण जो ब्रह्म (शब्द ब्रह्म) है उसका प्रतिपादन किया जा रहा है ॥३१॥ स्वाध्याय से योग को संयुक्त करे और योग से स्वाध्याय को। इस प्रकार स्वाध्याय और योग की सम्मिलित शक्ति से परमात्मा का प्रत्यक्ष दर्शन होता है ॥३२॥ उसके दर्शन के लिए स्वाध्याय और योग ही नेत्र हैं। इन स्थूल नेत्रों से वह ब्रह्मभूत पुरुषोत्तम देखा नहीं जा सकता ॥३३॥ नारद बोले- भगवन् ! जिसके जान लेने पर मैं सर्वाधार परमेश्वर का दर्शन कर सकूँ, उस योग को जानना चाहता हूँ। कृपा करके उसका वर्णन कीजिए ॥३४॥ सनन्दन ने कहा- प्राचीन काल में केशिध्वज ने महात्मा खांडिक्य जनक से इस योग के विषय में जो कुछ कहा था उसी को यहाँ कह रहा हूँ ॥३५॥ नारद बोले- ब्रह्मन् ! खांडिक्य कौन थे, केशिध्वज का परिचय क्या है, किस प्रकार उन दोनों में योग संबंधी वार्ता हुई- इसको कहिए ॥३६॥ सनन्दन ने कहा- जनक धर्मध्वज नामक एक राजा था। उसके पुत्र का नाम अमितध्वज था। उस अमित ध्वज का भ्राता कृतध्वज था, जो सदा अध्यात्म-चिन्तन में ही लगा रहता था। कृतध्वज का यशस्वी पुत्र केशिध्वज हुआ ! अमितध्वज का भी खांडिक्य जनक नामक पुत्र था। खांडिक्य को राजा केशिध्वज ने सिंहासन से उतार ३६ ना० पु०