भारतकोश
बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,008 पृष्ठ

पृष्ठ 337, कुल 1008 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 337

यहाँ पृष्ठ का संपूर्ण पाठ पंक्ति-दर-पंक्ति दिया गया है:

३१८ | नारदीयपुराणम् स राजा प्राप्तराज्यस्तु पितृपैतामहं क्रमात् । पालयामास धर्मेण पितृवद्रञ्जयन् प्रजाः ॥६॥ ईजे च विविधैर्यज्ञैर्भगवन्तमधोक्षजम् । सर्वदेवात्मकं ध्यायन्नानाकर्मसु तन्मतिः ॥७॥ ततः समुत्पाद्य सुतान्विरक्तो विषयेषु सः । मुक्त्वा राज्यं ययौ विद्वान्पुलस्त्यपुलहाश्रमम् ॥८॥ शालग्रामं महाक्षेत्रं मुमुक्षुजनसेवितम् । तत्रासौ तापसो भूत्वा विष्णोराराधनं मुने ॥६॥ चकार भक्तिभावेन यथालब्धसपर्यया । नित्यं प्रातः समाप्लुत्य निर्मलेऽम्भसि नारद ॥१०॥ उपतिष्ठेद्रविं भक्त्या गृणन्ब्रह्माक्षरं परम् । अथाश्रमे समागत्य वासुदेवं जगत्पतिम् ॥११॥ समाहृतैः स्वयं द्रव्यैः समित्कुशमृदादिभिः । फलैः पुष्पैस्तथा पत्रैस्तुलस्याः स्वच्छवारिभिः ॥१२॥ पूजयत्प्रयतो भूत्वा भक्तिप्रसरसंप्लुतः । स चैकदा महाभागः स्नात्वा प्रातः समाहितः ॥१३॥ चक्रनद्यां जपंस्तस्थौ मुहूर्तत्रयमंबुनि । अथाजगाम तत्तीरं जलं पातुं विपासिता ॥१४॥ आसन्नप्रसवा भ्रान्त्वैकैव हरिणी वनात् । ततः समभवत्तत्र पीतप्राये जले तया ॥१५॥ सिंहस्य नादः सुमहान् सर्वप्राणिभयंकरः । ततः सा सिंहसन्नादादुत्प्लुता निम्नगातटम् ॥१६॥ अत्युच्चारोहणेनास्या नद्यां गर्भः पपात ह । तमुह्यमानं वेगेन वीचिमालापरिलुतम् ॥१७॥ जग्राह भरतो गर्भोत्पतितं मृगपोतकम् । गर्भप्रच्युतिदुःखेन प्रोत्तुङ्गाक्रमणेन च ॥१८॥ मुनीन्द्र सा तु हरिणी निपपात ममार च । हरिणीं तां विलोक्याथ विपन्नां नृपतापसः ॥१६॥ मृगपोतं समागृह्य स्वमाश्रममुपागतः । चकारानुदिनं चासौ मृगपोतस्य वै नृपः ॥२०॥


से यह देश भारतखण्ड कहलाता है ॥५॥ उस राजा ने कुल-परम्परा से राज्य को प्राप्त कर धर्मपूर्वक अपने पूर्वजों की भांति प्रजा का पालन किया और प्रजा को सन्तुष्ट रखा ॥६॥ अपने शासन-काल में उसने विविध यज्ञों से इन्द्रियातीत भगवान् विष्णु की पूजा की। सर्वदा सब देवों के आत्मा भगवान् का ध्यान करते हुए उसने भिन्न कर्मों को किया ॥७॥ तदनन्तर वह पुत्रों को उत्पन्न कर विषयों से विरक्त हो अपने राज्य को त्याग कर वह विद्वान् पुलस्त्य और पुलह ऋषि के आश्रम में गया ॥८॥ वहाँ शालग्राम नामक एक महाक्षेत्र था जहाँ अन्य मुमुक्षुजन भी योग-साधना किया करते थे। मुने ! वहाँ तपस्वी बन कर यथा प्राप्त सामग्री से भक्ति-पूर्वक उसने विष्णु की आराधना प्रारम्भ की ॥९॥ नारद ! नित्यप्रति वह जल में डुबकी लगाकर स्नान करता तथा भक्ति- पूर्वक ब्रह्म नाम का उच्चारण करता हुआ सूर्योपस्थान करता था ॥१०॥ इसके अनन्तर आश्रम में आकर स्वयं लाई हुई समिधा, कुश, मृत्तिका, फल, पुष्प, तुलसी पत्र और स्वच्छ जल से भक्ति-भावना में तन्मय होकर एकाग्र भाव से जगत्पति वासुदेव की पूजा करता था ॥११-१२॥ एक दिन जब उस महाभाग ने प्रातःकाल चक्र नदी के जल में स्नान किया और उस जल में ही एकनिष्ठ होकर तीन मुहूर्त तक भगवान् का जप किया ॥१३॥ उसी समय उस नदी के तट पर एक प्यासी हुई आसन्नप्रसवा हरिणी वन से आई । जब वह जल पी चुकी तो उसी समय सब प्राणियों को डराने वाला सिंहनाद सुनाई पड़ा ॥१४-१५॥ सिंह की गर्जना सुनकर वह नदी तट उसके पार जाने के लिए उछली। अधिक ऊँचाई से कूदने के कारण उसका गर्भ नदी में ही गिर पड़ा ॥१६॥ गर्भ से गिरा हुआ वह मृगशावक नदी की धारा में पड़कर वेग से बह चला। मुनि भरत ने उसको उठा लिया ॥१७॥ मुनीन्द्र ! गर्भपात की पीड़ा और ऊँचो भूमि पर छलांग मारने के कारण वह हरिणी गिर पड़ी और मर गई ॥१८॥ नृप तपस्वी वह भरत हरिणी को इस प्रकार मरते देखकर उस मृगशावक को लेकर आश्रम में चला आया ॥१९॥ वह राजा प्रति दिन उस मृग की देखभाल करता था। मुने ! इस प्रकार राजा द्वारा