बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)
Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंअष्टचत्वारिंशोऽध्यायः ३१७ एतत्ते कथितं सर्वं यन्मां त्वं परिपृष्टवान् । तापत्रयचिकित्सार्थं किमन्यत्कथयामि ते ॥८२॥ इति श्रीबृहन्नारदीयपुराणे पूर्वभागे द्वितीयपादे सप्तचत्वारिंशोऽध्यायः ॥४७॥ अथाष्टचत्वारिंशोऽध्यायः नारद उवाच श्रुतं मया महाभाग तापत्रयचिकित्सितम् । तथापि मे मनो भ्रांतं नैव स्थितिं लभतेऽञ्जसा ॥१॥ आत्मन्यतिक्रमं ब्रह्मन्दुर्जनाचरितं कथम् । सोढुं शक्येत मनुजैस्तन्ममाख्याहि मानद ॥२॥ सूत उवाच तच्छ्रुत्वा नारदेनोक्तं ब्रह्मपुत्रः सनंदनः । उवाच हर्षसंयुक्तः स्मरन्भरतचेष्टितम् ॥३॥ सनंदन उवाच अत्र ते कथयिष्यामि इतिहास पुरातनम् । यं श्रुत्वा त्वन्मनो भ्रांतमास्थानं लभते भृशम् ॥४॥ आसीत्पुरा मुनिश्रेष्ठ भरतो नाम भूपतिः । आर्षभो यस्य नाम्नेदं भारतं खण्डमुच्यते ॥५॥ को नष्ट करने वाली सिद्धिमती भूमिका प्राप्त की । इस प्रकार त्रिताप को नष्ट करने वाली योग विद्या के लिए तुमने जो उपाय पूछा था, वह सब मैंने बता दिया । अब और क्या कहूँ ॥८१-८२॥ श्रीनारदीयमहापुराण के पूर्वभाग में संतालीसवां अध्याय समाप्त ॥४७॥ अध्याय ४८ ज्ञान-चर्चा-प्रसंग में राजा भरत का उपाख्यान नारद बोले- महाभाग ! त्रिताप को दूर करने वाले योग-रहस्य को तो सुना फिर भी मेरा मन भ्रम में ही पड़ा हुआ है, किसी प्रकार पूर्णरूप से शान्ति नहीं मिल रही है ॥१॥ ब्रह्मन् ! मानद ! अब यह बताने का कष्ट करें कि दुष्टों के विपरीत आचरण को मनुष्य किस प्रकार सह सकता है ॥२॥ सूत बोले-नारद के प्रश्न को सुनकर ब्रह्म-पुत्र सनन्दन प्रसन्न होकर राजा भरत के चरित्र का स्मरण करते हुए बोले ॥३॥ इस विषय में तुमको एक प्राचीन इतिहास सुना रहा हूँ जिसको सुनकर तुम्हारा भ्रान्त मन भली-भाँति शान्ति प्राप्त करेगा ॥४॥ मुनिश्रेष्ठ ! प्राचीन काल में ऋषभ-पुत्र भरत नाम का एक राजा था, जिसके नाम