बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)
Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)
पृष्ठ 335, कुल 1008 में से
संदर्भ में पढ़ें३१६ नारदीयपुराणम् अत्रज्ञकरणीज्ञानं करणं तेन तस्य तत् । निष्पाद्य मुक्तिकार्यं वै कृतकृत्यो निवर्तते ॥६६॥ तद्भावभावनापन्नस्ततोऽसौ परमात्मनः । भवत्यभेदी भेदश्च तस्याज्ञानकृतो भवेत् ॥७०॥ विभेदजनके ज्ञाने नाशमात्यन्तिकं गते । आत्मनो ब्रह्मणोभेदं संमलं कः करिष्यति ॥७१॥ इत्युक्तस्ते मया योगः खांडिक्यं परिपृच्छतः । संक्षेपविस्तराभ्यां तु किमद्यक्रियतां तव ॥७२॥ खांडिक्य उवाच कथितो योगसद्भावः सर्वमेव कृतं मम । तवोपदेशात्सकलो नष्टश्चित्तमलो मम ॥७३॥ ममेति यन्मया प्रोक्तमसदेतन्न चान्यथा । नरेंद्र गदितुं शक्यमपि विज्ञेयवेदिभिः ॥७४॥ अहं ममेत्यविद्येयं व्यवहारस्थानयोः । परमार्थस्त्वसंलाध्यो वचसां गोचरो न यः ॥७५॥ तद्गच्छ श्रेयसे सर्वं ममैतद्भवता कृतम् । यद्विमुक्तिपरो योगः प्रोक्तः केशिध्वजान्ययः ॥७६॥ सनन्दन उवाच यथार्हपूजया तेन खांडिक्येन स पूजितः । आजगाम पुरं ब्रह्मंस्ततः केशिध्वजो नृप ॥७७॥ खांडिक्योऽपि सुतं कृत्वा राजानं योगसिद्धये । विशालागमत्कृष्णे समावेशितमानसः ॥७८॥ स तत्रैकांतिको भूत्वा यमादिगुणसंयुतः । विष्ण्वाख्ये निर्मले ब्रह्मण्यवाप नृपतिर्लयम् ॥७९॥ केशिध्वजोऽपि मुक्त्यर्थं स्वकर्मक्षपणोन्मुखः । बुभुजे विषयान्कर्म चक्र चानभिसंधितम् ॥८०॥ स कल्याणोपभोगैश्च क्षीणपापोऽमलस्ततः । अवाप सिद्धिमत्यंतंत्रितापक्षवणीं मुने ॥८१॥
करण है; अतः उस ज्ञान रूपी करण के द्वारा वह योगी मुक्ति रूप कार्य सिद्ध करके कृतकृत्य होकर सर्वश्रेष्ठ हो जाता है ॥६८-६९॥ भगवान् के रूप ध्यान में तन्मय होकर वह उससे अभिन्न (तद्रूप) हो जाता है ! उससे अपने को भिन्न समझना तो अज्ञान है ॥७०॥ विभेदमूलक ज्ञान के आत्यन्तिक नाश हो जाने पर आत्मा और ब्रह्म का भेद रह ही नहीं जाता है, इसका समर्थन कौन कर सकता है ॥७१॥ खाण्डिक्य ! तुम्हारे प्रश्न के अनुसार मैंने इस प्रकार कहीं पर तो संक्षेप में और कहीं विस्तार के साथ योग का वर्णन कर दिया । अब तुम्हारा कौन सा प्रिय कार्य है, जिसको करूँ ॥७२॥ खाण्डिक्य ने कहा-तुमने मेरे ऊपर अनुग्रह करके सम्पूर्ण योग का वर्णन कर दिया और तुम्हारे उप- देश से मेरे मन का सब मल नष्ट हो गया ॥७३॥ मैंने जो 'यह मेरा है' ऐसा समझ रखा था, वह असद्ज्ञान था, इसमें सन्देह का कुछ भी अवसर नहीं । ज्ञेय तत्त्व को जानने वाले व्यक्ति ही इस विषय को कह सकते हैं ॥७४॥ मैं और मेरा का व्यवहार अविद्या (अज्ञान) है । इसका परमार्थ तत्त्व अनिर्वचनीय और वाणी से परे है। केशिध्वज जी, अब तुम जा सकते हो, जो कुछ तुमने उपदेश दिया और जो कुछ मुक्ति-विषयक योग को बतलाया वह मेरे कल्याण के लिए पर्याप्त है ॥७५-७६॥ सनन्दन बोले-ब्रह्मन् ! खांडिक्य से केशिध्वज यथायोग्य पूजा पाकर अपनी राजधानी में चला आया ॥७७॥ खांडिक्य भी अपने पुत्र को राज्य देकर अपने मन में कृष्ण का ध्यान करता हुआ विशाला नगरी में आया ॥७८॥ वहां वह यम-नियमादि का पालन करता हुआ एकान्त भाव से निर्मल परब्रह्म विष्णु में लीन हो गया ॥७९॥ केशिध्वज भी अपने कर्मों को नष्ट कर मुक्ति पाने के अभिप्राय से राजकीय विषयों का उपभोग करता हुआ अनासक्त भाव से कर्म करता रहा ॥८०॥ मुने ! उसने शुभ भोगों के द्वारा अपने पापों को नष्ट कर त्रिताप