बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)
Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)
पृष्ठ 334, कुल 1008 में से
संदर्भ में पढ़ेंमूर्त्तं भगवतो रूपं सर्वापाश्रयनिस्पृहः । एषा वै धारणा ज्ञेया यच्चित्तं तत्र धार्यते ॥५४॥ तत्र मूर्त्तं हरे रूपं यादृक् चिंत्यं नराधिप । तच्छ्रूय तामनाधारे धारणा नोपपद्यते ॥५५॥ प्रसन्नचारुवदनं पद्मपत्रायतेक्षणम् । सुकपोलं सुविस्तीर्णं ललाटफलकोज्ज्वलम् ॥५६॥ समकर्णां सविन्यस्तचारुकर्णोपभूषणम् । कम्बुग्रीवं सुविस्तीर्णश्रीवत्सांकितवक्षसम् ॥५७॥ वलित्रिभङ्गिना भुग्ननाभिना चोदरेण वै । प्रलंबाष्टभुजं विष्णुमथवापि चतुर्भुजम् ॥५८॥ समस्थितोरुजघनं सुस्थिरांत्रिकरंबुजम् । चिंतयेद्ब्रह्मभूतं तं पीतनिर्मलवाससम् ॥५९॥ किरीटचारुकेयूरकटकादिविभूषितम् । शार्ङ्गशंखगदाखड्गप्रकाशवलयांचितम् ॥६०॥ चिंतयेत्तन्मयो योगी समाधायात्ममानसम् । तावद्यावद् दृढीभूता तत्रैव नृपधारणा ॥६१॥ वदतस्तिष्ठतो यद्वा स्वेच्छया कर्म कुर्वतः । नापयाति यदा चित्तात्सिद्धां मन्येत तां तदा ॥६२॥ ततः शंखगदाचक्रशार्ङ्गादि रहितं बुधः । चिंतयेद्भगवद्रूपं प्रशांतं साक्षसूत्रकम् ॥६३॥ सा यदा धारणा तद्वदवस्थानवती ततः । किरीटकेयूरमुखैर्भूषणैरहितं स्मरेत् ॥६४॥ तदेकावयवं चैवं चेतसा हि पुनर्बुधः । कुर्यात्ततोऽवयविनि प्रणिधानपरो भवेत् ॥६५॥ तद्रूपप्रत्यये चैकसंमतिश्चान्यनिःस्पृहा । तद्ध्यानं प्रथमैरंगैः षड्भिर्निष्पाद्यते नृप ॥६६॥ तस्यैव कल्पनाहीनं स्वरूपग्रहणं हि यत् । मनसा ध्याननिष्पाद्यं समाधिः सोऽभिधीयते ॥६७॥ विज्ञानं प्रापकं प्राप्ये परे ब्रह्मणि पार्थिव । प्रोपणीयस्तथैवात्मा प्रक्षीणाशेषभावनः ॥६८॥
निस्पृह होकर ध्यान करना चाहिए । यही धारणा कही जाती है, जहां चित्त को एकाग्र किया जाता है अथवा जहाँ चित्त को एक आधार प्राप्त होता है ॥५४॥ नराधिप ! भगवान् के मूर्त्त रूपों में भी जिस रूप का चिन्तन करना चाहिए उसको भी सुनो; क्योंकि अनाधार में ध्यान-धारणा नहीं हो सकती ॥५५॥ प्रसन्न, शुभ मुख और कमल पत्र के समान बड़ी आँखों वाले, सुन्दर कपोल, देदीप्यमान विशाल ललाट से सुशोभित, मनोहर कर्णाभरण से आभूषित कर्ण वाले, कम्बुग्रीव, चौड़े, श्रीवत्स से चिह्नित वक्षःस्थल और त्रिवली से मुक्त, वृत्ताकार गहरी नाभि और चढ़ाव-उतार वाले उदर से युक्त और प्रलम्बबाहु-चतुर्भुज विष्णु का अथवा ऊरु और जंघे को स्थिरता के साथ आसनबद्ध करके घुटने पर अपने कर कमल को रखे हुए, पीले, निर्मल वस्त्र से सुशोभित योगि-रूप में स्थित, किरीट, केयूर और वलय से सुशोभित, शार्ङ्ग, शंख, गदा और प्रभा-वलय से मंडित ब्रह्म का तन्मय होकर योगी अपने मन को वश में करके चिन्तन करे ॥५६-६०$\frac{१}{२}$॥ इस क्रम को तब तक जारी रखे जब तक कि उसमें दृढ़ धारणा न हो जाय ॥६१॥ ठहरने, बोलने अथवा स्वेच्छापूर्वक काम करने के समय भी यदि मन से वह रूप लुप्त न हो तो धारणा को सिद्ध समझना चाहिए ॥६२॥ इस अवस्था को प्राप्त कर लेने के उपरान्त धीमान् योगी शंख, चक्र, गदा और शार्ङ्ग से रहित केवल अक्ष सूत्र से युक्त भगवान् के रूप का ध्यान करे ॥६३॥ ऐसी धारणा भी जब पूर्ववत् स्थिर हो जाय तब किरीट, केयूर आदि आभरणों से शून्य रूप का ध्यान करे ॥६४॥ जब इस प्रकार की धारणा स्थिर हो जाय तब वह ज्ञानी योगी उनके किसी एक अवयव का ही ध्यान करे । फिर वह उपासनापरायण होकर अवयवी का ध्यान करे ॥६५॥ उनके रूप का एकान्त ध्यान करने पर और उस पर दृढ़ विश्वास हो जाने पर अन्य विषयों की ओर स्पृहा नहीं रह जाती । नृप ! सज्जन इस प्रकार ध्यान यम- नियमादि छह अंगों से निष्पन्न होता है । उसी प्रभु के जब अवयव की कल्पना से रहित रूप का मन के द्वारा ध्यान किया जाता है तब उस ध्यान को समाधि कहा जाता है ॥६६-६७॥ विज्ञान उस प्राप्त करने योग्य पर ब्रह्म को प्राप्त कराने वाला है, तथा अशेष भावनाओं से रहित आत्मा प्राप्त करने वाला है । क्षेत्रज्ञ कर्ता है और ज्ञान