भारतकोश
बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,008 पृष्ठ

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३१४ नारदीयपुराणम् संसारतापानखिलानवाप्नोत्यनुसंजितान् । तया तिरोहितत्वात्तु शक्तिः क्षेत्रज्ञसंज्ञिता ॥३९॥ सर्वभूतेषु भूपाल तारतम्येन लक्ष्यते । अप्राणवत्सु खल्वल्पा स्थावरेषु ततोऽधिका ॥४०॥ सरीसृपेषु तेभ्योऽप्याप्यतिशक्त्या पतत्त्रिषु । पतत्त्रिभ्यो मृगास्तेभ्यः स्वशक्त्या पशवोऽधिकाः ॥४१॥ पशुभ्यो मनुजाश्चातिशक्त्या पुंसः प्रभाविताः । तेभ्योऽपि नागगन्धर्वयक्षाद्या देवता नृप ॥४२॥ शक्रः समस्तदेवेभ्यस्ततश्चातिप्रजापतिः । हिरण्यगर्भोऽपि ततः पुंसः शक्त्युपलक्षितः ॥४३॥ एतान्यशेषरूपाणि तस्य रूपाणि पार्थिव । यतस्तच्छक्तियोगेन युक्तानि नभसा यथा ॥४४॥ द्वितीयं विष्णुसंज्ञस्य योगिध्येयं महामते । अमूर्तं ब्रह्मणो रूपं यत्सन्नित्युच्यते बुधैः ॥४५॥ समस्ताः शक्तयश्चैता नृप यत्र प्रतिष्ठिताः । नहि स्वरूपरूपं वै रूपमन्यद्धरेर्महत् ॥४६॥ समस्तशक्तिरूपाणि तत्करोति जनेश्वर । देवतिर्यङ्मनुष्यादिचेष्टावंति स्वलीलया ॥४७॥ जगतामुपकाराय तस्य कर्मनिमित्तजा । चेष्टा तस्याप्रमेयस्य व्यापिन्यविहतात्मिका ॥४८॥ तद्रूपं विश्वरूपस्य चिंत्यं योगयुजा नृप । तस्य ह्यात्मविशुद्धयर्थं सर्वकिल्बिषनाशनम् ॥४९॥ यथाग्निरुद्धतशिखः कक्षं दहति सानिलः । तथा चित्तस्थितो विष्णुर्योगिनां सर्वकिल्बिषम् ॥५०॥ तस्मात्समस्तशक्तीनामाद्यांते तत्र चेतः । कुर्वीत संस्थितं साधु विज्ञेया शुद्धलक्षणा ॥५१॥ शुभाश्रयः सचित्तस्य सर्वगस्य तथात्मनः । त्रिभावभावनातीतो मुक्तये योगिनां नृप ॥५२॥ अन्ये तु पुरुषव्याघ्र चेतसो ये व्यपाश्रयाः । अशुद्धास्ते समस्तास्तु देवाद्याः कर्मयोनयः ॥५३॥ है। भूपाल ! उस अविद्या शक्ति से तिरोहित होने के कारण यह शक्ति सब प्राणियों में तारतम्य से देखी जाती है ॥३८-३९३॥ प्राणशून्य पदार्थों में यह अत्यन्त स्वल्प रहती, परन्तु स्थावरों में उससे कुछ अधिक रहती है ॥४०॥ रेंगकर चलने वाले जीवों में कुछ और अधिक और उनसे अधिक पक्षियों में रहती है । पक्षियों की अपेक्षा मृगों में वह शक्ति अधिक मात्रा में पाई जाती है । मृगों की अपेक्षा पशुओं में अधिक और पशुओं से अधिक मनुष्यों में वह शक्ति देखी जाती है । नृप ! मनुष्यों से भी अधिक नाग, गन्धर्व, यक्ष, देवता आदि में उस शक्ति की अधिकता है ॥४१-४२॥ सब देवों से अधिक इन्द्र में उस शक्ति को देखते हैं । शक्र से अधिक प्रजापति शक्तिशाली और प्रजापति की अपेक्षा हिरण्यगर्भ पुरुष में वह शक्ति अधिक पाई जाती है ॥४३॥ पार्थिव ! उस पुरुष शक्ति के ये ही सम्पूर्ण रूप हैं । जिस प्रकार आकाश से सारे पदार्थ ढके हुए हैं, उसी प्रकार सारे पदार्थ उससे युक्त हैं ॥४४॥ महामति ! दूसरा योगिध्येय परब्रह्म विष्णु का अमूर्त रूप है, जिसको बुधजन सत् कहते हैं ॥४५॥ जिसमें ये समस्त शक्तियां एकत्र हैं वह भगवान् हरि का दूसरा स्वरूप रूप या महत् रूप नहीं है ॥४६॥ जनेश्वर ! सब शक्तियों को वही सत् रूप संचालित या प्रकट करता है । वही देव, तिर्यक् और मनुष्यों को अपनी लीला से क्रियाशील बनाता है ॥४७॥ संसार के कल्याण के लिए उस अप्रमेय सत् की कर्म- निमित्तजा शक्ति सर्वत्र व्यापक और गतिशील रहती है ॥४८॥ नृप ! योगी जन आत्म-शुद्धि और सब पापों को नष्ट करने के लिए उस विश्व के इस रूप का ही चिन्तन करें ॥४९॥ जिस प्रकार अग्नि की चंचल लपटें वायु के सहयोग से अत्यन्त तीव्र होकर समीप के कक्ष को जला देती हैं उसी प्रकार योगी के हृदय में स्थित विष्णु उसके सब कलुष को भस्म कर देते हैं ॥५०॥ अतएव साधु अपने चित्त को समस्त शक्तियों के आधारभूत उस भगवान् में लगा दे, यही शुद्ध लक्षणा (भावना) है ॥५१॥ नृप ! आत्मा, चंचल चित्त का त्रिभाव भावना से रहित जो शुभाश्रय है वही योगी की मुक्ति का कारण बनता है ॥५२॥ पुरुषव्याघ्र ! चित्त के अन्य जो आश्रय (आधार) हैं वे अशुद्ध हैं और वे हैं देवता आदि जो कर्मयोनि हैं ॥५३॥ भगवान् के मूर्त रूप का सब आश्रयों की ओर से