भारतकोश
बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)

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पृष्ठ 332

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सप्तचत्वारिंशोऽध्यायः ३१३ केशिध्वज उवाच आश्रयश्चेतसो ज्ञानिन् द्विधा तच्च स्वरूपतः । रूपं मूर्तममूर्तं च परं चापरमेव च ॥२३॥ त्रिविधा भावना रूपं विश्वमेतत्रिधोच्यते । ब्रह्माख्या कर्मसंज्ञा च तथा चैवोभयात्मिका ॥२४॥ कर्मभावात्मिका ह्येका ब्रह्मभावात्मिकापरा । उभयात्मिका तथैवान्या त्रिविधा भावभावना ॥२५॥ सनकाद्या सदा ज्ञानिन् ब्रह्मभावनया युताः । कर्मभावनया चान्ये देवादद्याः स्थावराश्चराः ॥२६॥ हिरण्यगर्भादिषु च ब्रह्मकर्मात्मिका द्विधा । अधिकारबोधयुक्तेषु विद्यते भावभावना ॥२७॥ अक्षीणेपु समस्तेषु विशेषज्ञानकर्मसु । विश्वमेतत्परं चान्यद्भेदभिन्नदृशां नृपः ॥२८॥ प्रत्यस्तमितभेदं यत्सत्तामात्रमगोचरम् । वचसामात्मसंवेद्यं तज्ज्ञानं ब्रह्मसंज्ञितम् ॥२९॥ तच्च विष्णोः परं रूपमरूपस्याजनस्थ च। विश्वस्वरूपवैरूप्यलक्षणं परमात्मनः ॥३०॥ न तद्योगयुजा शक्यं नृप चिन्तयितुं यतः । ततः स्थूलं हरे रूपं चिंत्यं यच्चक्षुगोचरम् ॥३१॥ हिरण्यगर्भो भगवान्वासवोऽथ प्रजापतिः । मरुतो वसवो रुद्रा भास्करास्तारका ग्रहाः ॥३२॥ गन्धर्वा यक्षदैत्याश्च सकला देवयोनयः । मनुष्याः पशवः शैला समुद्राः सरितो द्रुमाः ॥३३॥ भूप भूतान्यशेषाणि भूतानां ये च हेतवः । प्रधानादिविशेषान्ताश्चेतनाचेतनात्मकम् ॥३४॥ एकपादं द्विपादं च बहुपादमपादकम् । मूर्तमेतद्धरे रूपं भावनात्रितयात्मकम् ॥३५॥ एतत्सर्वमिदं विश्वं जगदेतच्चराचरम् । परब्रह्मस्वरूपस्य विष्णोः शक्तिसमन्वितम् ॥३६॥ विष्णुशक्तिः परा प्रोक्ता क्षेत्रज्ञाख्या तथापरा । अविद्याकर्मसंज्ञान्या तृतीया शक्तिरिष्यते ॥३७॥ येयं क्षेत्रज्ञशक्तिः सा चेष्टिता नृप कर्मजा । असारभूते संसारे प्रोक्ता तत्र महामते ॥३८॥ केशिध्वज बोला--ज्ञानिन् ! चित्त के आश्रय (ब्रह्म) के दो स्वरूप हैं--मूर्त और अमूर्त अथवा पर और अपर ॥२३॥ सम्पूर्ण रूप की त्रिविध भावना होती है--ब्रह्म, कर्म और उभयात्मक । एक भावना कर्म-भावात्मिका, दूसरी ब्रह्म-भावात्मिका और तीसरी कर्म-ब्रह्मोभयात्मिका है । यही त्रिविध भाव भावना है ॥२४-२५॥ ज्ञानी ! सनक आदि सर्वदा ब्रह्म-भावना में ही तल्लीन रहते हैं । अन्य देव आदि और स्थावर, चर कर्म-भावना के ही पुजारी हैं ॥२६॥ अधिकार और ज्ञान-सम्पन्न हिरण्यगर्भ आदि में ब्रह्मकर्माभयात्मिका भावना रहती है। अधिकार और ज्ञान से युक्त प्राणियों में केवल भावात्मक-भावना रहती है। नृप ! समस्त विशेष ज्ञान और कर्म के विद्यमान रहने पर भेद-भाव और भिन्न रूपों में ही यह विश्व दृष्टिगोचर होता है ॥२७-२८॥ जहाँ समस्त भेद- भाव नष्ट हो जाते हैं, जो केवल सत् है और वाणी का अविषय है तथा जो स्वयं ही अनुभव-स्वरूप है, उसी को ब्रह्मज्ञान कहते हैं ॥२९॥ वही अज, अरूप, परमात्मा विष्णु का परम स्वरूप है जो उनके विश्वरूप से विलक्षण होता है ॥३०॥ नृप ! चूंकि उस रूप का योगी चिन्तन नहीं कर सकते इसलिए उसका जो नेत्रगोचर रूप है, उसी का चिन्तन करना चाहिए ॥३१॥ हिरण्यगर्भ भगवान्, इन्द्र, प्रजापति, मरुत्, वसु, रुद्र, भास्कर, तारक, ग्रह, गन्धर्व, यक्ष, दैत्य, सब देव योनि, मनुष्य, पशु, पर्वत, समुद्र, नदियां, वृक्ष और सब प्राणी, (प्रकृति) प्रधान से लेकर विशेष तक सम्पूर्ण भूतों के कारण, चेतन-अचेतन, एक पैर दो पैर वाले, बहुत पैर वाले अथवा बिना पैर के जितने जीव हैं ये तीनों भावनाओं से मिले हुए भगवान् के मूर्त रूप हैं ॥३२-३५॥ यह जो चराचरात्मक सम्पूर्ण जगत् है सो परब्रह्म विष्णु की शक्ति से युक्त है ॥३६॥ विष्णु की शक्ति परा कहलाती है, क्षेत्रज्ञा अपरा नाम की दूसरी शक्ति है और तीसरी अविद्या कर्म शक्ति है ॥३७॥ नृप ! जो यह क्षेत्रज्ञा शक्ति है, महामते, वह इस असार संसार में कर्मशक्ति से आवृत रहती है। मनुष्य शक्ति के द्वारा संसार के सब तापों का अनुभव करता ४० ना० पु०