भारतकोश
बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,008 पृष्ठ

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पृष्ठ 331

३१२ नारदीयपुराणम् यद्यन्तरायदोषेण दूष्यते नास्य मानसम् । जन्मान्तरैरभ्यसनान्मुक्तिः पूर्वस्य जायते ॥१०॥ विनिष्पन्नसमाधिस्तु मुक्तिस्तत्रैव जन्मनि । प्राप्नोति योगी योगाग्निदग्धकर्मचयोऽचिरात् ॥११॥ ब्रह्मचर्यमहिंसां च सत्यास्तेयापरिग्रहान् । सेवेत योगी निष्कामो योगितां स्वमनो नयन् ॥१२॥ स्वाध्यायशौचसंतोषतपांसि नियमान्यमान् । कुर्वीत ब्रह्मणि तथा परस्मिन्प्रवणं मनः ॥१३॥ एते यमाश्च नियमाः पंच पञ्चप्रकीर्तिताः । विशिष्टफलदाः काम्या निष्कामानां विमुक्तिदाः ॥१४॥ एवं भद्रासनादीनां समास्थाय गुणैर्युतः । यमाख्यैर्नियमाख्यैश्च युंजीत नियतो यतिः ॥१५॥ प्राणाख्यमवलं वस्थमभ्यासात्कुरुते तु यत् । प्राणायामः स विज्ञेयः सबीजोऽबीज एव च ॥१६॥ परस्परेणाभिभवं प्राणापानौ यदा निलौ । कुरुतः सद्भिधानेन तृतीयः संधमात्तयोः ॥१७॥ तस्य चालंबनवत्स्थूलं रूपं द्विषत्पते । आलंबनमनंतस्य योगिनोऽभ्यसतः स्मृतम् ॥१८॥ शब्दादिष्वनुरक्तानि निगृह्याक्षाणि योगवित् । कुर्याच्चित्तानुकारीणि प्रत्याहारपरायणः ॥१९॥ वश्यता परमा तेन जायते निश्चलात्मनाम् । इंद्रियाणामवश्यैस्तैर्न योगी योगसाधकः ॥२०॥ प्राणायामेन पवनैः प्रत्याहरेण चेंद्रियैः । वशीकृतैस्ततः कुर्यात्स्थिरं चेतः शुभाश्रये ॥२१॥ खांडिक्य उवाच कथ्यतां मे महाभाग चेतसो यः शुभाश्रयः । यदाधारमशेषं तु हंति दोषसमुद्भवम् ॥२२॥


जाता है ॥६॥ यदि विघ्नबाधाओं या दोषों से योगी का मन दूषित नहीं होता है तो उसको दूसरे जन्म के पुण्य प्रभाव से प्रथम अवस्था में ही मुक्ति मिल जाती है ॥१०॥ जिसको समाधि-अवस्था प्राप्त हो जाती है वह योगी योगाग्नि से सब कर्मों के भस्म हो जाने से शीघ्र उसी जन्म में मुक्ति पा जाता है ॥११॥ योगी निष्काम होकर ब्रह्मचर्य, अहिंसा, सत्य, अस्तेय और अपरिग्रह का सेवन करता हुआ योगिधर्म की ओर अपने मन को लगावे ॥१२॥ स्वाध्याय, शौच, संतोष, तप, सुनियम और यम का अभ्यास करे और परब्रह्म में अपने मन को लगावे ॥१३॥ ये यम और नियम पाँच-पाँच हैं, जो निष्काम योगियों को काम्य फल एवं मुक्ति देने वाला है ॥१४॥ इसी प्रकार भद्रासन आदि आसनों को लगाकर शुभ गुणों से युक्त होकर योगी यम, नियम आदि से नियमपूर्वक योग साधना करे ॥१५॥ अभ्यास द्वारा प्राण वायु को स्थिर करने को ही प्राणायाम कहा जाता है। प्राणायाम दो प्रकार का होता है--सबौज (आलम्बनयुक्त) और निर्बीज (आलम्बन रहित)। जब योगी के प्राण और अपान वायु एक-दूसरे का पराभव करते (दबाते हैं,) तब क्रमशः रेचक और पूरक नामक दो प्राणायाम होते हैं। और इन दोनों का एक ही समय संयम (निरोध) करने से कुम्भक नामक तीसरा प्राणायाम होता है ॥१७॥ राजन् ! जब योगी सबीज प्राणायाम का अभ्यास करता है तब उसका आलम्बन सर्वव्यापी अनन्त स्वरूप भगवान् विष्णु का साकार रूप होता है ॥१८॥ प्रत्याहार की साधना करने वाला योगी शब्दादि विषयों में आसक्त इन्द्रियों को खींचकर मन के वश में करे ॥१९॥ इस प्रकार निश्चल चित्तवाले योगियों की बुद्धि स्थिर हो जाती है। योग-साधक योगी इन्द्रियों को बिना वश में किये योग-साधन नहीं कर सकता ॥२०॥ प्राणायाम के द्वारा प्राणवायु को और प्रत्याहार के द्वारा इन्द्रियों को वश में करने के वाद योगी चित्त की शुभ आश्रय में स्थिर करे ॥२१॥ खाण्डिक्य ने कहा--महाभाग ! चित्त का जो शुभाश्रय है उसको कहिए, जिसका अवलम्बन सम्पूर्ण दोष जन्य विकारों को नष्ट कर देता है ॥२२॥