भारतकोश
बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,008 पृष्ठ

पृष्ठ 330, कुल 1008 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 330

अथ सप्तचत्वारिंशोऽध्यायः सनन्दन उवाच एतदध्यात्ममालाढ्यं वचः केशिध्वजस्य सः । खांडिक्योऽमृतवच्छ्रुत्वा पुनराह तमीरयन् ॥१॥ खांडिक्य उवाच तद् ब्रूहि त्वं महाभाग योगं योगविदुत्तम । विज्ञातयोगशास्त्रार्थस्त्वमस्यां निमिसंततौ ॥२॥ केशिध्वज उवाच योगस्वरूपं खांडिक्य श्रूयतां गदतो मम । यत्र स्थितो न च्यवते प्राप्य ब्रह्मलयं मुनिः ॥३॥ मन एव मनुष्याणां कारणं बंधमोक्षयोः । बंधस्य विषयासंगि मुक्तैर्निर्विषयं तथा ॥४॥ विषयेभ्यः समाहृत्य विज्ञानात्मा बुधो मनः । चिंतयेन्मुक्तये तेन ब्रह्मभूतं परेश्वरम् ॥५॥ आत्मभावं नयेत्तेन तद्ब्रह्माप्यापनं मनः । विकार्यमात्मनः शक्त्या लोहमाकर्षको यथा ॥६॥ आत्मप्रयत्नसापेक्षा विशिष्टा या मनोगतिः । तस्या ब्रह्मणि संयोगो योग इत्यभिधीयते ॥७॥ एवमत्यंतवैशिष्ट्ययुक्तधर्मोपलक्षणम् । यस्य योगः स वै योगी मुमुक्षुरभिधीयते ॥८॥ योगयुक् प्रथमं योगी युंजमानोऽभिधीयते । विनिष्पन्नसमाधिस्तु परब्रह्मोपलब्धिमान् ॥६॥

अध्याय ४७ मुक्तिप्रद योग का वर्णन सनन्दन बोले—केशिध्वज की उपर्युक्त अध्यात्म ज्ञान से पूर्ण सुधामयी वाणी को सुनकर पुनः उत्सुक हो खाण्डिक्य ने उससे पूछा ॥१॥ खाण्डिक्य ने कहा—महाभाग ! तुम इस योग को कहो । तुम योगियों में श्रेष्ठ हो । तुम्हीं निमिवंश में एकमात्र योगशास्त्र के रहस्य को जानने वाले हो ॥२॥ केशिध्वज ने कहा—खाण्डिक्य ! मैं योग-स्वरूप का वर्णन कर रहा हूँ, सुनो । योगस्थ होने पर मुनि ब्रह्म का सान्निध्य प्राप्त कर लेता और पुनः कभी च्युत नहीं होता ॥३॥ मनुष्यों का मन ही बन्धन और मोक्ष का कारण है । विषयों में आसक्त मन बन्धन का और निर्विषय मन मुक्ति का कारण है ॥४॥ विज्ञानी व्यक्ति मन को विषयों की ओर से हटाकर उससे ब्रह्मस्वरूप परमात्मा का मुक्ति प्राप्ति के लिए चिन्तन करे ॥५॥ जिस प्रकार चुम्बक लोहे को अपनी ओर खींच लेता है उसी प्रकार आत्मशक्ति के द्वारा विकारशील मन को विषयों की ओर से हटावे और ब्रह्मचिन्तन के सहारे उसको आत्म-भाव की ओर ले जाय ॥६॥ आत्म-प्रयत्न से मन की जो विशेष गति (स्पन्दन) होती है उस गति का ब्रह्म में युक्त होना ही योग कहा जाता है ॥७॥ इस प्रकार जिसका योग अत्यन्त वैशिष्ट्य युक्त धर्म से उपलक्षित होता है वही योगी मुमुक्षु कहा जाता है ॥८॥ पहले पहल योग की साधना करने वाला योगी युञ्जान कहा जाता है । समाधि को प्राप्त करने वाला परब्रह्म को पाने वाला समझा