भारतकोश
बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,008 पृष्ठ

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पृष्ठ 329

३१० नारदीयपुराणम् अहमेतदितीत्युच्चैः कुरुते कुमतिर्मतिम् । आकाशवाय्वग्निजल्पृथिवीभिः पृथक् स्थिते ॥८६॥ आत्मन्यात्ममयं भावं कः करोति कलेवरे । कलेवरोपभोग्यं हि गृहक्षेत्रादिकं च यत् ॥८७॥ अदेहे ह्यात्मनि प्राज्ञो ममेदमिति मन्यते । इत्थं च पुत्रपौत्रेषु तद्देहोत्पादितेषु च ॥८८॥ करोति पंडितः स्वाम्यमनात्मनि कलेवरे । सर्वदेहोपभोगाय कुरुते कर्म मानवः ॥८९॥ देहं चान्यत्तदा पुंसस्सदा बंधाय तत्परम् । मृण्मयं हि यथा गेहं लिप्यते वै मृदंभसा ॥९०॥ पार्थिवोऽयं तथा देहो मृदंभोलेपनस्थितिः । पंचभोगात्मकैर्भोगैः पंचभोगात्मकं वपुः ॥९१॥ आप्यायते यदि ततः पुंसो गर्वोऽत्र किंकृतः । अनेकजन्मसाहस्रं संसारपदवीं व्रजन् ॥९२॥ मोहश्रमं प्रयातोऽसौ वासनारेणुगुंठितः । प्रक्षाल्यते यदा सौम्य रेणुर्ज्ञानोष्णवारिणा ॥९३॥ तदा संसारपांथस्य याति मोहश्रमः शमम् । मोहश्रमे शमं याते स्वच्छान्तःकरणः पुमान् ॥९४॥ अनन्यातिशयाधारः परं निर्वाणमृच्छति । निर्वाणमय एवायमात्मा ज्ञानमयोऽमलः ॥९५॥ दुःखाज्ञानमया धर्माः प्रकृतेस्ते तु नात्मनः । जलस्य नाग्निना संगः स्थालीसंगात्तथापि हि ॥९६॥ शब्दोद्रेकादिकान्धर्म्मान्करोति हि यथा बुधः । तथात्मा प्रकृतेः संगादहंमानादिदूषितः ॥९७॥ भजते प्राकृतान्धर्मान्न्यस्तस्तंभो हि सोऽव्ययः । तदेतत्कथितं बीजमविद्याया मया तव ॥१००॥ क्लेशानां च क्षयकरं योगादन्यन्न विद्यते ॥१०१॥ इति श्रीबृहन्नारदीयपुराणे पूर्वभागे बृहदुपाख्याने द्वितीयपादे षट्चत्वारिंशत्तशोऽध्यायः ॥४६॥ स्वर से घोषणा करते हैं ॥८६-८७॥ परन्तु आकाश, वायु, अग्नि, जल, पृथ्वी तत्त्व के पृथक् हो जाने पर 'अहम्' कहाँ रह जाता है ? कौन विवेकी अपने शरीर को आत्मा समझने की मूर्खता करेगा ? ॥८८॥ सारा गृह, क्षेत्र आदि केवल शरीर के उपभोग के लिए हैं । प्रज्ञावान् शरीर से पृथक् आत्मा को ही अपना समझता है ॥८९१/२॥ इस प्रकार अपने शरीर से उत्पन्न किए हुए पुत्र, पौत्र आदि में अधिक ममता नहीं रखनी चाहिए । पण्डित आत्मा से अतिरिक्त शरीर पर अपना अधिकार रखते हैं ॥९०१/२॥ मानव देह के उपभोग के लिए ही सब कर्म करते हैं । आत्मा से अतिरिक्त जो देह है उसमें ही लिप्त रहकर मानव सदा अपने को मोह बन्धन में ही बाँधने का प्रयत्न करता है ॥६१॥ जिस प्रकार मिट्टी से बने घर को मिट्टी और जल से लीपते हैं उसी प्रकार मनुष्य का मोह में पड़ा रहना इस पार्थिव शरीर को मिट्टी और जल से लीपने के समान है ॥९२१/२॥ इस पाँच भौतिक शरीर को पंच भोगात्मक भोग में ही लिप्त रखा जाय तो उस समय कौन सा अभिमान करने के योग्य कार्य हुआ ॥९३१/२॥ सौम्य ! अनेक सहस्र जन्म के पश्चात् संसार में आकर मनुष्य मोह में फँसकर वासना की धूलि में लिपट जाता है ॥६४१/२॥ इसलिए जब ज्ञान के उष्ण जल से उसको धोया जायगा तभी संसार-पथ पर चलने वाले पथिकों का मोह दूर हो सकेगा ॥६५१/२॥ मोह के दूर हो जाने पर मनुष्य का अन्तःकरण स्वच्छ हो जाता है, तभी वह एकमात्र ईश्वर का सहारा प्राप्त कर निर्वाण को प्राप्त करता है ॥९६१/२॥ आत्मा निर्वाणमय, ज्ञानमय और निर्मल है । दुःख और अज्ञान प्रकृति के धर्म हैं, आत्मा के नहीं ॥६७१/२॥ जल का अग्नि के साथ कोई साहचर्य नहीं परन्तु स्थाली के साथ है ॥६८॥ जिस प्रकार बुध जन शब्द आदि गुणों को ग्रहण करता है उसी प्रकार आत्मा भी प्रकृति के संसर्ग से अहंकार आदि से दूषित हो जाता है ॥६६॥ और वह अव्यय प्राकृत धर्मों का अपना स्वभाव छोड़कर उपभोग करता है । इस प्रकार आज मैंने अविद्या का रहस्य तुमको बता दिया । योग को छोड़कर कोई अन्य उपाय क्लेशों को दूर करने वाला नहीं है ॥१००-१०१॥ श्रीनारदीयमहापुराण छियालीसवां अध्याय समाप्त ॥४६॥