बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)
Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)
३१० नारदीयपुराणम् अहमेतदितीत्युच्चैः कुरुते कुमतिर्मतिम् । आकाशवाय्वग्निजल्पृथिवीभिः पृथक् स्थिते ॥८६॥ आत्मन्यात्ममयं भावं कः करोति कलेवरे । कलेवरोपभोग्यं हि गृहक्षेत्रादिकं च यत् ॥८७॥ अदेहे ह्यात्मनि प्राज्ञो ममेदमिति मन्यते । इत्थं च पुत्रपौत्रेषु तद्देहोत्पादितेषु च ॥८८॥ करोति पंडितः स्वाम्यमनात्मनि कलेवरे । सर्वदेहोपभोगाय कुरुते कर्म मानवः ॥८९॥ देहं चान्यत्तदा पुंसस्सदा बंधाय तत्परम् । मृण्मयं हि यथा गेहं लिप्यते वै मृदंभसा ॥९०॥ पार्थिवोऽयं तथा देहो मृदंभोलेपनस्थितिः । पंचभोगात्मकैर्भोगैः पंचभोगात्मकं वपुः ॥९१॥ आप्यायते यदि ततः पुंसो गर्वोऽत्र किंकृतः । अनेकजन्मसाहस्रं संसारपदवीं व्रजन् ॥९२॥ मोहश्रमं प्रयातोऽसौ वासनारेणुगुंठितः । प्रक्षाल्यते यदा सौम्य रेणुर्ज्ञानोष्णवारिणा ॥९३॥ तदा संसारपांथस्य याति मोहश्रमः शमम् । मोहश्रमे शमं याते स्वच्छान्तःकरणः पुमान् ॥९४॥ अनन्यातिशयाधारः परं निर्वाणमृच्छति । निर्वाणमय एवायमात्मा ज्ञानमयोऽमलः ॥९५॥ दुःखाज्ञानमया धर्माः प्रकृतेस्ते तु नात्मनः । जलस्य नाग्निना संगः स्थालीसंगात्तथापि हि ॥९६॥ शब्दोद्रेकादिकान्धर्म्मान्करोति हि यथा बुधः । तथात्मा प्रकृतेः संगादहंमानादिदूषितः ॥९७॥ भजते प्राकृतान्धर्मान्न्यस्तस्तंभो हि सोऽव्ययः । तदेतत्कथितं बीजमविद्याया मया तव ॥१००॥ क्लेशानां च क्षयकरं योगादन्यन्न विद्यते ॥१०१॥ इति श्रीबृहन्नारदीयपुराणे पूर्वभागे बृहदुपाख्याने द्वितीयपादे षट्चत्वारिंशत्तशोऽध्यायः ॥४६॥ स्वर से घोषणा करते हैं ॥८६-८७॥ परन्तु आकाश, वायु, अग्नि, जल, पृथ्वी तत्त्व के पृथक् हो जाने पर 'अहम्' कहाँ रह जाता है ? कौन विवेकी अपने शरीर को आत्मा समझने की मूर्खता करेगा ? ॥८८॥ सारा गृह, क्षेत्र आदि केवल शरीर के उपभोग के लिए हैं । प्रज्ञावान् शरीर से पृथक् आत्मा को ही अपना समझता है ॥८९१/२॥ इस प्रकार अपने शरीर से उत्पन्न किए हुए पुत्र, पौत्र आदि में अधिक ममता नहीं रखनी चाहिए । पण्डित आत्मा से अतिरिक्त शरीर पर अपना अधिकार रखते हैं ॥९०१/२॥ मानव देह के उपभोग के लिए ही सब कर्म करते हैं । आत्मा से अतिरिक्त जो देह है उसमें ही लिप्त रहकर मानव सदा अपने को मोह बन्धन में ही बाँधने का प्रयत्न करता है ॥६१॥ जिस प्रकार मिट्टी से बने घर को मिट्टी और जल से लीपते हैं उसी प्रकार मनुष्य का मोह में पड़ा रहना इस पार्थिव शरीर को मिट्टी और जल से लीपने के समान है ॥९२१/२॥ इस पाँच भौतिक शरीर को पंच भोगात्मक भोग में ही लिप्त रखा जाय तो उस समय कौन सा अभिमान करने के योग्य कार्य हुआ ॥९३१/२॥ सौम्य ! अनेक सहस्र जन्म के पश्चात् संसार में आकर मनुष्य मोह में फँसकर वासना की धूलि में लिपट जाता है ॥६४१/२॥ इसलिए जब ज्ञान के उष्ण जल से उसको धोया जायगा तभी संसार-पथ पर चलने वाले पथिकों का मोह दूर हो सकेगा ॥६५१/२॥ मोह के दूर हो जाने पर मनुष्य का अन्तःकरण स्वच्छ हो जाता है, तभी वह एकमात्र ईश्वर का सहारा प्राप्त कर निर्वाण को प्राप्त करता है ॥९६१/२॥ आत्मा निर्वाणमय, ज्ञानमय और निर्मल है । दुःख और अज्ञान प्रकृति के धर्म हैं, आत्मा के नहीं ॥६७१/२॥ जल का अग्नि के साथ कोई साहचर्य नहीं परन्तु स्थाली के साथ है ॥६८॥ जिस प्रकार बुध जन शब्द आदि गुणों को ग्रहण करता है उसी प्रकार आत्मा भी प्रकृति के संसर्ग से अहंकार आदि से दूषित हो जाता है ॥६६॥ और वह अव्यय प्राकृत धर्मों का अपना स्वभाव छोड़कर उपभोग करता है । इस प्रकार आज मैंने अविद्या का रहस्य तुमको बता दिया । योग को छोड़कर कोई अन्य उपाय क्लेशों को दूर करने वाला नहीं है ॥१००-१०१॥ श्रीनारदीयमहापुराण छियालीसवां अध्याय समाप्त ॥४६॥
अथ सप्तचत्वारिंशोऽध्यायः सनन्दन उवाच एतदध्यात्ममालाढ्यं वचः केशिध्वजस्य सः । खांडिक्योऽमृतवच्छ्रुत्वा पुनराह तमीरयन् ॥१॥ खांडिक्य उवाच तद् ब्रूहि त्वं महाभाग योगं योगविदुत्तम । विज्ञातयोगशास्त्रार्थस्त्वमस्यां निमिसंततौ ॥२॥ केशिध्वज उवाच योगस्वरूपं खांडिक्य श्रूयतां गदतो मम । यत्र स्थितो न च्यवते प्राप्य ब्रह्मलयं मुनिः ॥३॥ मन एव मनुष्याणां कारणं बंधमोक्षयोः । बंधस्य विषयासंगि मुक्तैर्निर्विषयं तथा ॥४॥ विषयेभ्यः समाहृत्य विज्ञानात्मा बुधो मनः । चिंतयेन्मुक्तये तेन ब्रह्मभूतं परेश्वरम् ॥५॥ आत्मभावं नयेत्तेन तद्ब्रह्माप्यापनं मनः । विकार्यमात्मनः शक्त्या लोहमाकर्षको यथा ॥६॥ आत्मप्रयत्नसापेक्षा विशिष्टा या मनोगतिः । तस्या ब्रह्मणि संयोगो योग इत्यभिधीयते ॥७॥ एवमत्यंतवैशिष्ट्ययुक्तधर्मोपलक्षणम् । यस्य योगः स वै योगी मुमुक्षुरभिधीयते ॥८॥ योगयुक् प्रथमं योगी युंजमानोऽभिधीयते । विनिष्पन्नसमाधिस्तु परब्रह्मोपलब्धिमान् ॥६॥
अध्याय ४७ मुक्तिप्रद योग का वर्णन सनन्दन बोले—केशिध्वज की उपर्युक्त अध्यात्म ज्ञान से पूर्ण सुधामयी वाणी को सुनकर पुनः उत्सुक हो खाण्डिक्य ने उससे पूछा ॥१॥ खाण्डिक्य ने कहा—महाभाग ! तुम इस योग को कहो । तुम योगियों में श्रेष्ठ हो । तुम्हीं निमिवंश में एकमात्र योगशास्त्र के रहस्य को जानने वाले हो ॥२॥ केशिध्वज ने कहा—खाण्डिक्य ! मैं योग-स्वरूप का वर्णन कर रहा हूँ, सुनो । योगस्थ होने पर मुनि ब्रह्म का सान्निध्य प्राप्त कर लेता और पुनः कभी च्युत नहीं होता ॥३॥ मनुष्यों का मन ही बन्धन और मोक्ष का कारण है । विषयों में आसक्त मन बन्धन का और निर्विषय मन मुक्ति का कारण है ॥४॥ विज्ञानी व्यक्ति मन को विषयों की ओर से हटाकर उससे ब्रह्मस्वरूप परमात्मा का मुक्ति प्राप्ति के लिए चिन्तन करे ॥५॥ जिस प्रकार चुम्बक लोहे को अपनी ओर खींच लेता है उसी प्रकार आत्मशक्ति के द्वारा विकारशील मन को विषयों की ओर से हटावे और ब्रह्मचिन्तन के सहारे उसको आत्म-भाव की ओर ले जाय ॥६॥ आत्म-प्रयत्न से मन की जो विशेष गति (स्पन्दन) होती है उस गति का ब्रह्म में युक्त होना ही योग कहा जाता है ॥७॥ इस प्रकार जिसका योग अत्यन्त वैशिष्ट्य युक्त धर्म से उपलक्षित होता है वही योगी मुमुक्षु कहा जाता है ॥८॥ पहले पहल योग की साधना करने वाला योगी युञ्जान कहा जाता है । समाधि को प्राप्त करने वाला परब्रह्म को पाने वाला समझा
३१२ नारदीयपुराणम् यद्यन्तरायदोषेण दूष्यते नास्य मानसम् । जन्मान्तरैरभ्यसनान्मुक्तिः पूर्वस्य जायते ॥१०॥ विनिष्पन्नसमाधिस्तु मुक्तिस्तत्रैव जन्मनि । प्राप्नोति योगी योगाग्निदग्धकर्मचयोऽचिरात् ॥११॥ ब्रह्मचर्यमहिंसां च सत्यास्तेयापरिग्रहान् । सेवेत योगी निष्कामो योगितां स्वमनो नयन् ॥१२॥ स्वाध्यायशौचसंतोषतपांसि नियमान्यमान् । कुर्वीत ब्रह्मणि तथा परस्मिन्प्रवणं मनः ॥१३॥ एते यमाश्च नियमाः पंच पञ्चप्रकीर्तिताः । विशिष्टफलदाः काम्या निष्कामानां विमुक्तिदाः ॥१४॥ एवं भद्रासनादीनां समास्थाय गुणैर्युतः । यमाख्यैर्नियमाख्यैश्च युंजीत नियतो यतिः ॥१५॥ प्राणाख्यमवलं वस्थमभ्यासात्कुरुते तु यत् । प्राणायामः स विज्ञेयः सबीजोऽबीज एव च ॥१६॥ परस्परेणाभिभवं प्राणापानौ यदा निलौ । कुरुतः सद्भिधानेन तृतीयः संधमात्तयोः ॥१७॥ तस्य चालंबनवत्स्थूलं रूपं द्विषत्पते । आलंबनमनंतस्य योगिनोऽभ्यसतः स्मृतम् ॥१८॥ शब्दादिष्वनुरक्तानि निगृह्याक्षाणि योगवित् । कुर्याच्चित्तानुकारीणि प्रत्याहारपरायणः ॥१९॥ वश्यता परमा तेन जायते निश्चलात्मनाम् । इंद्रियाणामवश्यैस्तैर्न योगी योगसाधकः ॥२०॥ प्राणायामेन पवनैः प्रत्याहरेण चेंद्रियैः । वशीकृतैस्ततः कुर्यात्स्थिरं चेतः शुभाश्रये ॥२१॥ खांडिक्य उवाच कथ्यतां मे महाभाग चेतसो यः शुभाश्रयः । यदाधारमशेषं तु हंति दोषसमुद्भवम् ॥२२॥
जाता है ॥६॥ यदि विघ्नबाधाओं या दोषों से योगी का मन दूषित नहीं होता है तो उसको दूसरे जन्म के पुण्य प्रभाव से प्रथम अवस्था में ही मुक्ति मिल जाती है ॥१०॥ जिसको समाधि-अवस्था प्राप्त हो जाती है वह योगी योगाग्नि से सब कर्मों के भस्म हो जाने से शीघ्र उसी जन्म में मुक्ति पा जाता है ॥११॥ योगी निष्काम होकर ब्रह्मचर्य, अहिंसा, सत्य, अस्तेय और अपरिग्रह का सेवन करता हुआ योगिधर्म की ओर अपने मन को लगावे ॥१२॥ स्वाध्याय, शौच, संतोष, तप, सुनियम और यम का अभ्यास करे और परब्रह्म में अपने मन को लगावे ॥१३॥ ये यम और नियम पाँच-पाँच हैं, जो निष्काम योगियों को काम्य फल एवं मुक्ति देने वाला है ॥१४॥ इसी प्रकार भद्रासन आदि आसनों को लगाकर शुभ गुणों से युक्त होकर योगी यम, नियम आदि से नियमपूर्वक योग साधना करे ॥१५॥ अभ्यास द्वारा प्राण वायु को स्थिर करने को ही प्राणायाम कहा जाता है। प्राणायाम दो प्रकार का होता है--सबौज (आलम्बनयुक्त) और निर्बीज (आलम्बन रहित)। जब योगी के प्राण और अपान वायु एक-दूसरे का पराभव करते (दबाते हैं,) तब क्रमशः रेचक और पूरक नामक दो प्राणायाम होते हैं। और इन दोनों का एक ही समय संयम (निरोध) करने से कुम्भक नामक तीसरा प्राणायाम होता है ॥१७॥ राजन् ! जब योगी सबीज प्राणायाम का अभ्यास करता है तब उसका आलम्बन सर्वव्यापी अनन्त स्वरूप भगवान् विष्णु का साकार रूप होता है ॥१८॥ प्रत्याहार की साधना करने वाला योगी शब्दादि विषयों में आसक्त इन्द्रियों को खींचकर मन के वश में करे ॥१९॥ इस प्रकार निश्चल चित्तवाले योगियों की बुद्धि स्थिर हो जाती है। योग-साधक योगी इन्द्रियों को बिना वश में किये योग-साधन नहीं कर सकता ॥२०॥ प्राणायाम के द्वारा प्राणवायु को और प्रत्याहार के द्वारा इन्द्रियों को वश में करने के वाद योगी चित्त की शुभ आश्रय में स्थिर करे ॥२१॥ खाण्डिक्य ने कहा--महाभाग ! चित्त का जो शुभाश्रय है उसको कहिए, जिसका अवलम्बन सम्पूर्ण दोष जन्य विकारों को नष्ट कर देता है ॥२२॥
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सप्तचत्वारिंशोऽध्यायः ३१३ केशिध्वज उवाच आश्रयश्चेतसो ज्ञानिन् द्विधा तच्च स्वरूपतः । रूपं मूर्तममूर्तं च परं चापरमेव च ॥२३॥ त्रिविधा भावना रूपं विश्वमेतत्रिधोच्यते । ब्रह्माख्या कर्मसंज्ञा च तथा चैवोभयात्मिका ॥२४॥ कर्मभावात्मिका ह्येका ब्रह्मभावात्मिकापरा । उभयात्मिका तथैवान्या त्रिविधा भावभावना ॥२५॥ सनकाद्या सदा ज्ञानिन् ब्रह्मभावनया युताः । कर्मभावनया चान्ये देवादद्याः स्थावराश्चराः ॥२६॥ हिरण्यगर्भादिषु च ब्रह्मकर्मात्मिका द्विधा । अधिकारबोधयुक्तेषु विद्यते भावभावना ॥२७॥ अक्षीणेपु समस्तेषु विशेषज्ञानकर्मसु । विश्वमेतत्परं चान्यद्भेदभिन्नदृशां नृपः ॥२८॥ प्रत्यस्तमितभेदं यत्सत्तामात्रमगोचरम् । वचसामात्मसंवेद्यं तज्ज्ञानं ब्रह्मसंज्ञितम् ॥२९॥ तच्च विष्णोः परं रूपमरूपस्याजनस्थ च। विश्वस्वरूपवैरूप्यलक्षणं परमात्मनः ॥३०॥ न तद्योगयुजा शक्यं नृप चिन्तयितुं यतः । ततः स्थूलं हरे रूपं चिंत्यं यच्चक्षुगोचरम् ॥३१॥ हिरण्यगर्भो भगवान्वासवोऽथ प्रजापतिः । मरुतो वसवो रुद्रा भास्करास्तारका ग्रहाः ॥३२॥ गन्धर्वा यक्षदैत्याश्च सकला देवयोनयः । मनुष्याः पशवः शैला समुद्राः सरितो द्रुमाः ॥३३॥ भूप भूतान्यशेषाणि भूतानां ये च हेतवः । प्रधानादिविशेषान्ताश्चेतनाचेतनात्मकम् ॥३४॥ एकपादं द्विपादं च बहुपादमपादकम् । मूर्तमेतद्धरे रूपं भावनात्रितयात्मकम् ॥३५॥ एतत्सर्वमिदं विश्वं जगदेतच्चराचरम् । परब्रह्मस्वरूपस्य विष्णोः शक्तिसमन्वितम् ॥३६॥ विष्णुशक्तिः परा प्रोक्ता क्षेत्रज्ञाख्या तथापरा । अविद्याकर्मसंज्ञान्या तृतीया शक्तिरिष्यते ॥३७॥ येयं क्षेत्रज्ञशक्तिः सा चेष्टिता नृप कर्मजा । असारभूते संसारे प्रोक्ता तत्र महामते ॥३८॥ केशिध्वज बोला--ज्ञानिन् ! चित्त के आश्रय (ब्रह्म) के दो स्वरूप हैं--मूर्त और अमूर्त अथवा पर और अपर ॥२३॥ सम्पूर्ण रूप की त्रिविध भावना होती है--ब्रह्म, कर्म और उभयात्मक । एक भावना कर्म-भावात्मिका, दूसरी ब्रह्म-भावात्मिका और तीसरी कर्म-ब्रह्मोभयात्मिका है । यही त्रिविध भाव भावना है ॥२४-२५॥ ज्ञानी ! सनक आदि सर्वदा ब्रह्म-भावना में ही तल्लीन रहते हैं । अन्य देव आदि और स्थावर, चर कर्म-भावना के ही पुजारी हैं ॥२६॥ अधिकार और ज्ञान-सम्पन्न हिरण्यगर्भ आदि में ब्रह्मकर्माभयात्मिका भावना रहती है। अधिकार और ज्ञान से युक्त प्राणियों में केवल भावात्मक-भावना रहती है। नृप ! समस्त विशेष ज्ञान और कर्म के विद्यमान रहने पर भेद-भाव और भिन्न रूपों में ही यह विश्व दृष्टिगोचर होता है ॥२७-२८॥ जहाँ समस्त भेद- भाव नष्ट हो जाते हैं, जो केवल सत् है और वाणी का अविषय है तथा जो स्वयं ही अनुभव-स्वरूप है, उसी को ब्रह्मज्ञान कहते हैं ॥२९॥ वही अज, अरूप, परमात्मा विष्णु का परम स्वरूप है जो उनके विश्वरूप से विलक्षण होता है ॥३०॥ नृप ! चूंकि उस रूप का योगी चिन्तन नहीं कर सकते इसलिए उसका जो नेत्रगोचर रूप है, उसी का चिन्तन करना चाहिए ॥३१॥ हिरण्यगर्भ भगवान्, इन्द्र, प्रजापति, मरुत्, वसु, रुद्र, भास्कर, तारक, ग्रह, गन्धर्व, यक्ष, दैत्य, सब देव योनि, मनुष्य, पशु, पर्वत, समुद्र, नदियां, वृक्ष और सब प्राणी, (प्रकृति) प्रधान से लेकर विशेष तक सम्पूर्ण भूतों के कारण, चेतन-अचेतन, एक पैर दो पैर वाले, बहुत पैर वाले अथवा बिना पैर के जितने जीव हैं ये तीनों भावनाओं से मिले हुए भगवान् के मूर्त रूप हैं ॥३२-३५॥ यह जो चराचरात्मक सम्पूर्ण जगत् है सो परब्रह्म विष्णु की शक्ति से युक्त है ॥३६॥ विष्णु की शक्ति परा कहलाती है, क्षेत्रज्ञा अपरा नाम की दूसरी शक्ति है और तीसरी अविद्या कर्म शक्ति है ॥३७॥ नृप ! जो यह क्षेत्रज्ञा शक्ति है, महामते, वह इस असार संसार में कर्मशक्ति से आवृत रहती है। मनुष्य शक्ति के द्वारा संसार के सब तापों का अनुभव करता ४० ना० पु०
३१४ नारदीयपुराणम् संसारतापानखिलानवाप्नोत्यनुसंजितान् । तया तिरोहितत्वात्तु शक्तिः क्षेत्रज्ञसंज्ञिता ॥३९॥ सर्वभूतेषु भूपाल तारतम्येन लक्ष्यते । अप्राणवत्सु खल्वल्पा स्थावरेषु ततोऽधिका ॥४०॥ सरीसृपेषु तेभ्योऽप्याप्यतिशक्त्या पतत्त्रिषु । पतत्त्रिभ्यो मृगास्तेभ्यः स्वशक्त्या पशवोऽधिकाः ॥४१॥ पशुभ्यो मनुजाश्चातिशक्त्या पुंसः प्रभाविताः । तेभ्योऽपि नागगन्धर्वयक्षाद्या देवता नृप ॥४२॥ शक्रः समस्तदेवेभ्यस्ततश्चातिप्रजापतिः । हिरण्यगर्भोऽपि ततः पुंसः शक्त्युपलक्षितः ॥४३॥ एतान्यशेषरूपाणि तस्य रूपाणि पार्थिव । यतस्तच्छक्तियोगेन युक्तानि नभसा यथा ॥४४॥ द्वितीयं विष्णुसंज्ञस्य योगिध्येयं महामते । अमूर्तं ब्रह्मणो रूपं यत्सन्नित्युच्यते बुधैः ॥४५॥ समस्ताः शक्तयश्चैता नृप यत्र प्रतिष्ठिताः । नहि स्वरूपरूपं वै रूपमन्यद्धरेर्महत् ॥४६॥ समस्तशक्तिरूपाणि तत्करोति जनेश्वर । देवतिर्यङ्मनुष्यादिचेष्टावंति स्वलीलया ॥४७॥ जगतामुपकाराय तस्य कर्मनिमित्तजा । चेष्टा तस्याप्रमेयस्य व्यापिन्यविहतात्मिका ॥४८॥ तद्रूपं विश्वरूपस्य चिंत्यं योगयुजा नृप । तस्य ह्यात्मविशुद्धयर्थं सर्वकिल्बिषनाशनम् ॥४९॥ यथाग्निरुद्धतशिखः कक्षं दहति सानिलः । तथा चित्तस्थितो विष्णुर्योगिनां सर्वकिल्बिषम् ॥५०॥ तस्मात्समस्तशक्तीनामाद्यांते तत्र चेतः । कुर्वीत संस्थितं साधु विज्ञेया शुद्धलक्षणा ॥५१॥ शुभाश्रयः सचित्तस्य सर्वगस्य तथात्मनः । त्रिभावभावनातीतो मुक्तये योगिनां नृप ॥५२॥ अन्ये तु पुरुषव्याघ्र चेतसो ये व्यपाश्रयाः । अशुद्धास्ते समस्तास्तु देवाद्याः कर्मयोनयः ॥५३॥ है। भूपाल ! उस अविद्या शक्ति से तिरोहित होने के कारण यह शक्ति सब प्राणियों में तारतम्य से देखी जाती है ॥३८-३९३॥ प्राणशून्य पदार्थों में यह अत्यन्त स्वल्प रहती, परन्तु स्थावरों में उससे कुछ अधिक रहती है ॥४०॥ रेंगकर चलने वाले जीवों में कुछ और अधिक और उनसे अधिक पक्षियों में रहती है । पक्षियों की अपेक्षा मृगों में वह शक्ति अधिक मात्रा में पाई जाती है । मृगों की अपेक्षा पशुओं में अधिक और पशुओं से अधिक मनुष्यों में वह शक्ति देखी जाती है । नृप ! मनुष्यों से भी अधिक नाग, गन्धर्व, यक्ष, देवता आदि में उस शक्ति की अधिकता है ॥४१-४२॥ सब देवों से अधिक इन्द्र में उस शक्ति को देखते हैं । शक्र से अधिक प्रजापति शक्तिशाली और प्रजापति की अपेक्षा हिरण्यगर्भ पुरुष में वह शक्ति अधिक पाई जाती है ॥४३॥ पार्थिव ! उस पुरुष शक्ति के ये ही सम्पूर्ण रूप हैं । जिस प्रकार आकाश से सारे पदार्थ ढके हुए हैं, उसी प्रकार सारे पदार्थ उससे युक्त हैं ॥४४॥ महामति ! दूसरा योगिध्येय परब्रह्म विष्णु का अमूर्त रूप है, जिसको बुधजन सत् कहते हैं ॥४५॥ जिसमें ये समस्त शक्तियां एकत्र हैं वह भगवान् हरि का दूसरा स्वरूप रूप या महत् रूप नहीं है ॥४६॥ जनेश्वर ! सब शक्तियों को वही सत् रूप संचालित या प्रकट करता है । वही देव, तिर्यक् और मनुष्यों को अपनी लीला से क्रियाशील बनाता है ॥४७॥ संसार के कल्याण के लिए उस अप्रमेय सत् की कर्म- निमित्तजा शक्ति सर्वत्र व्यापक और गतिशील रहती है ॥४८॥ नृप ! योगी जन आत्म-शुद्धि और सब पापों को नष्ट करने के लिए उस विश्व के इस रूप का ही चिन्तन करें ॥४९॥ जिस प्रकार अग्नि की चंचल लपटें वायु के सहयोग से अत्यन्त तीव्र होकर समीप के कक्ष को जला देती हैं उसी प्रकार योगी के हृदय में स्थित विष्णु उसके सब कलुष को भस्म कर देते हैं ॥५०॥ अतएव साधु अपने चित्त को समस्त शक्तियों के आधारभूत उस भगवान् में लगा दे, यही शुद्ध लक्षणा (भावना) है ॥५१॥ नृप ! आत्मा, चंचल चित्त का त्रिभाव भावना से रहित जो शुभाश्रय है वही योगी की मुक्ति का कारण बनता है ॥५२॥ पुरुषव्याघ्र ! चित्त के अन्य जो आश्रय (आधार) हैं वे अशुद्ध हैं और वे हैं देवता आदि जो कर्मयोनि हैं ॥५३॥ भगवान् के मूर्त रूप का सब आश्रयों की ओर से
मूर्त्तं भगवतो रूपं सर्वापाश्रयनिस्पृहः । एषा वै धारणा ज्ञेया यच्चित्तं तत्र धार्यते ॥५४॥ तत्र मूर्त्तं हरे रूपं यादृक् चिंत्यं नराधिप । तच्छ्रूय तामनाधारे धारणा नोपपद्यते ॥५५॥ प्रसन्नचारुवदनं पद्मपत्रायतेक्षणम् । सुकपोलं सुविस्तीर्णं ललाटफलकोज्ज्वलम् ॥५६॥ समकर्णां सविन्यस्तचारुकर्णोपभूषणम् । कम्बुग्रीवं सुविस्तीर्णश्रीवत्सांकितवक्षसम् ॥५७॥ वलित्रिभङ्गिना भुग्ननाभिना चोदरेण वै । प्रलंबाष्टभुजं विष्णुमथवापि चतुर्भुजम् ॥५८॥ समस्थितोरुजघनं सुस्थिरांत्रिकरंबुजम् । चिंतयेद्ब्रह्मभूतं तं पीतनिर्मलवाससम् ॥५९॥ किरीटचारुकेयूरकटकादिविभूषितम् । शार्ङ्गशंखगदाखड्गप्रकाशवलयांचितम् ॥६०॥ चिंतयेत्तन्मयो योगी समाधायात्ममानसम् । तावद्यावद् दृढीभूता तत्रैव नृपधारणा ॥६१॥ वदतस्तिष्ठतो यद्वा स्वेच्छया कर्म कुर्वतः । नापयाति यदा चित्तात्सिद्धां मन्येत तां तदा ॥६२॥ ततः शंखगदाचक्रशार्ङ्गादि रहितं बुधः । चिंतयेद्भगवद्रूपं प्रशांतं साक्षसूत्रकम् ॥६३॥ सा यदा धारणा तद्वदवस्थानवती ततः । किरीटकेयूरमुखैर्भूषणैरहितं स्मरेत् ॥६४॥ तदेकावयवं चैवं चेतसा हि पुनर्बुधः । कुर्यात्ततोऽवयविनि प्रणिधानपरो भवेत् ॥६५॥ तद्रूपप्रत्यये चैकसंमतिश्चान्यनिःस्पृहा । तद्ध्यानं प्रथमैरंगैः षड्भिर्निष्पाद्यते नृप ॥६६॥ तस्यैव कल्पनाहीनं स्वरूपग्रहणं हि यत् । मनसा ध्याननिष्पाद्यं समाधिः सोऽभिधीयते ॥६७॥ विज्ञानं प्रापकं प्राप्ये परे ब्रह्मणि पार्थिव । प्रोपणीयस्तथैवात्मा प्रक्षीणाशेषभावनः ॥६८॥
निस्पृह होकर ध्यान करना चाहिए । यही धारणा कही जाती है, जहां चित्त को एकाग्र किया जाता है अथवा जहाँ चित्त को एक आधार प्राप्त होता है ॥५४॥ नराधिप ! भगवान् के मूर्त्त रूपों में भी जिस रूप का चिन्तन करना चाहिए उसको भी सुनो; क्योंकि अनाधार में ध्यान-धारणा नहीं हो सकती ॥५५॥ प्रसन्न, शुभ मुख और कमल पत्र के समान बड़ी आँखों वाले, सुन्दर कपोल, देदीप्यमान विशाल ललाट से सुशोभित, मनोहर कर्णाभरण से आभूषित कर्ण वाले, कम्बुग्रीव, चौड़े, श्रीवत्स से चिह्नित वक्षःस्थल और त्रिवली से मुक्त, वृत्ताकार गहरी नाभि और चढ़ाव-उतार वाले उदर से युक्त और प्रलम्बबाहु-चतुर्भुज विष्णु का अथवा ऊरु और जंघे को स्थिरता के साथ आसनबद्ध करके घुटने पर अपने कर कमल को रखे हुए, पीले, निर्मल वस्त्र से सुशोभित योगि-रूप में स्थित, किरीट, केयूर और वलय से सुशोभित, शार्ङ्ग, शंख, गदा और प्रभा-वलय से मंडित ब्रह्म का तन्मय होकर योगी अपने मन को वश में करके चिन्तन करे ॥५६-६०$\frac{१}{२}$॥ इस क्रम को तब तक जारी रखे जब तक कि उसमें दृढ़ धारणा न हो जाय ॥६१॥ ठहरने, बोलने अथवा स्वेच्छापूर्वक काम करने के समय भी यदि मन से वह रूप लुप्त न हो तो धारणा को सिद्ध समझना चाहिए ॥६२॥ इस अवस्था को प्राप्त कर लेने के उपरान्त धीमान् योगी शंख, चक्र, गदा और शार्ङ्ग से रहित केवल अक्ष सूत्र से युक्त भगवान् के रूप का ध्यान करे ॥६३॥ ऐसी धारणा भी जब पूर्ववत् स्थिर हो जाय तब किरीट, केयूर आदि आभरणों से शून्य रूप का ध्यान करे ॥६४॥ जब इस प्रकार की धारणा स्थिर हो जाय तब वह ज्ञानी योगी उनके किसी एक अवयव का ही ध्यान करे । फिर वह उपासनापरायण होकर अवयवी का ध्यान करे ॥६५॥ उनके रूप का एकान्त ध्यान करने पर और उस पर दृढ़ विश्वास हो जाने पर अन्य विषयों की ओर स्पृहा नहीं रह जाती । नृप ! सज्जन इस प्रकार ध्यान यम- नियमादि छह अंगों से निष्पन्न होता है । उसी प्रभु के जब अवयव की कल्पना से रहित रूप का मन के द्वारा ध्यान किया जाता है तब उस ध्यान को समाधि कहा जाता है ॥६६-६७॥ विज्ञान उस प्राप्त करने योग्य पर ब्रह्म को प्राप्त कराने वाला है, तथा अशेष भावनाओं से रहित आत्मा प्राप्त करने वाला है । क्षेत्रज्ञ कर्ता है और ज्ञान
३१६ नारदीयपुराणम् अत्रज्ञकरणीज्ञानं करणं तेन तस्य तत् । निष्पाद्य मुक्तिकार्यं वै कृतकृत्यो निवर्तते ॥६६॥ तद्भावभावनापन्नस्ततोऽसौ परमात्मनः । भवत्यभेदी भेदश्च तस्याज्ञानकृतो भवेत् ॥७०॥ विभेदजनके ज्ञाने नाशमात्यन्तिकं गते । आत्मनो ब्रह्मणोभेदं संमलं कः करिष्यति ॥७१॥ इत्युक्तस्ते मया योगः खांडिक्यं परिपृच्छतः । संक्षेपविस्तराभ्यां तु किमद्यक्रियतां तव ॥७२॥ खांडिक्य उवाच कथितो योगसद्भावः सर्वमेव कृतं मम । तवोपदेशात्सकलो नष्टश्चित्तमलो मम ॥७३॥ ममेति यन्मया प्रोक्तमसदेतन्न चान्यथा । नरेंद्र गदितुं शक्यमपि विज्ञेयवेदिभिः ॥७४॥ अहं ममेत्यविद्येयं व्यवहारस्थानयोः । परमार्थस्त्वसंलाध्यो वचसां गोचरो न यः ॥७५॥ तद्गच्छ श्रेयसे सर्वं ममैतद्भवता कृतम् । यद्विमुक्तिपरो योगः प्रोक्तः केशिध्वजान्ययः ॥७६॥ सनन्दन उवाच यथार्हपूजया तेन खांडिक्येन स पूजितः । आजगाम पुरं ब्रह्मंस्ततः केशिध्वजो नृप ॥७७॥ खांडिक्योऽपि सुतं कृत्वा राजानं योगसिद्धये । विशालागमत्कृष्णे समावेशितमानसः ॥७८॥ स तत्रैकांतिको भूत्वा यमादिगुणसंयुतः । विष्ण्वाख्ये निर्मले ब्रह्मण्यवाप नृपतिर्लयम् ॥७९॥ केशिध्वजोऽपि मुक्त्यर्थं स्वकर्मक्षपणोन्मुखः । बुभुजे विषयान्कर्म चक्र चानभिसंधितम् ॥८०॥ स कल्याणोपभोगैश्च क्षीणपापोऽमलस्ततः । अवाप सिद्धिमत्यंतंत्रितापक्षवणीं मुने ॥८१॥
करण है; अतः उस ज्ञान रूपी करण के द्वारा वह योगी मुक्ति रूप कार्य सिद्ध करके कृतकृत्य होकर सर्वश्रेष्ठ हो जाता है ॥६८-६९॥ भगवान् के रूप ध्यान में तन्मय होकर वह उससे अभिन्न (तद्रूप) हो जाता है ! उससे अपने को भिन्न समझना तो अज्ञान है ॥७०॥ विभेदमूलक ज्ञान के आत्यन्तिक नाश हो जाने पर आत्मा और ब्रह्म का भेद रह ही नहीं जाता है, इसका समर्थन कौन कर सकता है ॥७१॥ खाण्डिक्य ! तुम्हारे प्रश्न के अनुसार मैंने इस प्रकार कहीं पर तो संक्षेप में और कहीं विस्तार के साथ योग का वर्णन कर दिया । अब तुम्हारा कौन सा प्रिय कार्य है, जिसको करूँ ॥७२॥ खाण्डिक्य ने कहा-तुमने मेरे ऊपर अनुग्रह करके सम्पूर्ण योग का वर्णन कर दिया और तुम्हारे उप- देश से मेरे मन का सब मल नष्ट हो गया ॥७३॥ मैंने जो 'यह मेरा है' ऐसा समझ रखा था, वह असद्ज्ञान था, इसमें सन्देह का कुछ भी अवसर नहीं । ज्ञेय तत्त्व को जानने वाले व्यक्ति ही इस विषय को कह सकते हैं ॥७४॥ मैं और मेरा का व्यवहार अविद्या (अज्ञान) है । इसका परमार्थ तत्त्व अनिर्वचनीय और वाणी से परे है। केशिध्वज जी, अब तुम जा सकते हो, जो कुछ तुमने उपदेश दिया और जो कुछ मुक्ति-विषयक योग को बतलाया वह मेरे कल्याण के लिए पर्याप्त है ॥७५-७६॥ सनन्दन बोले-ब्रह्मन् ! खांडिक्य से केशिध्वज यथायोग्य पूजा पाकर अपनी राजधानी में चला आया ॥७७॥ खांडिक्य भी अपने पुत्र को राज्य देकर अपने मन में कृष्ण का ध्यान करता हुआ विशाला नगरी में आया ॥७८॥ वहां वह यम-नियमादि का पालन करता हुआ एकान्त भाव से निर्मल परब्रह्म विष्णु में लीन हो गया ॥७९॥ केशिध्वज भी अपने कर्मों को नष्ट कर मुक्ति पाने के अभिप्राय से राजकीय विषयों का उपभोग करता हुआ अनासक्त भाव से कर्म करता रहा ॥८०॥ मुने ! उसने शुभ भोगों के द्वारा अपने पापों को नष्ट कर त्रिताप
अष्टचत्वारिंशोऽध्यायः ३१७ एतत्ते कथितं सर्वं यन्मां त्वं परिपृष्टवान् । तापत्रयचिकित्सार्थं किमन्यत्कथयामि ते ॥८२॥ इति श्रीबृहन्नारदीयपुराणे पूर्वभागे द्वितीयपादे सप्तचत्वारिंशोऽध्यायः ॥४७॥ अथाष्टचत्वारिंशोऽध्यायः नारद उवाच श्रुतं मया महाभाग तापत्रयचिकित्सितम् । तथापि मे मनो भ्रांतं नैव स्थितिं लभतेऽञ्जसा ॥१॥ आत्मन्यतिक्रमं ब्रह्मन्दुर्जनाचरितं कथम् । सोढुं शक्येत मनुजैस्तन्ममाख्याहि मानद ॥२॥ सूत उवाच तच्छ्रुत्वा नारदेनोक्तं ब्रह्मपुत्रः सनंदनः । उवाच हर्षसंयुक्तः स्मरन्भरतचेष्टितम् ॥३॥ सनंदन उवाच अत्र ते कथयिष्यामि इतिहास पुरातनम् । यं श्रुत्वा त्वन्मनो भ्रांतमास्थानं लभते भृशम् ॥४॥ आसीत्पुरा मुनिश्रेष्ठ भरतो नाम भूपतिः । आर्षभो यस्य नाम्नेदं भारतं खण्डमुच्यते ॥५॥ को नष्ट करने वाली सिद्धिमती भूमिका प्राप्त की । इस प्रकार त्रिताप को नष्ट करने वाली योग विद्या के लिए तुमने जो उपाय पूछा था, वह सब मैंने बता दिया । अब और क्या कहूँ ॥८१-८२॥ श्रीनारदीयमहापुराण के पूर्वभाग में संतालीसवां अध्याय समाप्त ॥४७॥ अध्याय ४८ ज्ञान-चर्चा-प्रसंग में राजा भरत का उपाख्यान नारद बोले- महाभाग ! त्रिताप को दूर करने वाले योग-रहस्य को तो सुना फिर भी मेरा मन भ्रम में ही पड़ा हुआ है, किसी प्रकार पूर्णरूप से शान्ति नहीं मिल रही है ॥१॥ ब्रह्मन् ! मानद ! अब यह बताने का कष्ट करें कि दुष्टों के विपरीत आचरण को मनुष्य किस प्रकार सह सकता है ॥२॥ सूत बोले-नारद के प्रश्न को सुनकर ब्रह्म-पुत्र सनन्दन प्रसन्न होकर राजा भरत के चरित्र का स्मरण करते हुए बोले ॥३॥ इस विषय में तुमको एक प्राचीन इतिहास सुना रहा हूँ जिसको सुनकर तुम्हारा भ्रान्त मन भली-भाँति शान्ति प्राप्त करेगा ॥४॥ मुनिश्रेष्ठ ! प्राचीन काल में ऋषभ-पुत्र भरत नाम का एक राजा था, जिसके नाम
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३१८ | नारदीयपुराणम् स राजा प्राप्तराज्यस्तु पितृपैतामहं क्रमात् । पालयामास धर्मेण पितृवद्रञ्जयन् प्रजाः ॥६॥ ईजे च विविधैर्यज्ञैर्भगवन्तमधोक्षजम् । सर्वदेवात्मकं ध्यायन्नानाकर्मसु तन्मतिः ॥७॥ ततः समुत्पाद्य सुतान्विरक्तो विषयेषु सः । मुक्त्वा राज्यं ययौ विद्वान्पुलस्त्यपुलहाश्रमम् ॥८॥ शालग्रामं महाक्षेत्रं मुमुक्षुजनसेवितम् । तत्रासौ तापसो भूत्वा विष्णोराराधनं मुने ॥६॥ चकार भक्तिभावेन यथालब्धसपर्यया । नित्यं प्रातः समाप्लुत्य निर्मलेऽम्भसि नारद ॥१०॥ उपतिष्ठेद्रविं भक्त्या गृणन्ब्रह्माक्षरं परम् । अथाश्रमे समागत्य वासुदेवं जगत्पतिम् ॥११॥ समाहृतैः स्वयं द्रव्यैः समित्कुशमृदादिभिः । फलैः पुष्पैस्तथा पत्रैस्तुलस्याः स्वच्छवारिभिः ॥१२॥ पूजयत्प्रयतो भूत्वा भक्तिप्रसरसंप्लुतः । स चैकदा महाभागः स्नात्वा प्रातः समाहितः ॥१३॥ चक्रनद्यां जपंस्तस्थौ मुहूर्तत्रयमंबुनि । अथाजगाम तत्तीरं जलं पातुं विपासिता ॥१४॥ आसन्नप्रसवा भ्रान्त्वैकैव हरिणी वनात् । ततः समभवत्तत्र पीतप्राये जले तया ॥१५॥ सिंहस्य नादः सुमहान् सर्वप्राणिभयंकरः । ततः सा सिंहसन्नादादुत्प्लुता निम्नगातटम् ॥१६॥ अत्युच्चारोहणेनास्या नद्यां गर्भः पपात ह । तमुह्यमानं वेगेन वीचिमालापरिलुतम् ॥१७॥ जग्राह भरतो गर्भोत्पतितं मृगपोतकम् । गर्भप्रच्युतिदुःखेन प्रोत्तुङ्गाक्रमणेन च ॥१८॥ मुनीन्द्र सा तु हरिणी निपपात ममार च । हरिणीं तां विलोक्याथ विपन्नां नृपतापसः ॥१६॥ मृगपोतं समागृह्य स्वमाश्रममुपागतः । चकारानुदिनं चासौ मृगपोतस्य वै नृपः ॥२०॥
से यह देश भारतखण्ड कहलाता है ॥५॥ उस राजा ने कुल-परम्परा से राज्य को प्राप्त कर धर्मपूर्वक अपने पूर्वजों की भांति प्रजा का पालन किया और प्रजा को सन्तुष्ट रखा ॥६॥ अपने शासन-काल में उसने विविध यज्ञों से इन्द्रियातीत भगवान् विष्णु की पूजा की। सर्वदा सब देवों के आत्मा भगवान् का ध्यान करते हुए उसने भिन्न कर्मों को किया ॥७॥ तदनन्तर वह पुत्रों को उत्पन्न कर विषयों से विरक्त हो अपने राज्य को त्याग कर वह विद्वान् पुलस्त्य और पुलह ऋषि के आश्रम में गया ॥८॥ वहाँ शालग्राम नामक एक महाक्षेत्र था जहाँ अन्य मुमुक्षुजन भी योग-साधना किया करते थे। मुने ! वहाँ तपस्वी बन कर यथा प्राप्त सामग्री से भक्ति-पूर्वक उसने विष्णु की आराधना प्रारम्भ की ॥९॥ नारद ! नित्यप्रति वह जल में डुबकी लगाकर स्नान करता तथा भक्ति- पूर्वक ब्रह्म नाम का उच्चारण करता हुआ सूर्योपस्थान करता था ॥१०॥ इसके अनन्तर आश्रम में आकर स्वयं लाई हुई समिधा, कुश, मृत्तिका, फल, पुष्प, तुलसी पत्र और स्वच्छ जल से भक्ति-भावना में तन्मय होकर एकाग्र भाव से जगत्पति वासुदेव की पूजा करता था ॥११-१२॥ एक दिन जब उस महाभाग ने प्रातःकाल चक्र नदी के जल में स्नान किया और उस जल में ही एकनिष्ठ होकर तीन मुहूर्त तक भगवान् का जप किया ॥१३॥ उसी समय उस नदी के तट पर एक प्यासी हुई आसन्नप्रसवा हरिणी वन से आई । जब वह जल पी चुकी तो उसी समय सब प्राणियों को डराने वाला सिंहनाद सुनाई पड़ा ॥१४-१५॥ सिंह की गर्जना सुनकर वह नदी तट उसके पार जाने के लिए उछली। अधिक ऊँचाई से कूदने के कारण उसका गर्भ नदी में ही गिर पड़ा ॥१६॥ गर्भ से गिरा हुआ वह मृगशावक नदी की धारा में पड़कर वेग से बह चला। मुनि भरत ने उसको उठा लिया ॥१७॥ मुनीन्द्र ! गर्भपात की पीड़ा और ऊँचो भूमि पर छलांग मारने के कारण वह हरिणी गिर पड़ी और मर गई ॥१८॥ नृप तपस्वी वह भरत हरिणी को इस प्रकार मरते देखकर उस मृगशावक को लेकर आश्रम में चला आया ॥१९॥ वह राजा प्रति दिन उस मृग की देखभाल करता था। मुने ! इस प्रकार राजा द्वारा
अष्टचत्वारिंशोऽध्यायः ३१६ पोषणं पुष्यमाणश्च स तेन ववृधे मुने । चचाराश्रमपर्यन्तं तृणानि गहनेषु सः ॥२०॥ दूरं गत्वा च शार्दूलत्रासाद्भयाद्ययौ पुनः । प्रातर्गत्वातिदूरं च सायमायात्याश्रमम् ॥२१॥ पुनश्च भरतस्याभूदाश्रमस्योटजांतरे । तस्य तस्मिन्मृगे दूरसमीपपरिवर्तिनि ॥२२॥ आसीच्चेतः समासक्तं न तथा ह्यच्युते मुने । विमुक्तराज्यतनयः प्रोज्झिताशेषबांधवः ॥२४॥ ममत्वं स चकारोच्चैस्तस्मिन्हरिणपोतके । किं वृकैर्भक्षितो व्याघ्रैः किं सिंहेन निपातितः ॥२५॥ चिरायमाणे निष्क्रांते तस्यासीदिति मानसम् । प्रीतिप्रसन्नवदनः पार्श्वस्थे चाभवन्मृगे ॥२६॥ समाधिभंगस्तस्यासीन्ममत्वाकृष्टचेतसः । कालेन गच्छता सोऽथ कालं चक्रे महीपतिः ॥२७॥ पितेव साश्रं पुत्रेण मृगपोतेन वीक्षितः । मृगमेव तदाद्राक्षीत्त्यजत्प्राणानसावपि ॥२८॥ मृगो बभूव स मुने तादृशीं भावनां गतः । जातिस्मरत्वादुद्विग्नः संसारस्य द्विजोत्तम ॥२९॥ विहाय मातरं भूयः शालग्राममुपाययौ । शुष्कैस्तृणैस्तथा पर्णैः स कुर्वन्नात्मपोषणम् ॥३०॥ मृगत्वहेतुभूतस्य कर्मणो निष्कृतिं ययौ । तत्र चोत्सृष्टदेहोऽसौ जज्ञे जातिस्मरो द्विजः ॥३१॥ सदाचारवतां शुद्धे योगिनां प्रवरे कुले । सर्वविज्ञानसंपन्नः सर्वशास्त्रार्थतत्त्ववित् ॥३२॥ अपश्यत्स मुनिश्रेष्ठः स्वात्मानं प्रकृतेः परम् । आत्मनोऽधिगतज्ञानाद्देवादीनि महामुने ॥३३॥ सर्वभूतान्यभेदेन ददर्श स महामतिः । न पपाठ गुरुप्रोक्तं कृतोपनयनः श्रुतम् ॥३४॥
पालन-पोषण प्राप्त कर वह मृग बढ़ने लगा ॥२० १/२॥ धीरे-धीरे वह आश्रम में इधर-उधर घूमने लगा और घास चरने लगा । जब कभी वह गहन वन में दूर जाता था तब सिंह के भय से फिर लौट आता था ॥२१ १/२॥ प्रातः- काल जंगल में बहुत दूर चरने के लिए चला जाता था, परन्तु सायंकाल आश्रम में लौट आता था और मुनि भरत की कुटिया में विश्राम करता था ॥२२ १/२॥ मुनिवर ! उस मुनि का उस मृग के प्रति चाहे वह समीप रहता था या दूर इतनी अधिक आसक्ति हो गई कि भगवान् की ओर भी इतनी आसक्ति न रही ॥२३ १/२॥ राज्य, पुत्र और सब बन्धु-बान्धवों को छोड़ने वाले उस मुनि की उस हरिण के प्रति अत्यधिक ममता हो गई ॥२४ १/२॥ उसके बाहर जाने पर यदि लौटने में विलम्ब होता था तो मुनि के मन में चिन्ता होती थी कि कहीं मृग को भेड़िये ने तो नहीं मार डाला, बाघ ने कहीं अपना आहार तो नहीं बना डाला अथवा सिंह ने उसको अपना भक्ष्य तो नहीं बना डाला । मृग जब उसकी बगल में बैठा रहता तब तो वह प्रसन्न मुख रहता था ॥२५-२६॥ मृग की ममता से खिंच जाने पर मुनि की समाधि भी भग्न हो जाती थी । धीरे-धीरे समय बीतता गया और उस महीपति का अन्तिम समय आ गया ॥२७॥ मृत्यु के समय जिस प्रकार पुत्र पिता को आंसुओं से युक्त होकर देखता है उसी प्रकार उस मृग-पोत ने मुनि को देखा । मुनि ने भी ममतावश मृत्यु के समय भी मृग को ही देखा ॥२८॥ मुने ! वैसी मृगमय भावना होने के कारण वह जन्मान्तर में मृग ही हुआ । द्विजोत्तम ! उस योनि में भी पूर्व जन्म का ज्ञान होने के कारण वह संसार से उद्विग्न रहता था ॥२९॥ अन्त में वह अपनी माता को छोड़कर शालग्राम के समीप रहने लगा और सूखी पत्तियों और घास को खाकर जीवन बिताने लगा ॥३०॥ इस प्रकार उसके मृग- योनि के कारणीभूत कर्मों का भोग द्वारा नाश हो गया । उस मृग शरीर को छोड़ने के बाद वह जन्मान्तर में सदाचारी और शुद्ध योगी कुल में जातिस्मर (पूर्व जन्म का ज्ञान रखने वाला) ब्राह्मण हुआ ॥३१ १/२॥ वह सब शास्त्रों का मर्मज्ञ, सर्वविज्ञानविद् मुनि श्रेष्ठ ब्राह्मण अपने को प्रकृति (संसार) से परे समझता था ॥३२ १/२॥ महामुने ! वह अध्यात्म ज्ञान के कारण देवता और सब प्राणियों में समान भाव रखता था ॥३३ १/२॥ यज्ञोपवीत होने पर जब गुरुजी उसको शास्त्र पढ़ाते थे तब भी उस पाठ को नहीं पढ़ता था । उसने न तो किसी कर्म का अनुष्ठान ही किया और न तो शास्त्रों का अध्ययन ही ॥३४ १/२॥ बहुत कुछ कहने पर जड़ की भाँति कुछ बोल
३२० नारदीयपुराणम्
न ददर्श च कर्माणि शास्त्राणि जगृहे न च । उक्तोऽपि बहुशः किञ्चिज्जडं वाक्यमभाषत ॥३५॥ तदप्यसंस्कारगुणं ग्राम्यभावोक्तिसंवृतम् । अपध्वस्तवपुः सोऽपि मलिनाम्बरधृङ् मुने ॥३६॥ विलग्नदंतांतरः सर्वैः परिभूतः स नागरैः । संमानेन परां हानि योगर्द्धेः कुरुते यतः ॥३७॥ जनेनावमतो योगी योगसिद्धिं च विंदति । तस्माच्चरेत वै योगी सतां धर्ममदूषयन् ॥३८॥ जना यथावमन्येयुर्गच्छेयुर्नैव संगतिम् । हिरण्यगर्भबचनं विचितयेत्थं महामतिः ॥३९॥ आत्मानं दर्शयामास जडोन्मत्ताकृतिं जने । भुंक्ते कुलमाषवटकान् शाकं वन्यफलं कणान् ॥४०॥ यद्यदाप्नोति स बह्नत्ति वै कालसंभवम् । पितर्युपरते सोऽथ भ्रातृभ्रातृव्यबांधवैः ॥४१॥ कारितः क्षेत्रकर्मादि कदन्नाहारपोधितः । सरूक्षपीनावयवो जडकारी च कर्मणि ॥४२॥ सर्वलोकोपकरणं बभूवाहारवेतनः । तं तादृशमसंस्कारं विप्रानुकृतिविचेष्टितम् ॥४३॥ क्षत्ता सौवीरराजस्य विष्टियोग्यममन्यत । स राजा शिविकारूढो गंतुं कृतमतिर्द्विज ॥४४॥ बभूवेक्षुमतीतीरे कपिलेश्वेराश्रमम् । श्रेयः किमत्र संसारे दुःखप्राये नृणामिति ॥४५॥ प्रष्टुं तं मोक्षधर्मज्ञं कपिलाख्यं महामुनिम् । उवाह शिविकामस्य क्षत्तृर्वचनचोदितः ॥४६॥ नृणां विष्टिगृहीतानामन्येषां सोऽपि मध्यमः । गृहीतो विष्टिना विप्र सर्वज्ञानैकभाजनम् ॥४७॥ जातिस्मरोऽसौ पापस्य क्षयकाम उवाह ताम् । ययौ जडप्रतिस्तत्र युगमात्रावलोकनम् ॥४८॥ कुर्वन्मतिमतां श्रेष्ठस्ते त्वन्ये त्वरितं ययुः । विलोक्य नृपतिः सोऽथ विषमं शिविकागतम् ॥४६॥
देता था सो भी शुद्ध वाक्य नहीं; प्रत्युत ग्रामीणों की भाँति ग्राम्य भाषा का ही प्रयोग करता था । मुने ! वह सदा मैले-कुचैले कपड़े पहन कर लँगड़े-लूले की भाँति बना रहता था ॥३५-३६॥ नागरिक प्रायः उसका अपमान करते थे । यहाँ तक कि मारकर लोगों ने उसके दाँत तोड़ दिये । चूंकि सम्मान से योग सिद्धि में बाधा पड़ती है और लोक से अपमानित योगी सिद्धि प्राप्त करता है। अतएव योगी सज्जनों द्वारा आदृत धर्म की रक्षा करता हुआ आचरण करे ॥३७-३८॥ लोग जितना ही अधिक उसका अपमान करेंगे और उसकी संगति से बचेंगे उतना ही उसका कल्याण होगा । महामति वह योगी भरत ब्रह्मा के इस आदेश का चिन्तन कर लोक में अपने को मूर्ख जड़ की भाँति रखता था ॥३९॥ स्वयं उड़द की रोटी, शाक और जंगली फलों और मोटे अन्न को खाता था। जो कुछ भोजन के समय मिल जाता था उसी को बहुत मानकर खा लेता था । पिता के मर जाने पर उसके भाई- बन्धुओं ने कदन्न खिला-खिलाकर उससे खेती का काम भली-भाँति कराया। रूखे और पुष्ट अंगों वाले बेचारे भरत से, जिसको इच्छा होती थी वही केवल भोजन मात्र देकर अपना काम कराता था ॥४०-४२॥ एक दिन सौवीरराज के सारथि ने उस विप्र के समान आकृति और चेष्टा करने वाले मैले-कुचैले भरत को डोली ढोने (कहार) के योग्य समझा । द्विज ! उस राजा ने सोचा कि डोली पर चढ़कर इक्षुमती के तीर पर कपिल मुनि के श्रेष्ठ आश्रम में चलना चाहिए। इस दुःखमय संसार में मनुष्य का कल्याण कैसे हो सकता है, इसी प्रश्न को पूछने के लिए महामुनि कपिल के पास जाना चाहता था । सारथि की आज्ञा के अनुसार वह ब्राह्मण डोली ढोने लगा ॥४३-४६॥ विना मजदूरी के काम करने वाले कहारों के साथ वह सर्वज्ञ ब्राह्मण भी पकड़ा गया। पूर्व जन्म का ज्ञानी वह ब्राह्मण अपने पापों के क्षय के लिए उस कर्म को उचित समझकर पालकी ढोने लगा । बुद्धिमानों में श्रेष्ठ वह ब्राह्मण पालकी के डंडे तक आगे की भूमि देखता हुआ मन्द गति से चलता था । अन्य लोग तेजी से चल रहे थे ॥४७-४८॥ पालकी की चाल में कुछ विषमता देखकर राजा ने कहा--यह क्या, ऐ कहारो, सीधी चाल से चलो। फिर पालकी की गति में वैसी ही विषमता
अष्टचत्वारिंशोऽध्यायः ३२१ किमेतदित्याह समं गम्यतां शिबिकावहाः । पुनस्तथैव शिबिकां विलोक्य विषमां हसन् ॥५०॥ नृपः किमेतदित्याह भवद्भिर्गम्यतेऽन्यथा । भूपतेर्वदतस्तस्य श्रुत्वेत्थं बहुशो वचः । शिबिकावाहकाः प्रोचुरयं यातीत्यसत्वरम् ॥५१॥ राजोवाच किं श्रांतोऽस्यल्पमध्वानं त्वयोढा शिबिका मम । किमायासासहो न त्वं पीवा नासि निरीक्ष्यसे ॥५२॥ ब्राह्मण उवाच नाहं पीवा न चैवोढा शिबिका भवतो मया । न श्रांतोऽस्मि न चायासो वोढान्योऽस्ति महीपते ॥५३॥ राजोवाच प्रत्यक्षं दृश्यते पीवा त्वद्यपि शिबिका त्वयि । श्रमश्च भारोद्वहने भवत्येव हि देहिनाम् ॥५४॥ ब्राह्मण उवाच प्रत्यक्षं भवता भूप यद्दृष्टं मम तद्वद । बलवानबलश्चेति वाच्यं पश्चाद्विशेषणम् ॥५५॥ त्वयोढा शिबिका चेति त्वय्यद्यापि च संस्थिता । मिथ्या तदप्यत्र भवान् शृणोतु वचनं मम ॥५६॥ भूमौ पादयुगे चाथ जंघे पादद्वये स्थिते । ऊरू जंघाद्वयावस्थौ तदाधारं तथोदरम् ॥५७॥ वक्षःस्थलं तथा बाहू स्कंधौ चोदरसंस्थितौ । स्कंधाश्रितेयं शिबिका ममाधारोऽत्र किंकृतः ॥५८॥ शिबिकायां स्थितं चेदं देहं त्वदुपलक्षितम् । तत्र त्वमहमप्येतद्युच्यते चेदमन्यथा ॥५९॥
देखकर राजा हँसता हुआ बोला--क्यों, क्या बात है ? तुम लोग क्यों समगति से नहीं चलते ? राजा के बार- बार वैसा कहने पर जड़ भरत की ओर संकेत करके कहारों ने कहा--यह धीरे-धीरे चलता है ॥४६-५१॥ राजा बोला--क्यों थक गए हो क्या ? अरे ! अभी तो थोड़ी ही दूर पालकी आई है ? क्या तुम परिश्रम से थक जाते हो ? देखने में तो मोटे दिखाई दे रहे हो ?॥५२॥ ब्राह्मण बोला-न तो मैं मोटा हूँ और न मैंने तुम्हारी पालकी ढोई, न थका हुआ हूँ और न मुझे कोई खेद ही है । महीपते ! पालकी को ढोने वाला तो कोई दूसरा ही है ॥५३॥ राजा ने कहा- स्पष्टतः तुम मोटे दिखाई देते हो, पालकी भी अब तक तुम्हारे कन्धे पर पड़ी हुई है और बोझा ढोने में प्राणी को श्रम होता ही है ॥५४॥ ब्राह्मण बोला-भूप, तुमने जो कुछ प्रत्यक्ष देखा है वह कहो, पीछे बली और दुर्बल विशेषण लगाना ॥५५॥ तुमने जो अभी कहा कि मैंने पालकी ढोई है और अब तक पालकी मेरे कन्धे पर है, यह सब मिथ्या है। कैसे ? इसके लिए भी मेरी बातें सुनो ॥५६॥ ये दोनों पैर भूमि पर हैं, दोनों जंघे पैर पर स्थित हैं, कटि और नितम्ब जंघे पर अवलम्बित हैं, कटि भी उदर का आधार है, उदर छाती का, दोनों भुजायें और कन्धे उदर के ही सहारे पर हैं । शिविका कन्धे पर है, तो इसमें मैं किसका आधार हूँ ? ॥५७-५८॥ पालकी में स्थित तुम्हारा शरीर है ऐसा जो समझते हो यह भी भ्रम ही है । उस पालकी में तुम हो, मैं हूँ, यह कहना भी अनुपयुक्त है । पार्थिव ! मैं, तुम आदि का जो व्यवहार यहाँ किया जा रहा है वह भी मिथ्या ही है । पार्थिव ! मैं, तुम और ४१-ना० पु०
३२२ नारदीयपुराणम् अहं त्वं च तथान्ये च भूतैरुह्याश्च पार्थिव। गुणप्रवाहपतितो भूतवर्गोऽपि यात्ययम् ॥६०॥ कर्मवश्या गुणाश्चैते सत्त्वाद्याः पृथिवीपते। अविद्यासंचितं कर्म तच्चाशेषेषु जंतुषु ॥६१॥ आत्मा शुद्धोऽक्षरः शांतो निर्गुणः प्रकृते परः। प्रवृद्ध्यपचयौ न स्त एकस्याखिलजन्तुषु ॥६२॥ यदा नोपचयस्तस्य नचैवापचयो नृप। तदापि बालिशोऽसि त्वं कया युक्त्या त्वयेरितम् ॥६३॥ भूपादजंघाकट्यूरुजठरादिषु संस्थिता। शिविकेयं यदा स्कंधे तदा भारः समस्त्वया ॥६४॥ तथान्यजंतुभिर्भूप शिविकोढा न केवलम्। शैलद्रुमगृहोत्थोऽपि पृथिवीसंभवोऽपि च ॥६५॥ यथा पुंसः पृथग्भावः प्राकृतैः करणैर्नृप। सोढव्यः सुमहान्भारः कतमो नृप ते मया ॥६६॥ यद्द्रव्यो शिबिका चेयं तद्द्रव्यो भूतसंग्रहः। भवतो मेऽखिलस्यास्य समत्वेनोपबृंहितः ॥६७॥ सनंदन उवाच एवमुक्त्वाऽभवन्मौनी स वहञ्शिबिकां द्विजः। सोऽपि राजाऽवतीर्योर्व्यां तत्पादौ जगृहे त्वरन् ॥६८॥ राजोवाच भो भो विसृज्य शिबिकां प्रसादं कुरु मे द्विज। कथ्यतां को भवानत्र जालरूपधरः स्थितः ॥६९॥ यो भवान्यदपत्यं वा यदागमनकारणम्। तत्सर्वं कथ्यतां विद्वन्मह्यं शुश्रूषवे त्वया ॥७०॥ ब्राह्मण उवाच श्रूयतां कोऽहमित्येतद्वक्तुं भूप न शक्यते। उपयोगनिमित्तं च सर्वत्रागमनक्रिया ॥७१॥ सुखदुःखोपभोगौ तु तौ देहाद्युपपादकौ। धर्माधर्मोद्भवौ भोक्तुं जंतुर्देहादिमृच्छति ॥७२॥ दूसरे सभी प्राणी सभी भूतों (पंच महाभूतों) द्वारा ढोये जाते हैं। पृथिवीपते ! यह भूत-समूह भी गुण-प्रवाह के वश में होकर कार्यसंचालन करता है ॥५६-६०॥ सत्त्व आदि गुण-प्रवाह भी कर्म के वश में रहते हैं। अविद्या-संचित कर्म अशेष जन्तुओं में रहता है ॥६१॥ आत्मा शुद्ध, अक्षर, शान्त, निर्गुण और प्रकृति से परे है। वह एक ही सम्पूर्ण जीवों में व्याप्त है। उसकी वृद्धि अथवा ह्रास कभी नहीं होता ॥६२॥ नृप ! जब उस आत्मा में ह्रास और वृद्धि नहीं होती, तब तुमने किस युक्ति से ऐसा कहा है कि तुम मोटे हो ॥६३॥ यदि क्रमशः पृथ्वी, पैर, जंघा, ऊरु, कटि तथा उदर आदि अंगों पर स्थित हुए कंधे के ऊपर रखी हुई यह शिविका मेरे लिए भार रूप हो सकती है तो उसी प्रकार तुम्हारे लिए भी तो हो सकती है ॥६४॥ राजन् ! इस युक्ति से तो अन्य समस्त जीवों ने भी न केवल पालकी उठा रखी है, बल्कि सम्पूर्ण पर्वत, वृक्ष, गृह और पृथ्वी आदि का भार भी अपने ऊपर ले रखा है। राजन् ! जिस द्रव्य से यह पालकी बनी हुई है, उसी से यह तुम्हारा, मेरा अथवा अन्य सबका शरीर भी बना है, जिसमें सबने ममता बढ़ा रखी है ॥६५-६७॥ सनन्दन बोले-यह कह कर वह ब्राह्मण मौन हो गया और शिविका को पूर्व की भाँति ढोने लगा। उस राजा ने भी पृथ्वी पर उतर कर शीघ्र ही उस ब्राह्मण के पैर पकड़ लिये ॥६८॥ राजा ने कहा-हे द्विज ! पालकी को छोड़ दीजिए और मेरे ऊपर कृपा कीजिए। कहिए आप कौन हैं जो इस कपट वेश में छिपे हुए हैं ॥६९॥ आप कौन हैं आपके पिता का नाम क्या है, आप किसलिए इधर-उधर घूम रहे हैं ? विद्वन् ! आप इन सब बातों का उत्तर मुझ सेवक को दीजिए ॥७०॥ ब्राह्मण बोला--भूप ! सुनो। मैं कौन हूँ, यह कह नहीं सकता। सर्वत्र सबका आगमन किसी प्रयोजन से ही होता है ॥७१॥ सुख-दुःख का उपभोग ही शरीर धारण करने का कारण है। जीव धर्म और अधर्म के
अष्टचत्वारिंशोऽध्यायः ३२३ सर्वस्यैव हि भूपाल जंतोः सर्वत्र कारणम् । धर्माधर्मौ यतस्तस्मात्कारणं पृच्छ्यते कुतः ॥७३॥ राजोवाच धर्माधर्मौ न संदेहः सर्वकार्येषु कारणम् । उपभोगनिमित्तं च देहाद्देहांतरागमः ॥७४॥ यत्त्वेतद्भवता प्रोक्तं कोऽहमित्येतदात्मनः । वस्तुं न शक्यते श्रोतुं तन्ममेच्छा प्रवर्तते ॥७५॥ योऽस्ति योऽहमिति ब्रह्मन्कथं वक्तुं न शक्यते । आत्मन्येव न दोषाय शब्दोऽहमिति यो द्विज ॥७६॥ ब्राह्मण उवाच शब्दोऽहमिति दोषाय नात्मन्येवं तथैव तत् । अनात्मन्यात्मविज्ञानं शब्दो वा श्रुतिलक्षणः ॥७७॥ जिह्वा ब्रवीत्यहमिति दंतौष्ठतालुकं नृप । एतेनाहं यतः सर्वे वाङ्निष्पादनहेतवः ॥७८॥ किं हेतुभिर्वदत्येषा वागेवाहमिति स्वयम् । तथापि वागहमेतद्वक्तुमित्थं न युज्यते ॥७६॥ पिंडः पृथग्यतः पुंसः शिरः पाण्यादिलक्षणः । ततोऽहमिति कुर्वैनां संज्ञां राजन्करोम्यहम् ॥८०॥ यद्यन्योऽस्ति परः कोऽपि मत्तः पार्थिवसत्तम । न देहोऽहमयं चान्ये वक्तुमेवमपीष्यते ॥८१॥ यदा समस्तदेहेषु पुमानेको व्यवस्थितः । तदा हि को भवान्कोऽहमित्येतद्विफलं वचः ॥८२॥ त्वं राजा शिविका चेयं वयं वाहाः पुरःसराः । अयं च भवतो लोको न सदेतन्नृपोच्यते ॥८३॥ वृक्षाद्दारु ततश्चेयं शिविका त्वदधिष्ठिता । क्व वृक्षसंज्ञा वै तस्या दारुसंज्ञाथवा नृप ॥८४॥ वृक्षारूढो महाराजो नायं वदति ते जनः । न च दारुणि सर्वस्त्वां ब्रवीति शिविकागतम् ॥८५॥ उत्पन्न सुख-दुःख के भोग के लिए शरीर प्राप्त करता है ॥७२॥ भूपाल ! सब जन्तुओं की उत्पत्ति के कारण धर्म और अधर्म ही हैं। तो फिर कारण क्यों पूछ रहे हो ? ॥७३॥ राजा बोला—निस्सन्देह धर्म और अधर्म सब कार्यों के कारण हैं और केवल उपभोग ही जन्मान्तर प्राप्त करने का कारण है ॥७४॥ आपने अभी जो यह कहा है कि 'मैं कौन हूँ यह नहीं कह सकता' सो इसको सुनने की इच्छा प्रबल रूप से हो रही है ॥७५॥ ब्रह्मन् ! जो आपका परिचय है, उसको कहने में आप क्यों नहीं समर्थ हो रहे हैं ? द्विज ! अपने विषय में मैं ऐसा हूँ, यह कहने से कुछ दोष नहीं होता ॥७६॥ ब्राह्मण बोला—अहम् (मैं) शब्द का प्रयोग आत्मा के विषय में करने से कुछ दोष नहीं, परन्तु अनात्मा में आत्मविज्ञान हो जाने के कारण अमात्मक ज्ञान हो जाने से 'मैं' शब्द का प्रयोग भ्रान्ति है। नृप ! जीभ 'मैं' ऐसा कहती है, परन्तु दाँत, ओठ और तालु सब शब्दोच्चारण में सहायक हैं। तो क्या वाणी अपने को 'मैं' ऐसा कहती है ? तथापि मैं वाणी हूँ, यह कहना सर्वथा अनुचित है ॥७७-७९॥ इसके अतिरिक्त 'अहम्' ऐसा कहना सर्वथा अनु- चित है, क्योंकि शिर, हाथ आदि से युक्त शरीर-पिंड से मनुष्य का आत्मा सर्वथा पृथक है, राजन् ! तो मैं 'मैं' शब्द का प्रयोग किसके लिए करू । यदि मुझसे अतिरिक्त कोई और भी सजातीय आत्मा हो तो भी 'यह मैं हूँ और यह अन्य है'—ऐसा कहना उचित हो सकता था। जब समस्त शरीर में एक ही पुरुष विराजमान है तब आप कौन हैं, मैं कौन हूँ, इस विषय में कुछ कहना व्यर्थ होगा ॥८०-८२॥ तुम राजा हो, यह पालकी है, हम सभी इसके ढोने वाले हैं, यह राज्य आपका है, ये सब बातें सत्य नहीं कही जा सकती हैं ॥८३॥ वृक्ष से लकड़ी आई, उसकी पालकी बनी जिस पर तुम बैठे हो। नृप ! तुम्हीं बताओ कि इसका नाम वृक्ष रखना ठीक होगा या लकड़ी ॥८४॥ महाराज वृक्ष पर बैठे हैं ऐसा तुम्हारे सेवक नहीं कहते हैं और न तो शिविका में बैठने के कारण तुमको लकड़ी पर बैठा हुआ ही कहा जाता है। शिविका दारु का समूह है और अपने लिए एक विशेष नाम का
३२४ नारदीयपुराणम् शिबिकादारुसंघातो स्वनामस्थितिसंस्थितः । अन्विष्यतां नृपश्रेष्ठानन्ददा शिविका त्वया ॥८६॥ एवं छत्रं शलाकाभ्यः पृथग्भावो विमृश्यताम् । क्व जातं छत्रमित्येष न्यायस्त्वयि तथा मयि ॥८७॥ पुमान्स्त्री गौरजा वाजी कुंजरो विहगस्तरुः । देहेषु लोकसंज्ञेयं विज्ञेया कर्महेतुषु ॥८८॥ पुमान्न देवो न नरो न पशुर्न च पादपः । शरीराकृतिभेदास्तु भूपते कर्मयोनयः ॥८९॥ वस्तु राजेति यल्लोके यच्च राजभटात्मकम् । तथान्यच्च नृपेत्थं तन्न सत्यं कल्पनामयम् ॥९०॥ यस्तु कालांतरेणापि नाशसंज्ञामुपैति वै । परिणामादिसंभूतं तद्वस्तु नृप तच्च किम् ॥९१॥ त्वं राजा सर्वलोकस्य पितुः पुत्रो रिपो रिपुः । पत्न्याः पतिः पिता सूनोः कस्त्वं भूप वदाम्यहम् ॥९२॥ त्वं किमेतच्छिरः किं नु शिरस्तव तथोदरम् । किमु पादादिकं त्वेतन्नैवं किं ते महीपते ॥९३॥ समस्तावयवेभ्यस्त्वं पृथग्भूतो व्यवस्थितः । कोऽहमित्यत्र निपुणं भूत्वा चिंतय पार्थिव ॥९४॥ एवं व्यवस्थिते तत्त्वे मयाहमिति भावितुम् । पृथक्चरणनिष्पाद्यं शक्यं तु नृपते कथम् ॥९५॥ इति श्रीबृहन्नारदीयपुराणे पूर्वभागे बृहदुपाख्याने द्वि० पा० अष्टचत्वारिंशोऽध्यायः ॥४८॥ आश्रय लेकर स्थित है। नृपश्रेष्ठ ! इसलिए तुम दारु-समूह से अलग आनन्ददायक पालकी ढूँढ़ो। इसी प्रकार शलाकादि से पृथक् छत्र भी ढूँढ़ो। छत्र कहाँ गया, यह प्रश्न तुम्हारे और मेरे लिए भी समान है ॥८५-८७॥ पुरुष, स्त्री, गौ, बकरी, अश्व, हाथी, पक्षी और वृक्ष आदि संज्ञायें कर्म के द्वारा प्राप्त शरीर की ही हैं ॥८८॥ भूप ! वस्तुतः पुरुष, मनुष्य, पशु और वृक्ष आदि संज्ञायें केवल शरीर और आकृति के भेद के कारण हैं, जो कि कर्म के कारण है ॥८९॥ इस लोक में राजा, राजसेवक तथा अन्य जो संज्ञायें हैं ये सब केवल कल्पना ही हैं सत्य नहीं ॥९०॥ जो कालान्तर में नष्ट हो जाते और पुनः नवीन संज्ञा (नाम) प्राप्त करते हैं। नृप ! परिणाम आदि के कारण नयी संज्ञा नहीं प्राप्त करती वही परमार्थ वस्तु है। वह क्या है इसको तो देखो । तुम अखिल लोक के राजा हो, किसी पिता के पुत्र हो, किसी शत्रु के शत्रु हो, किसी पत्नी के पति और किसी पुत्र के पिता हो, अब तुम को बता रहा हूँ कि तुम कौन हो। तुम क्या यह शिर हो ? नहीं, शिर तो तुम्हारा है और उदर भी तुम्हारा ही है। महीपते ! क्या ये पैर, हाथ आदि तुम्हारे नहीं हैं ? वस्तुतः तुम इन समस्त शरीरावयवों से पृथक् स्थित हो। पार्थिव ! तुम कौन हो, इस विषय को सावधान हो कर विचारो। इस प्रकार रहस्यमय होने के कारण 'मैं कौन हूँ' इस विषय में मैं 'चरण आदि शरीर अवयवों से पृथक हूँ' ऐसा कहना कैसे सरल कहा जा सकता है ॥९१-९५॥ श्रीनारदीय महापुराण के पूर्वार्द्ध में अड़तालीसवां अध्याय समाप्त ॥४८॥
अथैकोनपञ्चाशत्तमोऽध्यायः सनंदन उवाच निशम्य तस्येति वचः परमार्थसमन्वितम् । प्रश्रयावनतो भूत्वा तमाह नृपतिर्द्विजम् ॥१॥ राजोवाच भगवंस्त्वत्तया प्रोक्तं परमार्थमयं वचः । श्रुते तस्मिन्भ्रमंतीव मनसो मम वृत्तयः ॥२॥ एतद्विवेकविज्ञानं यदि शेषेषु जंतुषु । भवता दर्शितं विप्र तत्परं प्रकृतेर्महत् ॥३॥ नाहं वहामि शिविकां शिविका मयि न स्थिता । शरीरमन्यदस्मत्तो येनेयं शिविका धृता ॥४॥ गुणप्रवृत्तिर्भूतानां प्रवृत्तिः कर्मचोदिता । प्रवर्तंते गुणाश्चैते किं ममेति त्वयोदितम् ॥५॥ एतस्मिन्परमार्थज्ञ मम श्रोत्रपथं गते । मनो विह्वलतामेति परमार्थरतां गतम् ॥६॥ पूर्वमेव महाभाग कपिलर्षिमहं द्विज । प्रष्टुमभ्युद्यतो गत्वा श्रेयः किंत्वत्र संशये ॥७॥ तदंतरे च भवता यदिदं वाक्यमीरितम् । तेनैव परमार्थं त्वयि चेतः प्रधावति ॥८॥ कपिलर्षिर्भगवतः सर्वभूतस्य वै किल । विष्णोरंशो जगन्मोहनाशाय समुपागतः ॥९॥ स एव भगवान्नूनमस्माकं हितकाम्यया । प्रत्यक्षतामनुगतस्तथैतद्भवतोच्यते ॥१०॥ तन्मह्यं मोहनाशाय यच्छ्रेयः परमं द्विज । तद्वदाखिलविज्ञानजलवीच्युदधिर्भवान् ॥११॥ अध्याय ४६ परमार्थ का निरूपण सनंदन बोले--भरत की उपर्युक्त परमार्थ तत्त्व से भरी हुई व्याख्या को सुनकर राजा ने नम्र होकर पुनः उनसे पूछा ॥१॥ राजा ने कहा--भगवन्, आपने जो कुछ परम तत्त्व की बात कही उसको सुनकर मेरे मन की वृत्तियाँ अभी भ्रम में पड़ी हुई सी हैं ॥२॥ इस प्रकार का विवेक-विज्ञान यदि शेष जन्तुओं के विषय में हो जाय तब तो यह प्रकृति से परे का ज्ञान है ॥३॥ मैं पालकी नहीं ढोता, न तो वह मुझ पर अवस्थित है । शरीर हमसे पृथक् है, जिसने इस पालकी को धारण किया है । भूतों की प्रवृत्ति गुणों की प्रेरणा है और गुण कर्म से प्रेरित होकर प्रवृत्त होते हैं । इसलिए मेरा कर्तव्य क्या है, यह आपने कहा है । परमार्थज्ञ ! इस गूढ़ तत्त्व के सुन लेने से परमार्थ के ज्ञान के पूर्व से ही उत्सुक मेरा मन इस समय और अधिक विह्वल हो रहा है ॥४-६॥ द्विज ! मैं पहले ही संशय में पड़कर श्रेयस्कर तत्त्व को पूछने के लिए कपिल ऋषि के यहाँ जा रहा था । इसी बीच आपने ऐसी रहस्यमय बातें सुनाईं । इस कारण अब आपसे ही परमार्थ तत्त्व को जानने की इच्छा से मेरा मन आप ही की ओर उन्मुख हो रहा है ॥७-८॥ कपिल ऋषि अखिल प्राणियों के ईश विष्णु के अंश हैं, जो जगत् का मोह दूर करने के लिए इस लोक में आए हुए हैं । इसलिए आप ऐसी बातें कहते हैं ॥९-१०॥ द्विज ! इसलिए हमारे मोह नाश के लिए जिस परम श्रेय को आप उचित समझते हों, उसको कहिए । क्योंकि आप सम्पूर्ण विज्ञानरूपी तरंगों से परिपूर्ण समुद्र हैं ॥११॥
३२६ नारदीयपुराणम् ब्राह्मण उवाच भूयः पृच्छसि किं श्रेयः परमार्थेन पृच्छसि । श्रेयांसि परमार्थानि ह्यशेषाण्येव भूपते ॥१२॥ देवताराधनं कृत्वा धनसंपदमिच्छति । पुत्रानिच्छति राज्यं च श्रेयस्तस्यैव तन्नृप ॥१३॥ विवेकिनस्तु संयोगः श्रेयोऽसौ परमात्मना । कर्मयज्ञादिकं श्रेयः स्वलोकफलदायि यत् ॥१४॥ श्रेयः प्रधानं च फले तदेवानभिसंहिते । आत्मा ध्येयः सदा भूप योगयुक्तैस्तथा परैः ॥१५॥ श्रेयस्तस्यैव संयोगः श्रेयो यः परमात्मनः । श्रेयांस्येवमनेकानि शतशोऽथ सहस्रशः ॥१६॥ संत्यत्र परमार्थास्तु न त्वेते श्रूयतां च मे । धर्मोऽर्थं त्यजते किं तु परमार्थो धनं यदि ॥१७॥ व्ययश्च क्रियते कस्मात्कामप्राप्त्युपलक्षणः । पुत्रश्चेत्परमार्थाह्वयः सोऽप्यन्यस्य नरेश्वर ॥१८॥ परमार्थभूतः सोऽन्यस्य परमार्थो हि नो पिता । एवं न परमार्थोऽस्ति जगत्यत्र चराचरे ॥१९॥ परमार्थो हि कार्याणि करणानामशेषतः । राज्यादिप्राप्तिरन्बोक्ता परमार्थतया यदि ॥२०॥ परमार्था भवन्त्यत्र न भवंति च वै ततः । ऋग्यजुः सामनिष्पाद्यं यज्ञकर्म मतं तव ॥२१॥ परमार्थभूतं तत्रापि श्रूयतां वदतो मम । यत्तु निष्पाद्यते कार्यं मृदा कारणभूतया ॥२२॥ तत्कारणानुगमनाज्जायते नृप मृन्मयम् । एवं विनाशिभिर्द्रव्यैः समिदाज्यकुशादिभिः ॥२३॥ निष्पाद्यते क्रिया या तु सा भवित्री विनाशिनी । अनाशी परमार्थस्तु प्राज्ञैरभ्युपगम्यते ॥२४॥ यत्तु नाशि न संदेहो नाशिद्रव्योपपादितम् । तदेवाफलदं कर्म परमार्थो न भेदवान् ॥२५॥ मुक्तिसाधनभूतत्वात्परमार्थो न साधनम् । ध्यानमेवात्मनो भूप परमार्थशब्दिदंतम् ॥२६॥
ब्राह्मण बोला- फिर तुम श्रेय क्या है, इसको पूछ रहे हो, यदि परमार्थतः पूछते हो तब तो हे भूपते ! सम्पूर्ण परमार्थ ही श्रेय हैं। नृप ! देवता की उपासना से धन, सम्पत्ति, पुत्र और राज्य की जो इच्छा करते हैं उनके लिए वही श्रेय है ॥१२-१३॥ ज्ञानी पुरुषों के लिए परमात्मा का संयोग (प्राप्ति) ही श्रेय है । कर्मयज्ञ आदि भी श्रेय ही हैं, क्योंकि वे स्वर्ग लोकरूपी फल को देने वाले हैं ॥१४॥ निकट न रहने वाले परम फल में श्रेय की प्रधानता रहती है । भूपाल ! अन्य योगियों ने आत्मा को ही सदा अपना ध्येय माना है तो परमात्मा का जो संयोग है वही उनका श्रेय है ॥१५॥ इस प्रकार श्रेय के अनेकों (सैकड़ों और सहस्रों) भेद हैं । श्रेय इतने हैं, परन्तु ये परमार्थ श्रेय नहीं हैं। जो परमार्थ है, उसको मुझसे सुनो ॥१६$\frac{१}{२}$॥ यदि धन को परमार्थ माना जाय तो धर्म के लिए उसका त्याग क्यों किया जाता तथा काम प्राप्ति के लिए धन का व्यय क्यों किया जाता है ? तब नरेश्वर ! पुत्र को परमार्थ कैसे माना जाय, क्योंकि वह भी तो दूसरे का परमार्थभूत है । इसी प्रकार पिता भी परमार्थ भूत नहीं है, वह भी अन्य का ही परमार्थ है । इसलिए नरेश्वर ! इस चराचर जगत् में परमार्थ नहीं है ॥१७-१६॥ परमार्थ अशेष कारणों का एकमात्र कार्य है अर्थात् संसार का एकमात्र प्राप्य है। यदि राज्य आदि का पाना परमार्थ माना जाय तो ऋग्-यजुस् और साम द्वारा प्रतिपादित यज्ञादि कर्म परमार्थ की श्रेणी में नहीं आते ॥२०-२१॥ परमार्थ भूत जो तत्त्व है, उसको मैं कह रहा हूँ, सुनो । राजन् ! कारणभूत मिट्टी से जो कार्य (घट) उत्पन्न होता है, वह कारण का अनुगमन करने से मृत्तिका स्वरूप ही समझा जाता है। इसी प्रकार समिधा, कुश आदि विनाशीील कारणों से जो कार्य उत्पन्न होगा वह भी विनश्वर होगा ॥२२-२३$\frac{१}{२}$॥ प्राज्ञ व्यक्ति परमार्थ को अनश्वर मानते हैं। जो क्षणभंगुर पदार्थों से ही बनता है, वह अवश्य ही क्षणभंगुर होता है । तो यह मेरा मत है कि जो किसी प्रकार के फल (प्रत्यक्ष) को न देने वाला कर्म है, वही परमार्थ है। परमार्थ स्वयं मुक्ति का साधनभूत होने के कारण अन्य किसी का साधन नहीं है । भूप ! यदि आत्मा के ध्यान
एकोनपञ्चाशत्तमोऽध्यायः ३२७ भेदकारि परेष्वस्तु परमार्थो न भेदवान् । परमात्मनिनोयोगः परमार्थ इतीष्यते ॥२७॥ मिथ्यैतदन्यद्द्रव्यं हि नैतद्द्रव्यमयं यतः । तस्माच्छ्रेयांस्यशेषाणि नृपैतानि न संशयः ॥२८॥ परमार्थस्तु भूपाल संक्षेपाच्छ्रूयतां मम । एको व्यापी समः शुद्धो निर्गुणप्रकृतेः परः ॥२९॥ जन्मवृद्ध्यादिरहित आत्मा सर्वगतो नृप । परिज्ञानमयो सद्भिर्नामजात्यादिभिर्विभुः ॥३०॥ न योगवान्न युक्तोऽभून्नैव पार्थिव योक्ष्यति । तस्यात्मपरदेहेषु सतोऽप्येकयमयं हि तत् ॥३१॥ विज्ञानं परमार्थोऽसौ वेत्ति नोऽतथ्यदर्शनः । वेणुरंध्रविभेदेन भेदः षड्जादिसंज्ञितः ॥३२॥ अभेदो व्यापिनो वायोस्तथा तस्य महात्मनः । एकत्वं रूपभेदश्च बाह्यकर्मप्रवृत्तिजः ॥२३॥ देवादिभेदमध्यास्ते नास्त्येवाचरणो हि सः । शृण्वत्र भूप प्राग्वृत्तं यद्गीतमृभुना भवेत् ॥३४॥ अवबोधं जनयतो निदाघस्य द्विजन्मनः । ऋभुर्नामाऽभवत्पुत्रो ब्रह्मणः परमेष्ठिनः ॥३५॥ विज्ञाततत्त्वसद्भावो निसर्गादेव भूपते । तस्य शिष्यो निदाघोऽभूत्पुलस्त्यतनयः पुरा ॥३६॥ प्रादादशेषविज्ञानं स तस्मै परया मुदा । अवाप्तज्ञानतत्त्वस्य न तस्याद्वैतवासना ॥३७॥ स ऋभुस्तर्कयामास निदाघस्य नरेश्वर । देविकायास्तटे वीर नगरं नाम वै पुरम् ॥३८॥ समृद्धमतिरम्यं च पुलस्त्येन निवेशितम् । रम्योपवनपर्यन्तं स तस्मिन्पार्थिवोत्तम ॥३९॥ निदाघनामयोगज्ञस्तस्य शिष्योऽभवत्पुरा । दिव्ये वर्षसहस्रे तु समतीतेऽथ तत्पुरम् ॥४०॥ जगाम स ऋभुः शिष्यं निदाघमवलोकितुम् । स तस्य वैश्वदेवांते द्वारालोकनगोचरः ॥४१॥ को ही परमार्थ शब्द का अर्थ माना जाय तो वह दूसरे से आत्मा का भेद करने वाला है; किन्तु परमार्थ में भेद नहीं होता । परमार्थ और आत्मा का योग ही परमार्थ कहा जाता है । अन्य द्रव्य मिथ्या है क्योंकि परमार्थ द्रव्यमय नहीं है । अतः राजन् ! निःसन्देह ये सब श्रेय ही हैं, परमार्थ नहीं । भूपाल ! अब मैं संक्षेप से परमार्थ का वर्णन करता हूँ, सुनो ॥२४-२८॥ नरेश्वर ! आत्मा एक, व्यापक, सम, शुद्ध, निर्गुण और प्रकृति से परे है । उसमें जन्म और वृद्धि आदि विकार नहीं हैं । वह सर्वत्र व्यापक तथा परम ज्ञानमय है । असत् नाम और जाति आदि से उस सर्वव्यापक परमात्मा का न कभी संयोग हुआ, न है और न होगा ही । वह अपने और दूसरे के शरीर में विद्यमान रहते हुए भी एक ही है ॥२६-३१॥ इस प्रकार का जो विशेष ज्ञान है वही परमार्थ है । द्वैत भावना रखने वाले पुरुष तो अपरमार्थदर्शी ही हैं । जैसे बाँसुरी में एक ही वायु अभेद भाव से व्याप्त है, किन्तु उसके छिद्रों के भेद से उसमें षड्ज, ऋषभ आदि स्वरों का भेद हो जाता है, उसी प्रकार उस एक ही परमात्मा के देव, मनुष्य आदि अनेक भेद प्रतीत होते हैं । उस भेद की स्थिति तो अविद्या के आवरण तक ही सीमित है ॥३२-३३३॥ भूपाल ! इस विषय में ऋभु ऋषि का जो प्राचीन ऐतिहासिक उपाख्यान है, उसको सुनो । द्विजन्मा निदाघ को ज्ञान का प्रकाश देने वाले ऋभु परमेष्ठी ब्रह्मा के पुत्र थे ॥३४-३५॥ भूपते ! स्वभाव से ही समस्त तत्त्वों के ज्ञाता थे । प्राचीन काल में पुलस्त्य-तनय निदाघ उनका शिष्य था ॥३६॥ उन्होंने प्रसन्न होकर अपने शिष्य को सम्पूर्ण ज्ञान दे डाला । परन्तु सम्पूर्ण तत्त्वों को जान लेने पर भी निदाघ में अद्वैत भावना नहीं हुई ॥३७॥ नरेश्वर ! ऋभु ने निदाघ की इस स्थिति को ताड़ लिया । वीर ! देविका नदी के तट पर नागर नाम का एक विशाल नगर था । वह अत्यन्त मनोहर और समृद्धिशाली था जिसको पुलस्त्य ने बसाया था ॥३८३॥ नृपवर्य ! रम्य उपवनों से सुशोभित उस नगर में वह योगविद् निदाघ रहता था । एक दिन दिव्य हजार वर्ष बीत जाने पर ऋषि ऋभु अपने शिष्य निदाघ को देखने के लिए उस पुर में गए । उसने वैश्वदेव विधि करने के उपरान्त गुरुदेव को द्वार पर आया हुआ देखा और आदर के साथ उनका स्वागत कर घर में ले गया ॥३९-४१३॥
३२८ नारदीयपुराणम् स्थितस्तेन गृहीतार्थो निजवेश्म प्रवेशितः । प्रक्षालितांघ्रिपाणिं च कृतासनपरिग्रहम् ॥४२॥ उवाच स द्विजश्रेष्ठो भुज्यतामिति सादरम् । ऋभुरुवाच ॥४३॥ भो विप्रवर्य भोक्तव्यं यदत्र भवतो गृहे तत्कथ्यतां कदन्नेषु न प्रीतिः सततं मम । निदाघ उवाच सक्तुयावकव्रीहीनामपूपानां च मे गृहे । ॥४४॥ यद्रोचते द्विजश्रेष्ठ तावद्भुंक्ष्व यथेच्छया । ऋभुरुवाच ॥४५॥ कदन्नानि द्विजैतानि मिष्टमन्नं प्रयच्छ मे संयावपायसादीनि चेक्षुका रसवंति च । निदाघ उवाच ॥४६॥ गृहे शालिनि मद्गेहे यत्किंचिदतिशोभनम् भोज्येषु साधनं मिष्टं तेनास्यान्नं प्रसाधय । इत्युक्ता तेन सा पत्नी मिष्टमन्नं द्विजस्य तत् ॥४७॥ प्रसाधितवती तद्वै भर्तुर्वचनगौरवात् । तं भुक्तवंतमिच्छातो मिष्टमन्नं महामुनिम् ॥४८॥ निदाघः प्राह भूपाल प्रश्रयावनतः स्थितः । निदाघ उवाच ॥४९॥ अपि ते परमा तृप्तिरुत्पन्ना पुष्टिरेव च हाथ और पैर को धो कर उसने गुरु जी को उच्च आसन दिया । जब गुरुजी आसनासीन हो गए तब उस द्विज- श्रेष्ठ ने आदरपूर्वक भोजन करने के लिए कहा ॥४२½॥ ऋभु बोले- विप्रवर्य ! जो तुम्हारे घर में है उसी को खाना चाहिए । तो कहो मैं क्या खाऊँ ? कदन्न से तो मुझे कभी भी प्रीति नहीं रही । निदाघ बोला- द्विजश्रेष्ठ ! मेरे घर में सत्तू, जौ की लपसी और बाटी बनी हैं। इनमें से जो अच्छा लगे उसको आप यथेच्छ भोजन कीजिए ॥४३-४४½॥ ऋभु ने कहा- द्विज ! ये तो कदन्न हैं, मुझे मीठा अन्न भोजन के लिए दो । हलुआ, खीर और खांड़ के बने हुए पदार्थ भोजन कराओ ॥४५½॥ निदाघ ने कहा- गृहिणी ! मेरे घर में जो कुछ उत्तम अन्न और मीठे पदार्थ हैं उनका स्वादु भोजन बनाकर द्विजवर को परसो । पत्नी पति के कहने के अनुसार आदरपूर्वक अपने पति के वचन के अनुकूल ही स्वादु भोजन द्विज के आगे परोस दिया । भूपाल ! जब महामुनि इच्छानुकूल मधुर अन्न खा चुके तब निदाघ ने विनम्र नम्र होकर पूछा ॥४६-४८½॥ 'द्विज ! क्या आपको इस मधुर भोजन से पर्याप्त तृप्ति हुई ? कुछ शरीर में शक्ति आई ? अथवा दृढ
एकोनपञ्चाशत्तमोऽध्यायः ३२६ अपि ते मानसं स्वस्थमाहारेण कृतं द्विज । क्व निवासी भवान्विप्र क्व वा गंतुं समुद्यतः ॥५०॥ आगम्यते च भवता यतस्तच्च निवेद्यताम् । ऋभुरुवाच क्षुधितस्य च भुक्तेऽन्ने तृप्तिर्ब्रह्मन्व्जायते ॥५१॥ न मे क्षुधा भवेत्तृप्तिः कस्मान्मां द्विज पृच्छसि । वह्निना पार्थिवेनादौ दग्धे वै क्षुत्समुद्भवः ॥५२॥ भवत्यंभसि च क्षीणे नृणां तृष्णासमुद्भवः । क्षुत्तृष्णे देहधर्माख्ये न ममैते यतो द्विज ॥५३॥ ततः क्षुत्संभवाभावात्तृप्तिरस्त्येव मे सदा । मनसः स्वस्थता तुष्टिश्चित्तधर्माविमौ द्विज ॥५४॥ चेतसो यस्य यत्पृष्टं पुमानेभिर्न युज्यते । क्व निवासस्तवेत्युक्तं क्व गंतासि च यत्त्वया ॥५५॥ कुतश्चागम्यते त्वैतत्त्रितयेऽपि निबोध मे । पुमान्सर्वगतो व्यापीत्याकाशवदयं यतः ॥५६॥ कुतः कुत्र क्व गंतासीत्येतदप्यर्थवत्कथम् । सोऽहं गंता च चागंता नैकदेशनिकेतनः ॥५७॥ त्वं चान्ये च न च त्वं त्वं नान्ये नैवाहमप्यहम् । मिष्टान्ने मिष्टमित्येषा जिह्वा सा मे कृता तव ॥५८॥ किं वक्ष्यतीति तत्रापि श्रूयतां द्विजसत्तम । मिष्टमेव यदामिष्टं तदेवोद्वेगकारणम् ॥५९॥ अमिष्टं जायते मिष्टं मिष्टादुद्विजते जनः । आदिमध्यावसानेषु किमन्नं रुचिकारणम् ॥६०॥ मृण्मयं हि मृदा यद्वद्गृहं लिप्तं स्थिरीभवेत् । पार्थिवोऽयं तथा देहः पार्थिवैः परमाणुभिः ॥६१॥ यवगोधूममुद्गादिधृतं तैलं पयो दधि । गुडः फलानीति तथा पार्थिवाः परमाणवः ॥६२॥ आहार से कुछ मानसिक तुष्टि प्राप्त हुई ? ॥४६ १/२॥ विप्र ! आप कहाँ के रहने वाले हैं ? इस समय कहाँ के लिए प्रस्थान किया है और कहाँ से आपका शुभागमन हुआ है ? कृपा कर मुझसे कहिए ॥५०॥ ऋभु ने कहा—भूखे व्यक्ति को भोजन करने से तृप्ति होती है । द्विज ! मुझे तो क्षुधा लगती नहीं तो फिर तुम तृप्ति के विषय में क्यों पूछते हो ? पार्थिव अग्नि से जलने पर भूख लगती है और जल के नष्ट होने पर मनुष्य में तृष्णा उत्पन्न होती है । द्विज ! क्षुधा और तृष्णा देह के धर्म हैं, मेरे नहीं । इसलिए क्षुधा के सर्वथा अभाव से मुझे तो सर्वदा तृप्ति रहती ही है ॥५१-५३ १/२॥ द्विज ! मन का स्वास्थ्य और तुष्टि ये दोनों चित्त के धर्म हैं । तो जब ये चित्त के धर्म हैं तो पुरुष इनसे कभी भी युक्त नहीं होता ॥५४ १/२॥ तुमने जो यह पूछा है कि कहाँ निवास स्थान है, कहाँ जाओगे और कहाँ से आ रहे हो, तो इन तीनों प्रश्नों का उत्तर भी मुझसे सुनो । चूंकि यह पुरुष आकाश की भाँति सर्वगत और सर्वव्यापक है इसलिए कहाँ से आये हो और कहाँ जाओगे, ये प्रश्न भी सार्थक कैसे हो सकते हैं ? ऐसा मैं न तो कहीं जाता हूँ, न आता हूँ और न तो किसी एक देश में मेरा निवास-स्थान ही है ॥५५-५७॥ तुम और दूसरे न तुम तुम हो न दूसरे दूसरे हैं और न मैं मैं हूँ । तुम्हारे मिष्टान्न को मेरी जिह्वा ने मीठा समझकर खाया है ॥५८॥ द्विजसत्तम ! इस विषय में मेरी जिह्वा कहा करती है उसको सुनो । यदि मीठे को मीठा न कहा जाय तो वही उद्वेग का कारण बन जाता है ॥५९॥ कभी कड़वा ही मीठा बन जाता और कभी मीठा ही मनुष्य को अरुचिकर हो जाता है । आदि, मध्य और अन्त में कभी ऐसा हो जाता है तो अन्न के रुचिकर होने में क्या कारण है इसको सुनो ॥६०॥ जिस प्रकार मिट्टी का घर मिट्टी से लीपने पर स्थिर (पुष्ट) होता है उसी प्रकार यह पार्थिव शरीर पार्थिव परमाणुओं से पुष्ट होता है ॥६१॥ यव, गेहूँ, उड़द, घी, तेल, दूध, दही, गुड़ और फल ये पार्थिव परमाणु हैं ॥६२॥ इसलिए आप मीठे और कड़वे का रहस्य ४२ ना० पु०