बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)
Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें३२६ नारदीयपुराणम् ब्राह्मण उवाच भूयः पृच्छसि किं श्रेयः परमार्थेन पृच्छसि । श्रेयांसि परमार्थानि ह्यशेषाण्येव भूपते ॥१२॥ देवताराधनं कृत्वा धनसंपदमिच्छति । पुत्रानिच्छति राज्यं च श्रेयस्तस्यैव तन्नृप ॥१३॥ विवेकिनस्तु संयोगः श्रेयोऽसौ परमात्मना । कर्मयज्ञादिकं श्रेयः स्वलोकफलदायि यत् ॥१४॥ श्रेयः प्रधानं च फले तदेवानभिसंहिते । आत्मा ध्येयः सदा भूप योगयुक्तैस्तथा परैः ॥१५॥ श्रेयस्तस्यैव संयोगः श्रेयो यः परमात्मनः । श्रेयांस्येवमनेकानि शतशोऽथ सहस्रशः ॥१६॥ संत्यत्र परमार्थास्तु न त्वेते श्रूयतां च मे । धर्मोऽर्थं त्यजते किं तु परमार्थो धनं यदि ॥१७॥ व्ययश्च क्रियते कस्मात्कामप्राप्त्युपलक्षणः । पुत्रश्चेत्परमार्थाह्वयः सोऽप्यन्यस्य नरेश्वर ॥१८॥ परमार्थभूतः सोऽन्यस्य परमार्थो हि नो पिता । एवं न परमार्थोऽस्ति जगत्यत्र चराचरे ॥१९॥ परमार्थो हि कार्याणि करणानामशेषतः । राज्यादिप्राप्तिरन्बोक्ता परमार्थतया यदि ॥२०॥ परमार्था भवन्त्यत्र न भवंति च वै ततः । ऋग्यजुः सामनिष्पाद्यं यज्ञकर्म मतं तव ॥२१॥ परमार्थभूतं तत्रापि श्रूयतां वदतो मम । यत्तु निष्पाद्यते कार्यं मृदा कारणभूतया ॥२२॥ तत्कारणानुगमनाज्जायते नृप मृन्मयम् । एवं विनाशिभिर्द्रव्यैः समिदाज्यकुशादिभिः ॥२३॥ निष्पाद्यते क्रिया या तु सा भवित्री विनाशिनी । अनाशी परमार्थस्तु प्राज्ञैरभ्युपगम्यते ॥२४॥ यत्तु नाशि न संदेहो नाशिद्रव्योपपादितम् । तदेवाफलदं कर्म परमार्थो न भेदवान् ॥२५॥ मुक्तिसाधनभूतत्वात्परमार्थो न साधनम् । ध्यानमेवात्मनो भूप परमार्थशब्दिदंतम् ॥२६॥
ब्राह्मण बोला- फिर तुम श्रेय क्या है, इसको पूछ रहे हो, यदि परमार्थतः पूछते हो तब तो हे भूपते ! सम्पूर्ण परमार्थ ही श्रेय हैं। नृप ! देवता की उपासना से धन, सम्पत्ति, पुत्र और राज्य की जो इच्छा करते हैं उनके लिए वही श्रेय है ॥१२-१३॥ ज्ञानी पुरुषों के लिए परमात्मा का संयोग (प्राप्ति) ही श्रेय है । कर्मयज्ञ आदि भी श्रेय ही हैं, क्योंकि वे स्वर्ग लोकरूपी फल को देने वाले हैं ॥१४॥ निकट न रहने वाले परम फल में श्रेय की प्रधानता रहती है । भूपाल ! अन्य योगियों ने आत्मा को ही सदा अपना ध्येय माना है तो परमात्मा का जो संयोग है वही उनका श्रेय है ॥१५॥ इस प्रकार श्रेय के अनेकों (सैकड़ों और सहस्रों) भेद हैं । श्रेय इतने हैं, परन्तु ये परमार्थ श्रेय नहीं हैं। जो परमार्थ है, उसको मुझसे सुनो ॥१६$\frac{१}{२}$॥ यदि धन को परमार्थ माना जाय तो धर्म के लिए उसका त्याग क्यों किया जाता तथा काम प्राप्ति के लिए धन का व्यय क्यों किया जाता है ? तब नरेश्वर ! पुत्र को परमार्थ कैसे माना जाय, क्योंकि वह भी तो दूसरे का परमार्थभूत है । इसी प्रकार पिता भी परमार्थ भूत नहीं है, वह भी अन्य का ही परमार्थ है । इसलिए नरेश्वर ! इस चराचर जगत् में परमार्थ नहीं है ॥१७-१६॥ परमार्थ अशेष कारणों का एकमात्र कार्य है अर्थात् संसार का एकमात्र प्राप्य है। यदि राज्य आदि का पाना परमार्थ माना जाय तो ऋग्-यजुस् और साम द्वारा प्रतिपादित यज्ञादि कर्म परमार्थ की श्रेणी में नहीं आते ॥२०-२१॥ परमार्थ भूत जो तत्त्व है, उसको मैं कह रहा हूँ, सुनो । राजन् ! कारणभूत मिट्टी से जो कार्य (घट) उत्पन्न होता है, वह कारण का अनुगमन करने से मृत्तिका स्वरूप ही समझा जाता है। इसी प्रकार समिधा, कुश आदि विनाशीील कारणों से जो कार्य उत्पन्न होगा वह भी विनश्वर होगा ॥२२-२३$\frac{१}{२}$॥ प्राज्ञ व्यक्ति परमार्थ को अनश्वर मानते हैं। जो क्षणभंगुर पदार्थों से ही बनता है, वह अवश्य ही क्षणभंगुर होता है । तो यह मेरा मत है कि जो किसी प्रकार के फल (प्रत्यक्ष) को न देने वाला कर्म है, वही परमार्थ है। परमार्थ स्वयं मुक्ति का साधनभूत होने के कारण अन्य किसी का साधन नहीं है । भूप ! यदि आत्मा के ध्यान