बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)
Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंएकोनपञ्चाशत्तमोऽध्यायः ३२७ भेदकारि परेष्वस्तु परमार्थो न भेदवान् । परमात्मनिनोयोगः परमार्थ इतीष्यते ॥२७॥ मिथ्यैतदन्यद्द्रव्यं हि नैतद्द्रव्यमयं यतः । तस्माच्छ्रेयांस्यशेषाणि नृपैतानि न संशयः ॥२८॥ परमार्थस्तु भूपाल संक्षेपाच्छ्रूयतां मम । एको व्यापी समः शुद्धो निर्गुणप्रकृतेः परः ॥२९॥ जन्मवृद्ध्यादिरहित आत्मा सर्वगतो नृप । परिज्ञानमयो सद्भिर्नामजात्यादिभिर्विभुः ॥३०॥ न योगवान्न युक्तोऽभून्नैव पार्थिव योक्ष्यति । तस्यात्मपरदेहेषु सतोऽप्येकयमयं हि तत् ॥३१॥ विज्ञानं परमार्थोऽसौ वेत्ति नोऽतथ्यदर्शनः । वेणुरंध्रविभेदेन भेदः षड्जादिसंज्ञितः ॥३२॥ अभेदो व्यापिनो वायोस्तथा तस्य महात्मनः । एकत्वं रूपभेदश्च बाह्यकर्मप्रवृत्तिजः ॥२३॥ देवादिभेदमध्यास्ते नास्त्येवाचरणो हि सः । शृण्वत्र भूप प्राग्वृत्तं यद्गीतमृभुना भवेत् ॥३४॥ अवबोधं जनयतो निदाघस्य द्विजन्मनः । ऋभुर्नामाऽभवत्पुत्रो ब्रह्मणः परमेष्ठिनः ॥३५॥ विज्ञाततत्त्वसद्भावो निसर्गादेव भूपते । तस्य शिष्यो निदाघोऽभूत्पुलस्त्यतनयः पुरा ॥३६॥ प्रादादशेषविज्ञानं स तस्मै परया मुदा । अवाप्तज्ञानतत्त्वस्य न तस्याद्वैतवासना ॥३७॥ स ऋभुस्तर्कयामास निदाघस्य नरेश्वर । देविकायास्तटे वीर नगरं नाम वै पुरम् ॥३८॥ समृद्धमतिरम्यं च पुलस्त्येन निवेशितम् । रम्योपवनपर्यन्तं स तस्मिन्पार्थिवोत्तम ॥३९॥ निदाघनामयोगज्ञस्तस्य शिष्योऽभवत्पुरा । दिव्ये वर्षसहस्रे तु समतीतेऽथ तत्पुरम् ॥४०॥ जगाम स ऋभुः शिष्यं निदाघमवलोकितुम् । स तस्य वैश्वदेवांते द्वारालोकनगोचरः ॥४१॥ को ही परमार्थ शब्द का अर्थ माना जाय तो वह दूसरे से आत्मा का भेद करने वाला है; किन्तु परमार्थ में भेद नहीं होता । परमार्थ और आत्मा का योग ही परमार्थ कहा जाता है । अन्य द्रव्य मिथ्या है क्योंकि परमार्थ द्रव्यमय नहीं है । अतः राजन् ! निःसन्देह ये सब श्रेय ही हैं, परमार्थ नहीं । भूपाल ! अब मैं संक्षेप से परमार्थ का वर्णन करता हूँ, सुनो ॥२४-२८॥ नरेश्वर ! आत्मा एक, व्यापक, सम, शुद्ध, निर्गुण और प्रकृति से परे है । उसमें जन्म और वृद्धि आदि विकार नहीं हैं । वह सर्वत्र व्यापक तथा परम ज्ञानमय है । असत् नाम और जाति आदि से उस सर्वव्यापक परमात्मा का न कभी संयोग हुआ, न है और न होगा ही । वह अपने और दूसरे के शरीर में विद्यमान रहते हुए भी एक ही है ॥२६-३१॥ इस प्रकार का जो विशेष ज्ञान है वही परमार्थ है । द्वैत भावना रखने वाले पुरुष तो अपरमार्थदर्शी ही हैं । जैसे बाँसुरी में एक ही वायु अभेद भाव से व्याप्त है, किन्तु उसके छिद्रों के भेद से उसमें षड्ज, ऋषभ आदि स्वरों का भेद हो जाता है, उसी प्रकार उस एक ही परमात्मा के देव, मनुष्य आदि अनेक भेद प्रतीत होते हैं । उस भेद की स्थिति तो अविद्या के आवरण तक ही सीमित है ॥३२-३३३॥ भूपाल ! इस विषय में ऋभु ऋषि का जो प्राचीन ऐतिहासिक उपाख्यान है, उसको सुनो । द्विजन्मा निदाघ को ज्ञान का प्रकाश देने वाले ऋभु परमेष्ठी ब्रह्मा के पुत्र थे ॥३४-३५॥ भूपते ! स्वभाव से ही समस्त तत्त्वों के ज्ञाता थे । प्राचीन काल में पुलस्त्य-तनय निदाघ उनका शिष्य था ॥३६॥ उन्होंने प्रसन्न होकर अपने शिष्य को सम्पूर्ण ज्ञान दे डाला । परन्तु सम्पूर्ण तत्त्वों को जान लेने पर भी निदाघ में अद्वैत भावना नहीं हुई ॥३७॥ नरेश्वर ! ऋभु ने निदाघ की इस स्थिति को ताड़ लिया । वीर ! देविका नदी के तट पर नागर नाम का एक विशाल नगर था । वह अत्यन्त मनोहर और समृद्धिशाली था जिसको पुलस्त्य ने बसाया था ॥३८३॥ नृपवर्य ! रम्य उपवनों से सुशोभित उस नगर में वह योगविद् निदाघ रहता था । एक दिन दिव्य हजार वर्ष बीत जाने पर ऋषि ऋभु अपने शिष्य निदाघ को देखने के लिए उस पुर में गए । उसने वैश्वदेव विधि करने के उपरान्त गुरुदेव को द्वार पर आया हुआ देखा और आदर के साथ उनका स्वागत कर घर में ले गया ॥३९-४१३॥